डिजिटल आतंकवाद का नया दौर,इंटरनेट बन रहा है कट्टरपंथ की पाठशाला

मनोज कुमार अग्रवाल 
स्मार्ट हलचल|मुंबई से सटे मीरा रोड के नया नगर इलाके में धर्म पूछने के बाद चाकू से हमला करने के मामले ने पहलगाम आतंकी हमले का जख्म ताज़ा कर दिया है। यह चाकूबाजी की घटना केवल एक आपराधिक वारदात भर नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के भीतर पनप रही एक गहरी और खतरनाक मजहबी प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है। एक शिक्षित युवक जैव जुबेर अंसारी द्वारा दो निर्दोषों सुरक्षा गार्डों पर धार्मिक आधार पर हमला करना इस बात का प्रमाण है कि कट्टरपंथ का कैंसर अब केवल आतंकी वर्गों तक नहीं, बल्कि समाज के दूसरे तबके तक पहुंच चुका है।
महाराष्ट्र के मीरा रोड स्थित नया नगर इलाके में दो सिक्योरिटी गार्ड्स को चाकू मारने के मामले में नया खुलासा हुआ है। पुलिस के मुताबिक आरोपी ज़ुबैर पहले मौके पर पहुंचा और मस्जिद का रास्ता पूछकर वहां से चला गया। कुछ देर बाद वह फिर लौटा और इस बार उसने हिंदू गार्ड से उसका धर्म पूछा और फिर कलमा पढ़ने को कहा। हिंदू गार्ड ने जब इससे मना कर दिया तो आरोपी जुबैर ने उसपर चाकू से हमला कर दिया। फिर वह सिक्योरिटी केबिन में घुसा जहां मौजूद दूसरे गार्ड पर भी इसी तरह हमला कर दिया । आरोपी जुबैर के पास मिले नोट में आतंकी संगठन आईएसआईएस जिहाद और गाजा जैसे शब्द लिखे हुए मिले हैं। इस घटना को आतंकी कनेक्शन से जोड़कर भी देखा जा रहा है क्योंकि जुबैर के पास बरामद चीजों से यह संकेत मिल रहा है कि वह किसी आतंकी संगठन से जुड़ा हो सकता है। जांच एजेंसियों को उसके पास कट्टरपंथी विचारों से भरा नोट मिला है।
आरोपी जुबैर साइंस ग्रेजुएट है। वह कई साल तक अमेरिका में रह चुका है। भारत लौटने के बाद वह मीरा रोड में अकेले रह रहा था और ऑनलाइन केमिस्ट्री पढ़ाने का काम कर रहा था। इस मामले की जांच अब और अधिक गहराती जा रही है। इससे लोन वुल्फ हमले की आशंका गहरा गई है। आरोपी जुबैर ने हिंदू गार्ड्स का धर्म पूछा और उनसे यह भी पूछा कि क्या वे कलमा पढ़ सकते हैं?
यह घटना हमें मजबूर करती है कि हम केवल कानून व्यवस्था के नजरिए से नहीं, बल्कि सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और डिजिटल परिवेश के संदर्भ में भी इस समस्या को समझें। पहले मजहबी कट्टरपंथ को अक्सर संगठित आतंकी नेटवर्क से जोड़ा जाता था, लेकिन अब यह धारणा तेजी से बदल रही है। मीरा रोड का मामला स्पष्ट करता है कि ‘सेल्फ-रैडिकलाइजेशन’ यानी आत्म-उग्रवादीकरण एक नई और गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए व्यक्ति बिना किसी प्रत्यक्ष संपर्क के भी चरमपंथी विचारधाराओं से प्रभावित हो सकता है। सोशल मीडिया खासकर वाट्सएप ग्रुपों पर देश विरोधी ताकतें मजहबी उन्माद पैदा करने के लिए दिन रात जुटी हुई है कुछ विदेशों से संचालित अलगाववादी फिरकापरस्त ताकतें एनजीओ और दूसरे नाम पर भारत में अस्थिरता फैलाने के लिए फंडिंग करतीं हैं चिंता जनक बात यह है कि अब पढ़े लिखे लोग भी इस से रेडिकलाइज हो रहे हैं। यह बदलाव सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय है क्योंकि पारंपरिक निगरानी तंत्र ऐसे ‘लोन वुल्फ’ हमलों को पहले से पहचानने में अक्सर असफल रहते हैं। जब एक व्यक्ति अपने कमरे में बैठकर धीरे-धीरे मजहबी कट्टर सोच का शिकार बनता है, तो उसके इरादों का पता लगाना बेहद कठिन हो जाता है।
दरअसल आतंकवाद का स्वरूप पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदला है। पहले जहां संगठित आतंकी समूहों द्वारा योजनाबद्ध हमले होते थे, वहीं अब अकेले व्यक्ति भी बड़े हमलों को अंजाम देने लगे हैं। मीरा रोड का मामला इसी श्रेणी में आता है। आरोपी ने कथित रूप से किसी बड़े नेटवर्क से सीधे जुड़े बिना, ऑनलाइन सामग्री से प्रभावित होकर हमला किया। यह ‘लोन बुल्फ’ मॉडल अधिक खतरनाक इसलिए है, क्योंकि इसे पहचानना और रोकना कठिन होता है। इस तरह के हमलों में कोई स्पष्ट साजिश या नेटवर्क सामने नहीं आता, जिससे सुरक्षा एजेंसियों के लिए पहले से संकेत जुटाना मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि दुनिया भर में इस प्रकार के हमलों की संख्या बढ़ रही है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। इस घटना का सबसे चिंताजनक पहलू है ऑनलाइन कट्टरपंथीकरण। डिजिटल युग में इंटरनेट एक दोधारी तलवार बन चुका है। जहां यह ज्ञान और अवसरों का स्रोत है, वहीं यह चरमपंथी विचारधाराओं के प्रसार का माध्यम भी बन गया है। सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड ऐप्स और वीडियो प्लेटफॉर्मेंस पर आतंकी संगठन अपने विचारों को फैलाने में सफल हो रहे हैं। मीरा रोड के आरोपी के मामले में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। कथित तौर पर उसने इंटरनेट पर उपलब्ध