बायलर ब्लास्ट के बाद ‘बलि का बकरा’ बनाने का आरोप, ऊर्जा मंत्री से उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज
जयपुर/छबड़ा।स्मार्ट हलचल|राज्य के महत्वपूर्ण ताप विद्युत संयंत्र CSCTPP, छबड़ा में 630 मेगावाट की यूनिट-6 में हुए गंभीर तकनीकी हादसे ने अब प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। पूरे मामले को लेकर ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर को भेजे गए विस्तृत प्रतिवेदन में आरोप लगाया गया है कि असली जिम्मेदारों को बचाकर एक अधिकारी को निशाना बनाया जा रहा है।
घटना क्या थी?
24 दिसंबर 2025 को चल रही 630 मेगावाट यूनिट-6 में बायलर सेक्शन में गंभीर नुकसान की घटना सामने आई। पत्र में दावा किया गया है कि यह हादसा ऐश हैंडलिंग सेक्शन की लापरवाही और असुरक्षित तरीके से सिलिंडर तोड़ने (ब्लास्टिंग) की प्रक्रिया के कारण हुआ। बताया गया है कि इस दौरान बायलर को भारी क्षति पहुंची और कुछ कर्मचारी घायल भी हुए।
तकनीकी रूप से यह मामला ऐश हैंडलिंग के दायरे में आता है, लेकिन कार्रवाई का फोकस बायलर मेंटेनेंस सेक्शन पर डाल दिया गया—यहीं से विवाद शुरू होता है।
पहले ट्रांसफर, फिर चार्जशीट!
आरोप है कि फरवरी 2024 से SE (बायलर मेंटेनेंस) के रूप में कार्यरत अधिकारी को 3 दिसंबर 2025 को “वर्किंग अरेंजमेंट” के नाम पर STPS, सूरतगढ़ भेजने का आदेश दिया गया। लेकिन उन्हें समय पर रिलीव नहीं किया गया।
इसी बीच 24 दिसंबर को हादसा हो गया। और फिर 6 जनवरी 2026 को बिना समुचित तकनीकी जांच के सीधे SE (बायलर मेंटेनेंस) को चार्जशीट थमा दी गई।
सवाल उठता है—
जब घटना ऐश हैंडलिंग क्षेत्र से जुड़ी बताई जा रही है तो संबंधित XEN और AEN पर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं?
चार्जशीट का दायरा केवल एक अधिकारी तक सीमित क्यों?
क्या किसी को बचाया जा रहा है?
प्रतिवेदन में गंभीर आरोप लगाया गया है कि उच्च स्तर पर बैठे कुछ अधिकारियों को बचाने के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी को “बलि का बकरा” बनाया जा रहा है।
सूत्रों का दावा है कि कंट्रोल रूम के शिफ्ट और एक्टिविटी रजिस्टर में दर्ज प्रविष्टियां स्पष्ट कर सकती हैं कि घटना के समय वास्तविक जिम्मेदारी किसकी थी। इसके बावजूद, जांच से पहले ही दोष तय कर देना प्रशासनिक निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
बड़ा सवाल: तकनीकी सच्चाई या प्रशासनिक दबाव?
यह मामला सिर्फ एक चार्जशीट का नहीं, बल्कि राज्य के बिजली संयंत्रों की सुरक्षा संस्कृति का है। यदि वास्तविक जिम्मेदारों की पहचान कर कार्रवाई नहीं की गई तो यह भविष्य में और बड़े हादसों को न्योता दे सकता है।
ऊर्जा मंत्री से मांग की गई है कि—
• पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय और स्वतंत्र तकनीकी जांच करवाई जाए
• निर्दोष अधिकारी पर लगे आरोप वापस लिए जाएं
• वास्तविक दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो
• संयंत्रों में सुरक्षा मानकों की समीक्षा की जाए
पारदर्शिता ही समाधान
राज्य के करोड़ों उपभोक्ताओं की बिजली आपूर्ति जिन संयंत्रों पर निर्भर है, वहां यदि तकनीकी लापरवाही और प्रशासनिक पक्षपात का मिश्रण होगा तो परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।
अब निगाहें ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर के निर्णय पर टिकी हैं—क्या सच सामने आएगा या फाइलों में दब जाएगा?
यह मामला केवल एक अधिकारी का नहीं, बल्कि जवाबदेही बनाम व्यवस्था की विश्वसनीयता का है।
