भरत देवड़वाल
जयपुर/स्मार्ट हलचल|हाल ही में आईजी मानवाधिकार किशन सहाय वरिष्ठ (IPS) के खिलाफ 53 वर्षीय महिला की ओर से डाक द्वारा भेजी गई चिट्ठी के माध्यम से महिला ने अपनी और से दुष्कर्म का मामला दर्ज कराए जाने के बाद एक बार फिर न्याय व्यवस्था और समाज में सच्चाई को लेकर देश-प्रदेश भर में कहीं सामाजिक संगठनों, कानूनविदों विषेशज्ञों, में बहस तेज हो गई है। सामाजिक संगठनों विषेशज्ञों,सांसद, विधायक ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए,
गंभीर सवाल खड़े किए है। केवल एक साधारण शिकायत, वह भी कथित रूप से एक पोस्टल कार्ड के आधार पर बिना ठोस जांच के एफआईआर दर्ज करना और तत्काल एपीओ करना, प्रशासनिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है?
क्या अब किसी भी प्रतिष्ठित अधिकारी की साख केवल एक पत्र के आधार पर तय होगी? जांच से पहले दंड जैसी स्थिति बनाना न केवल व्यक्ति विशेष के सम्मान के साथ अन्याय है, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता को भी कमजोर करता है।
मालवीय नगर थाने में डाक से भेजी गई शिकायत पर 29 अप्रैल को एफआईआर दर्ज की गई है। मामले की तफ्तीश एडिशनल डीसीपी जिज्ञासा को सौंपी गई है।
*क्या है मामला:*
एफआईआर के अनुसार महिला ने आरोप लगाया है कि आईपीएस किशन सहाय ने शादी का झांसा देकर सरकारी आवास पर बुलाया और जबरदस्ती की। साथ ही मोबाइल बंद कर मारपीट करने, शिकायत न करने की धमकी देने और तीन माह से वीडियो कॉल कर धमकाने के आरोप भी लगाए हैं।
*आईपीएस किशन सहाय का पक्ष:*
आईजी किशन सहाय ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वे पिछले 10 साल से वैज्ञानिक दृष्टिकोण व विज्ञानवाद की विचारधारा का प्रचार कर रहे हैं। इसी के खिलाफ यह षड्यंत्र रचा गया है। उन्होंने कहा कि “पुलिस तफ्तीश में सारी चैट निकलवाकर जांच करेगी तो सारा षड्यंत्र सामने आ जाएगा।”
*विशेषज्ञों की राय: बिना ठोस सबूत के आरोप लगाना वर्दीधारी तंत्र और कानून व्यवस्था की साख को कि नुकसान*
कानून विशेषज्ञों और समाज के प्रबुद्धजनों का मानना है कि बिना ठोस सबूत के इस तरह के गंभीर आरोप न केवल एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाते हैं, बल्कि पूरे वर्दीधारी तंत्र और कानून व्यवस्था की साख को भी नुकसान पहुंचाते हैं। निजी रंजिश, द्वेष या सस्ती लोकप्रियता के लिए लगाए गए झूठे आरोप समाज में एक खतरनाक प्रवृत्ति को जन्म देते हैं।
*सामाजिक संगठनों व जनप्रतिनिधियों ने रखी निष्पक्ष जांच की मांग:*
वहीं सोशल मीडिया व सांसद, विधायकों ने आईजी का पक्ष लेते सोशल मीडिया पर जमकर बहस छिड़ी हुई हैं,विषेशज्ञों व सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों व वरिष्ठजनों ने आईजी किशन सहाय का पक्ष लेते हुए कहना है की एक ईमानदार वरिष्ठ आईजी आईपीएस पुलिस अधिकारी पर इस तरह के आरोप बेबुनियाद हैं, उन्होंने मांग की है सरकार को कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच और सच्चाई का सामने लाना बेहद आवश्यक है, ताकि न्याय प्रणाली पर लोगों का विश्वास बना रहे। समाज के कई वर्गों सामाजिक संगठनों जनप्रतिनिधियों ने ईमानदार अधिकारियों के समर्थन में आवाज उठाई है और न्याय की निष्पक्ष प्रक्रिया पर भरोसा जताया है।
निर्दोष अधिकारियों की छवि खराब करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग भी तेज हो रही है, ताकि भविष्य में कोई भी बेगुनाह इस तरह की साजिश का शिकार न बने।
कानून सभी के लिए समान है और झूठ की उम्र लंबी नहीं होती। समय के साथ सत्य अवश्य उजागर होता है।
