106 वर्ष की मातृशक्ति की स्मृति बनेगी सामाजिक समरसता का महापर्व

बड़ी कुंडिया में 19 जुलाई को सकल हिन्दू समाज की प्रसादी, प्रतिभाओं का सम्मान, पौधारोपण और स्वास्थ्य सेवा से मातृऋण चुकाएगा लढ़ा परिवार

शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
किसी माँ का जीवन केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं होता, वह अपने संस्कारों से पीढ़ियों का निर्माण करती है। जब ऐसी तपस्विनी, ममतामयी और 106 वर्ष की दीर्घायु पूर्ण कर संसार से विदा होती है तो उसकी स्मृतियाँ केवल आँसुओं तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा का दीपक बन जाती हैं। ऐसा ही प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है शाहपुरा तहसील के तहनाल निवासी एवं वर्तमान में अहमदाबाद प्रवासी हेमराज लढ़ा परिवार, जिसने अपनी पूज्य माताजी स्वर्गीय सोहनदेवी लादूलाल लढ़ा की पुण्य स्मृति को केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक परंपराओं के पुनर्जागरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और भाईचारे के महाअभियान का स्वरूप दे दिया है।
आने वाले 19 जुलाई, रविवार को शाहपुरा विधानसभा क्षेत्र के बड़ी कुंडिया गांव में ऐसा आयोजन होने जा रहा है, जिसकी चर्चा पूरे क्षेत्र में हो रही है। यह कार्यक्रम किसी परिवार का निजी आयोजन नहीं, बल्कि सकल हिन्दू समाज का सामाजिक मिलन महोत्सव बनने जा रहा है। वर्षों पुरानी परंपरा के अनुरूप एक ही जाजम पर बैठकर सामूहिक प्रसादी ग्रहण करने का यह आयोजन समाज में प्रेम, सौहार्द और आत्मीयता की नई मिसाल पेश करेगा।
माँ की अंतिम इच्छा नहीं, जीवनभर के संस्कारों का सम्मान–
स्वर्गीय सोहनदेवी लढ़ा का इस वर्ष 14 फरवरी को 106 वर्ष की आयु में स्वर्गवास हुआ था। उन्होंने अपना पूरा जीवन प्रेम, अपनत्व, सद्भाव और परिवार को जोड़े रखने के संस्कारों के साथ बिताया। परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए वे केवल माँ नहीं, बल्कि संस्कारों की जीवंत पाठशाला थीं। उनके निधन के बाद हेमराज लढ़ा और परिवारजनों के मन में यही विचार उठा कि ऐसी महान मातृशक्ति की स्मृति केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि समाज को जोड़ने वाली प्रेरणा बननी चाहिए।
इसी भावना के साथ निर्णय लिया गया कि उनकी पुण्य स्मृति पर ऐसा आयोजन हो, जिसमें समाज का हर वर्ग सहभागी बने और नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति की उस परंपरा से परिचित कराया जाए, जहाँ श्रद्धांजलि का अर्थ केवल पुष्प अर्पित करना नहीं, बल्कि समाज के लिए कुछ सकारात्मक कर जाना होता है।
मायके की मिट्टी से निभाया अटूट रिश्ता–
इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कार्यक्रम उनके पैतृक गांव तहनाल में नहीं, बल्कि उनके जन्मस्थान और मायके बड़ी कुंडिया में आयोजित किया जा रहा है। यह वही गांव है, जहाँ स्वर्गीय सोहनदेवी ने बचपन की सुनहरी यादें संजोई थीं। बड़ी कुंडिया के प्रतिष्ठित बांगड़ परिवार की बेटी रहीं सोहनदेवी का अपने जन्मस्थान से गहरा आत्मिक लगाव रहा।
उनके पिता स्वर्गीय कल्याणमल बांगड़ तथा भाई स्वर्गीय कन्हैयालाल, स्वर्गीय मूलचंद और जमनालाल बांगड़ वर्षों तक भीलवाड़ा में रहने के बावजूद अपनी जन्मभूमि से जुड़े रहे। उसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए आज लढ़ा परिवार ने यह संदेश दिया है कि बेटी भले ही विवाह के बाद दूसरे घर चली जाए, लेकिन उसका मायका हमेशा उसकी आत्मा का हिस्सा बना रहता है।
सामूहिक प्रसादी से मजबूत होंगे रिश्ते–
19 जुलाई को सुबह 8 बजे से बड़ी कुंडिया में सकल हिन्दू समाज के लिए विशाल प्रसादी का आयोजन होगा। इस आयोजन का उद्देश्य केवल भोजन कराना नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही उस परंपरा को पुनर्जीवित करना है, जिसमें पूरा समाज एक साथ बैठकर भोजन करता था और आपसी मतभेद स्वयं समाप्त हो जाते थे। हेमराज लढ़ा का मानना है कि एक जाजम पर बैठने से केवल भोजन नहीं होता, बल्कि दिल भी जुड़ते हैं। जब समाज के सभी वर्ग बिना किसी भेदभाव के साथ बैठते हैं, तब भाईचारे की भावना मजबूत होती है और एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनने की संस्कृति विकसित होती है। आज जबकि आधुनिक जीवनशैली में सामाजिक दूरियाँ लगातार बढ़ रही हैं, ऐसे समय में यह आयोजन समाज को फिर से जोड़ने की दिशा में एक प्रेरणादायी पहल माना जा रहा है।
श्रद्धांजलि के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा का संकल्प–