प्रोपेगंडा सामग्री के माध्यम से खुद को कट्टरपंथी विचारों से जोड़ लिया। यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है, क्योंकि इसमें व्यक्ति धीरे-धीरे समाज से अलग होकर एक वैचारिक दुनिया में खो जाता है, जहां हिंसा को सही उहराया जाता है। ऐसी घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं हैं, बल्कि समाज की भी जिम्मेदारी हैं। परिवार, मित्र और शिक्षण संस्थान ऐसे बदलावों को सबसे पहले पहचान सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार में अचानक बदलाव आता है, जैसे सामाजिक अलगाव, अत्यधिक कट्टर विचार, या ऑनलाइन गतिविधियों में असामान्य वृद्धि, तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। माता-पिता और शिक्षकों को युवाओं के साथ संवाद बनाए रखना चाहिए। केवल निगरानी ही नहीं, बल्कि समझ और मार्गदर्शन भी जरूरी है। यदि हम शुरुआती संकेतों को पहचान लें, तो कई संभावित घटनाओं को रोका जा सकता है। सरकार की भूमिका इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। साइबर मॉनिटरिंग को मजबूत करना, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को जवाबदेह बनाना और डि-रेडिकलाइजेशन कार्यक्रमों को लागू करना समय की मांग है। केवल कड़े कानून बनाना पर्यास नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की भी आवश्यकत्ता है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी जरूरी है, क्योंकि ऑनलाइन कट्टरपंथ की जड़ें अक्सर वैश्विक होती हैं। विभिन्न देशों को मिलकर इस समस्या का समाधान खोजना होगा, ताकि आतंकी संगठनों के डिजिटल नेटवर्क को तोड़ा जा सके। इस घटना के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं, जो स्वाभाविक है। लेकिन यह आवश्यक है कि ऐसे मामलों को राजनीतिक लाभ-हानि के नजरिए से न देखा जाए। आतंकवाद किसी एक दल या विचारधारा का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है। सभी राजनीतिक दलों को मिलकर एक साझा रणनीति बनानी चाहिए, जिससे इस प्रकार की घटनाओं को रोका जा सके। साथ ही, यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी एक व्यक्ति के कृत्य के आधार पर पूरे समुदाय को दोषी ठहराना न केवल गलत है, बल्कि यह सामाजिक विभाजन को भी बढ़ावा देता है। मीरा रोड की घटना हमें यह सिखाती है कि हमें संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा। एक ओर, हमें अपराधी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए और पीड़ितों को न्याय दिलाना चाहिए। दूसरी ओर, हमें यह भी सुनिश्चित करना करना होगा कि समाज में नफरत और डर और विभाजन न फैले। आतंकवाद का उद्देश्य ही होता है डर और अविश्वास पैदा करना। यदि हम आपसी सद्भाव बनाए रखते हैं, तो हम इस उद्देश्य को विफल कर सकते हैं।
यह समय है जब समाज को एकजुट होकर इस चुनौती का सामना करना चाहिए। भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए बहु-स्तरीय रणनीति की आवश्यकता है। इसमें परिवार, समाज, सरकार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग सभी की भूमिका है। शिक्षा प्रणाली में भी बदलाव लाना होगा, ताकि युवाओं को आलोचनात्मक सोच और डिजिटल साक्षरता सिखाई जा सके। साथ ही, मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है। अकेलापन और निराशा कई बार लोगों को गलत रास्ते पर ले जा सकते हैं। यदि समय पर सहायता मिल जाए, तो ऐसे मामलों को रोका जा सकता है।
मीरा रोड का हमला एक चेतावनी है, एक ऐसी चेतावनी जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह हमें याद दिलाता है कि आतंकवाद का खतरा बदल रहा है और हमें भी अपनी रणनीतियां बदलनी होंगी। राजकुमार मिश्रा और सुन्नतो सेन जैसे निर्दोष लोग इस हिंसा के शिकार बने हैं। उनके लिए न्याय सुनिश्चित करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही, हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में कोई और इस तरह की घटना का शिकार न बने।
यह लड़ाई केवल सुरक्षा एजेंसियों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। यदि हम मिलकर प्रयास करें, तो हम इस चुनौती का सामना कर सकते हैं और एक सुरक्षित, समावेशी और शांतिपूर्ण समाज का निर्माण कर सकते हैं। हमें यह समझना होगा कि सुरक्षा केवल पुलिस या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह समाज के हर व्यक्ति की साझा जिम्मेदारी है। यदि हम सतर्क रहें, संवाद बनाए रखें और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दें, तो इस तरह की घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है। इंसानियत को हैवानियत और बर्बरता की ओर धकेलने की धृष्टता अक्षम्य अपराध है और कुछ मजहबी उन्मादी तत्व दिन रात इस तरह की अराजकता फैलाने वाले समाजकंटकों की फसल तैयार करने में लगे हुए हैं इनसे सावधान रहना होगा।