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चित्तौड़गढ़ BJP में ‘समझौते’ की मुस्कान फीकी— पोस्टर-बैनर की राजनीति में उलझा संगठन, कार्यकर्ता और समाज खुद को ठगा महसूस कर रहे; भीतरखाने शतरंज की चालें तेज

जोशी–आक्या की अदृश्य लड़ाई, रामपुरिया का इस्तीफा और जाट समाज का असंतोष—कार्यकर्ता व समाज बने मोहरे।

 चित्तौड़गढ़।स्मार्ट हलचल|नेताओं की लड़ाई में सबसे पहले कार्यकर्ता और समाज कुचले जाते हैं—चित्तौड़गढ़ की भाजपा राजनीति इन दिनों इस कहावत को केवल साबित ही नहीं कर रही, बल्कि उसे और गहरा कर रही है।
मंचों पर एकजुटता, संतुलन और समझौते के संदेश दिए जा रहे हैं, लेकिन भीतरखाने शतरंज की बिसात पर चालें पहले से कहीं अधिक तेज और बेरहम हो चुकी हैं।
भारतीय जनता पार्टी के दो प्रभावशाली चेहरों—सांसद व प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी और विधायक चंद्रभान सिंह आक्या—के बीच मतभेदों को भले ही औपचारिक रूप से समाप्त बताया जा रहा हो, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके असर अब कार्यकर्ताओं से आगे समाजों तक पहुंचने लगे हैं।

‘न्यूट्रल’ पद और आत्मसम्मान की राजनीति।,
नगर परिषद और पंचायती राज चुनावों से पहले संगठन को संतुलित दिखाने की कोशिश में पूर्व नगर मंडल अध्यक्ष सुदर्शन रामपुरिया को “न्यूट्रल” बताकर जिला उपाध्यक्ष पद पर समायोजित किया गया।
लेकिन यह संतुलन महज एक दिन भी नहीं टिक सका।
अगले ही दिन रामपुरिया ने इसे सकल जैन समाज के आत्मसम्मान से समझौता बताते हुए पद से इस्तीफा दे दिया।
उनका यह कदम केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे संगठन में सम्मान बनाम समायोजन की राजनीति का प्रतीक माना जा रहा है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यह इस्तीफा उस असंतोष की अभिव्यक्ति है, जो पार्टी के भीतर “न्यूट्रल” शब्द के नाम पर किनारे किए जाने की भावना से जन्म ले रहा है।

जाट समाज में भी भीतरखाने विरोध।
इसी बीच भाजपा संगठन में जाट समाज को अपेक्षित तवज्जो नहीं मिलने को लेकर भीतरखाने विरोध की आवाजें भी तेज होने लगी हैं।
जाट समाज के नेताओं और कार्यकर्ताओं का कहना है कि—
भाजपा को चुनावों के समय ही समाज की याद आती है।
समाज का उपयोग केवल वोट बैंक के रूप में किया जाता है।
संगठन और निर्णय प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता।
इसी कारण जाट समाज भी खुद को ठगा-सा महसूस कर रहा है।
समाज से जुड़े कार्यकर्ताओं का मानना है कि वर्षों से उनकी भूमिका केवल मतदाता जुटाने तक सीमित कर दी गई है।

बधाई बैनर भी बने राजनीतिक संकेत।
जिला भाजपा की नवगठित कार्यकारिणी के बाद एक और संवेदनशील मुद्दा सामने आया—
बधाई बैनर और पोस्टरों में किस नेता का फोटो हो, कितना बड़ा हो और किसे हटाया जाए।
यह सवाल अब केवल पोस्टर डिज़ाइन का नहीं रहा, बल्कि यह तय करने का पैमाना बन गया है कि—
किस गुट से नजदीकी सुरक्षित है।
किससे दूरी भविष्य बचा सकती है।
और कौन-सा फोटो राजनीतिक जोखिम बन सकता है।
मंडल और बूथ स्तर के कार्यकर्ता अब पार्टी के लिए काम करने से पहले यह सोचने को मजबूर हैं कि उनका हर कदम किसी न किसी खेमे को नाराज न कर दे।
‘हाथियों की लड़ाई में झाड़ियों का नाश’—अब समाज भी चपेट में
अब हालात यह हैं कि गुटों की इस लड़ाई में—
पहले कार्यकर्ता मोहरे बने।
फिर उभरते नेता कटे।
और अब समाज खुद को हाशिये पर खड़ा महसूस करने लगा है।
शतरंज की इस राजनीति में प्यादे, हाथी, घोड़े और ऊंट बदले जा रहे हैं, लेकिन वजीर और राजा की सुरक्षा ही सर्वोपरि बनी हुई है।

विधानसभा चुनाव की दरार अब भी बरकरार।
जोशी–आक्या के बीच की तल्खी विधानसभा चुनाव से पहले ही सार्वजनिक हो चुकी थी। टिकट कटने, निर्दलीय चुनाव और फिर आक्या की जीत ने भाजपा को दो स्पष्ट ध्रुवों में बांट दिया।
आज भी संगठनात्मक फैसलों, पद वितरण और समाजों की उपेक्षा में उसी दरार की छाया दिखाई देती है।

आज का कार्यकर्ता और समाज बदल चुका है।
भाजपा नेतृत्व के सामने अब सवाल केवल संगठन का नहीं, बल्कि विश्वास का है।
कार्यकर्ता और समाज दोनों का कहना है—
अब केवल भोज, दावत और नारों से भरोसा नहीं बनता।
आज का कार्यकर्ता और समाज सम्मान, भागीदारी और भविष्य चाहता है।
वह फोटो, पद या तात्कालिक लाभ से ज्यादा स्थायी पहचान की अपेक्षा रखता है।

चुनाव बताएंगे असली सच्चाई।
प्रदेश नेतृत्व द्वारा साधा गया संतुलन फिलहाल कागज़ों में ठीक दिख सकता है, लेकिन इसकी असल परीक्षा नगर परिषद और पंचायती राज चुनावों में होगी।
सवाल यह नहीं है कि कौन जीतेगा,
सवाल यह है कि—
क्या भाजपा समय रहते यह समझ पाएगी कि कार्यकर्ता और समाज मोहरे नहीं, बल्कि संगठन की बुनियाद हैं?

अब लड़ाई सत्ता की नहीं, सोच की है।
चित्तौड़गढ़ की भाजपा राजनीति इस समय दो चेहरे दिखा रही है—
मंच पर समझौता, भीतरखाने असंतोष।
यदि नेतृत्व ने कार्यकर्ता और समाज को केवल वोट बैंक समझने की सोच नहीं बदली, तो यह शतरंज की आखिरी चाल भाजपा के लिए चेतावनी नहीं, बल्कि राजनीतिक नुकसान बन सकती है।
लोकतंत्र में जीत केवल सत्ता से नहीं, सम्मान और भरोसे से मिलती है।
और भरोसा तभी बनता है, जब नेतृत्व की सोच कार्यकर्ता और समाज—दोनों के प्रति सार्वभौमिक हो।

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