माताजी की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए लढ़ा परिवार ने सामाजिक सरोकारों को भी प्राथमिकता दी है। कार्यक्रम के दौरान गांव के विद्यालय के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का सम्मान किया जाएगा, ताकि ग्रामीण प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का प्रोत्साहन मिले। इसके साथ ही गांव के स्वास्थ्य केन्द्र में कार्यरत चिकित्साकर्मियों को मेडिकल किट प्रदान की जाएगी। परिवार का मानना है कि स्वस्थ समाज ही समृद्ध समाज की नींव होता है और चिकित्सा कर्मियों का सम्मान समाज के प्रति उनके योगदान का सम्मान है।
हरियाली से भी जुड़ेंगी माताजी की यादें–
श्रद्धांजलि केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कर्मों से दी जाती है। इसी सोच के साथ ग्राम पंचायत के सहयोग से पौधारोपण अभियान भी चलाया जाएगा। लढ़ा परिवार का कहना है कि जब भी आने वाले वर्षों में ये पौधे वृक्ष बनकर गांव को छाया देंगे, तब हरियाली के साथ स्वर्गीय सोहनदेवी की स्मृतियाँ भी जीवंत रहेंगी। यह पहल पर्यावरण संरक्षण के साथ आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश भी देगी।
गांव-गांव जाकर दे रहे निमंत्रण–
आयोजन को सफल बनाने के लिए लढ़ा परिवार स्वयं बड़ी कुंडिया के प्रत्येक परिवार तक पहुँच रहा है। व्यक्तिगत रूप से आमंत्रण देकर सभी से आग्रह किया जा रहा है कि वे इस आयोजन में परिवार सहित शामिल होकर सामाजिक एकता का संदेश दें। गांव के लोग भी इस पहल की मुक्तकंठ से सराहना कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आज के दौर में जब लोग अपने गांव और रिश्तों से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे समय में किसी परिवार द्वारा अपनी माताजी की स्मृति में पूरे गांव को साथ जोड़ने का प्रयास वास्तव में अनुकरणीय है।
विदेश से मंगवाया पत्थर, जयपुर में बनी माताजी की प्रतिमा–
मातृभक्ति की एक और अद्भुत मिसाल पेश करते हुए हेमराज लढ़ा ने बताया कि अपनी माताजी की स्मृति को अमर बनाने के लिए वियतनाम से विशेष पत्थर मंगवाया गया, जिस पर जयपुर के कुशल शिल्पकारों ने उनकी प्रतिमा का निर्माण किया है। यह प्रतिमा केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि उस माँ के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है, जिसने अपने जीवन से परिवार को संस्कारों की अमूल्य धरोहर दी।
मातृभक्ति और देवीभक्ति की अनूठी मिसाल–
पेशे से ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद हेमराज लढ़ा की पहचान केवल उनके व्यवसाय से नहीं, बल्कि उनकी गहरी मातृभक्ति और देवी आराधना से भी है। उन्होंने अपने निवास पर मंदिर बनाकर पिछले 36 वर्षों से अखण्ड ज्योत प्रज्वलित कर रखी है। उनकी यह भक्ति पूरे क्षेत्र में प्रेरणा का विषय बनी हुई है। परिवार का मानना है कि माता-पिता की सेवा और सम्मान ही जीवन का सबसे बड़ा धर्म है और यही संस्कार आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचने चाहिए।
तीनों पुत्र भी निभा रहे सामाजिक जिम्मेदारी–
हेमराज लढ़ा के तीनों पुत्र विकास, अभिषेक और रोहित लढ़ा भी इस आयोजन की तैयारियों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। लगभग दस वर्ष पूर्व भीलवाड़ा से अहमदाबाद बसने के बावजूद परिवार का अपने गांव और समाज से जुड़ाव आज भी उतना ही मजबूत है। नई पीढ़ी द्वारा इस प्रकार पारिवारिक संस्कारों और सामाजिक उत्तरदायित्व को आगे बढ़ाना यह सिद्ध करता है कि यदि परिवार में अच्छे संस्कार दिए जाएँ तो वे पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।
समाज के लिए बनेगी प्रेरणा–
बड़ी कुंडिया में आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम केवल एक पुण्य स्मृति समारोह नहीं, बल्कि यह संदेश देगा कि माता-पिता की स्मृति का सबसे श्रेष्ठ सम्मान समाज के लिए कुछ अच्छा करना है। जब एक परिवार अपनी माँ की स्मृति को सामाजिक समरसता, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और भाईचारे से जोड़ देता है, तब वह आयोजन निजी न रहकर पूरे समाज का उत्सव बन जाता है।
निश्चित ही 19 जुलाई को बड़ी कुंडिया की धरती पर होने वाला यह आयोजन आने वाले समय में सामाजिक एकता, सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और मातृभक्ति की ऐसी प्रेरक मिसाल बनेगा, जिसकी चर्चा लंबे समय तक होती रहेगी। यह आयोजन समाज को यह संदेश भी देगा कि माँ की ममता कभी समाप्त नहीं होती, वह संस्कार बनकर पीढ़ियों तक जीवित रहती है और समाज को जोड़ने की शक्ति देती रहती है।