तालाब सूखे हों या अभियान, कागजों में सब लबालब!
शाहपुरा-मूलचन्द पेसवानी
शाहपुरा में इन दिनों “वंदे गंगा जल संरक्षण-जन अभियान 2026” की बड़ी चर्चा है। चर्चा इसलिए नहीं कि लोग जल संरक्षण को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं, तालाबों की पालों पर फावड़े चल रहे हैं या गांव-गांव में जल चेतना की गूंज सुनाई दे रही है। चर्चा इसलिए है क्योंकि अभियान का उद्घाटन ऐसा हुआ कि जनता को पता ही नहीं चला कि कोई अभियान शुरू भी हुआ है या नहीं!
प्रदेश सरकार ने गंगा दशहरा के पावन अवसर पर बड़े उद्देश्य के साथ इस अभियान की शुरुआत की। मंशा साफ थी कृ पानी बचाओ, भूजल बढ़ाओ, तालाब संवारो, पर्यावरण बचाओ और जनता को जोड़ो। सरकार चाहती थी कि यह अभियान सरकारी फाइलों से निकलकर जन आंदोलन बने। गांव का किसान, शहर का नागरिक, पर्यावरण प्रेमी, सामाजिक कार्यकर्ता, विद्यार्थी, महिलाएं और मीडिया सब इसकी ताकत बनें।
लेकिन शाहपुरा में कुछ अधिकारियों ने शायद “जन अभियान” का अर्थ “जनता से दूर अभियान” समझ लिया।
बताते हैं कि अभियान का शुभारंभ बड़े ठाठ से उम्मेदसागर बांध पर किया गया। सरकारी गाड़ियां पहुंची, कुर्सियां लगीं, फोटो खिंचे, कुछ भाषण हुए और फिर सरकारी वेबसाइट पर तस्वीरें अपलोड कर अभियान को सफल घोषित करने की तैयारी भी पूरी हो गई। बस एक छोटी सी कमी रह गई कृ जनता नहीं थी!
जल संरक्षण के क्षेत्र में वर्षों से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं को सूचना देना जरूरी नहीं समझा गया। पर्यावरण प्रेमियों को बुलाना शायद विभाग की “कार्य योजना” में शामिल नहीं था। यहां तक कि मीडिया को भी कार्यक्रम से ऐसे दूर रखा गया मानो पत्रकार नहीं, बांध का पानी चुराने आ रहे हों।
अब जरा सोचिए, जिन लोगों ने वर्षों तक तालाबों की पाल बचाने, वर्षाजल संरक्षण, कुओं के पुनर्जीवन और पर्यावरण चेतना के लिए काम किया, उन्हीं को इस अभियान से दूर रखा गया। यदि वे मौजूद रहते तो अनुभव साझा होते, स्थानीय जरूरतों पर चर्चा होती, भविष्य की कार्ययोजना बनती और अभियान में जान आती। मगर साहबों को तो “जनभागीदारी” से ज्यादा “फोटो भागीदारी” पसंद आ रही है।
सूत्र बताते हैं कि उम्मेदसागर बांध पर काम करने वाली जल उपयोक्ता संगम के सदस्यों तक को कार्यक्रम की सूचना नहीं दी गई। यानी जिस घर में शादी हो रही हो, वहीं के लोगों को न्योता नहीं!
अभियान 5 जून तक चलना है, लेकिन दूसरे ही दिन कार्यक्रमों की रफ्तार ऐसी हो गई जैसे गर्मी में सूखती नाड़ी। आगे क्या होगा, इसकी योजना तक स्पष्ट नहीं बताई जा रही। नुक्कड़ नाटक, प्रभात फेरी, कलश यात्रा, रैली, जल चेतना अभियान कृ सब सरकारी निर्देशों में खूब चमक रहे हैं, लेकिन धरातल पर हाल ऐसा है जैसे बरसात से पहले सूखा पड़ा खेत।
शाहपुरा में लोग अब मजाक में कहने लगे हैं कि यहां “जल संरक्षण” से ज्यादा “सूचना संरक्षण” हो रहा है। सूचना इतनी सुरक्षित रखी गई कि किसी आम आदमी तक पहुंची ही नहीं।
सरकार बार-बार कह रही है कि जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाना है। मीडिया की भूमिका अहम है। समाज की भागीदारी जरूरी है। आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी बचाना है। लेकिन यदि स्थानीय स्तर पर बैठे कुछ अधिकारी इसे सिर्फ औपचारिकता मानकर चलेंगे तो फिर यह अभियान भी उन सरकारी नारों की सूची में शामिल हो जाएगा, जिनकी गूंज केवल फाइलों में सुनाई देती है।
सबसे दिलचस्प बात तो यह रही कि कार्यक्रम में मौजूद लोगों की संख्या का आंकलन करें तो मुश्किल से दस प्रतिशत ही वास्तविक भागीदारी दिखाई दी। बाकी वही सरकारी अमला, विभागीय कर्मचारी और योजना से जुड़े लोग। जनता वहां उतनी ही दिखी जितनी चुनाव के बाद नेताओं के आसपास आम आदमी दिखता है।
शाहपुरा का आईना यह सवाल पूछता है कि आखिर डर किस बात का है? यदि सामाजिक कार्यकर्ता आएंगे तो सवाल पूछेंगे? यदि मीडिया पहुंचेगा तो सच्चाई लिख देगा? यदि जनता जुड़ेगी तो केवल फोटो से काम नहीं चलेगा?
जल संरक्षण कोई एक दिन का सरकारी उत्सव नहीं है। यह आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है। शाहपुरा जैसे क्षेत्र, जहां गर्मी में जल संकट की स्थिति लगातार गहराती जा रही है, वहां ऐसे अभियानों की सफलता केवल भाषणों और फोटो अपलोड से नहीं होगी। इसके लिए जमीन पर काम करना पड़ेगा, समाज को साथ लेना पड़ेगा और सबसे बड़ी बात कृ अहंकार छोड़ना पड़ेगा।
अब खबर यह भी है कि जल संरक्षण और पर्यावरण क्षेत्र में काम करने वाले कुछ कार्यकर्ताओं ने अपनी पीड़ा राज्य सरकार तक पहुंचाई है। देखना यह होगा कि सरकार जनसरोकारों की आवाज सुनती है या फिर “सब बढ़िया चल रहा है” वाली सरकारी रिपोर्टों पर ही भरोसा करती रहती है।
फिलहाल शाहपुरा में “वंदे गंगा” अभियान की स्थिति देखकर लोग यही कह रहे हैं
“पानी बचाने निकले थे साहब, पर पहले जनता को ही सुखा दिया!”
