राजकुमार जैन
स्मार्ट हलचल।लोकतंत्र में पुलिस शायद उन विरल संस्थाओं में से एक है, जो एक साथ विश्वास, भय, अपेक्षा और असंतोष का केंद्र बनी रहती हैं। दुनिया के लगभग हर समाज में पुलिस व्यवस्था को लेकर प्रश्न उठते हैं—कहीं भ्रष्टाचार को लेकर, कहीं अधिकारों के अतिक्रमण को लेकर, तो कहीं नागरिकों के प्रति संवेदनशीलता के अभाव को लेकर। इन प्रश्नों का उठना लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का संकेत है, क्योंकि किसी भी सार्वजनिक संस्था को आलोचना से परे नहीं माना जा सकता।
किन्तु इस बहस के बीच एक ऐसा प्रश्न है, जिसे हम प्रायः अनदेखा कर देते हैं। क्या पुलिस वास्तव में केवल एक प्रशासनिक संस्था है, अथवा वह उस समाज का प्रतिरूप भी है, जिसने उसे जन्म दिया है?
हमारी सामान्य प्रवृत्ति पुलिस और समाज को दो पृथक संसारों की तरह देखने की है। मानो वर्दी पहनते ही कोई व्यक्ति सामाजिक जीवन के सामान्य नियमों और संस्कारों से मुक्त होकर किसी अलग ही व्यवस्था का हिस्सा बन जाता हो। जबकि सच इसके ठीक विपरीत है। पुलिसकर्मी किसी अन्य ग्रह से नहीं आते। वे उसी मिट्टी में जन्म लेते हैं, उसी पारिवारिक वातावरण में बड़े होते हैं, उन्हीं विद्यालयों में पढ़ते हैं, उन्हीं सामाजिक मान्यताओं को आत्मसात करते हैं और उन्हीं आकर्षणों, दबावों तथा महत्वाकांक्षाओं के बीच अपना व्यक्तित्व गढ़ते हैं, जिनके बीच हम सब अपना जीवन व्यतीत करते हैं।
इस दृष्टि से देखें तो पुलिस समाज से बाहर खड़ी संस्था नहीं, बल्कि समाज की संगठित अभिव्यक्ति है। इसलिए जब हम पुलिस की किसी विकृति पर उंगली उठाते हैं, तब कहीं न कहीं उस सामाजिक संरचना की ओर भी संकेत कर रहे होते हैं, जिसने उन विकृतियों को जन्म दिया है।
वास्तविक संकट पुलिस से अधिक हमारे सामूहिक नैतिक चरित्र का है। हम कानून के शासन की बात करते हैं, किंतु जब वही कानून हमारे हितों के प्रतिकूल पड़ता है, तो उसके अपवाद खोजने लगते हैं। हम निष्पक्षता का समर्थन करते हैं, परंतु अपने परिचितों के लिए विशेष व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं। हम भ्रष्टाचार को सार्वजनिक रूप से कोसते हैं, किंतु निजी सुविधा के लिए उसी भ्रष्टाचार का सहारा लेने में संकोच नहीं करते।
विडंबना यह है कि हम नियमों के पालन की अपेक्षा दूसरों से करते हैं, स्वयं से नहीं।
यदि कोई अधिकारी प्रभाव, धन अथवा सामाजिक दबाव के आगे झुक जाए, तो उसे व्यवहारकुशल कहा जाता है; लेकिन यदि वही अधिकारी नियमों का कठोरता से पालन करे, तो उसके लिए संवेदनहीन, अक्खड़ या भ्रष्ट जैसे विशेषण खोज लिए जाते हैं। यह विरोधाभास केवल पुलिस व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का दर्पण है, जिसमें नैतिकता को सिद्धांत नहीं, सुविधा की वस्तु समझ लिया गया है।
किसी भी राष्ट्र की संस्थाएँ शून्य में निर्मित नहीं होतीं। वे उसी सांस्कृतिक और नैतिक वातावरण की उपज होती हैं, जिसमें समाज साँस लेता है। यदि किसी समाज में प्रभाव को योग्यता से अधिक महत्व मिलता हो, यदि सफलता को चरित्र से ऊपर रखा जाता हो और यदि सत्य की तुलना में सुविधा अधिक आकर्षक लगती हो, तो उसकी संस्थाओं में भी वही प्रवृत्तियाँ दिखाई देंगी।
निस्संदेह, इसका अर्थ यह नहीं कि पुलिस की कमियों को अनदेखा कर दिया जाए। शक्ति का दुरुपयोग, अन्याय और भ्रष्टाचार किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकते। लोकतंत्र में जवाबदेही अनिवार्य है। परंतु केवल संस्थाओं को कटघरे में खड़ा कर देने से समस्या का समाधान नहीं होता। यदि हम परिणामों पर आक्रोश व्यक्त करते रहें और उनके सामाजिक कारणों को समझने से बचते रहें, तो सुधार की प्रक्रिया अधूरी ही रहेगी।
हमारे सार्वजनिक विमर्श की एक और दुर्बलता है। हम अच्छाई को सामान्य मान लेते हैं और बुराई को असाधारण घटना बनाकर प्रस्तुत करते हैं। दंगों, महामारी, प्राकृतिक आपदाओं और संकट के समय हजारों पुलिसकर्मी अपने परिवारों से दूर रहकर समाज की सुरक्षा में लगे रहते हैं। अनेक बार वे अपने स्वास्थ्य और जीवन तक को जोखिम में डाल देते हैं। किंतु उनके त्याग की कहानियाँ प्रायः चर्चा का विषय नहीं बनतीं।
इसके विपरीत, किसी एक अधिकारी की गलती पूरे पुलिस तंत्र की पहचान बना दी जाती है।
एक परिपक्व समाज का दायित्व केवल अन्याय की आलोचना करना नहीं, बल्कि ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा का सम्मान करना भी है। सत्य न तो केवल निंदा में निहित है और न केवल प्रशंसा में; वह दोनों के बीच संतुलित दृष्टि में निवास करता है।
दरअसल, पुलिस पर होने वाली हर चर्चा समाज के आत्ममंथन का अवसर भी होनी चाहिए। यदि दर्पण में दिखाई देने वाला चेहरा असुंदर लगे, तो दोष दर्पण का नहीं होता। दर्पण तो केवल वही दिखाता है जो उसके सामने उपस्थित है। पुलिस भी कुछ ऐसी ही संस्था है। उसमें हमें अपने ही समाज का अनुशासन, अपनी ही नैतिकता, अपने ही समझौते और अपनी ही कमजोरियाँ प्रतिबिंबित दिखाई देती हैं।
इसलिए स्थायी परिवर्तन केवल नए कानूनों, आयोगों या प्रशासनिक सुधारों से नहीं आएगा। उसका आरंभ मनुष्य के भीतर होगा। जब परिवार सफलता के साथ सत्यनिष्ठा का संस्कार देंगे, जब विद्यालय उपलब्धियों के साथ चरित्र निर्माण को भी महत्व देंगे, और जब नागरिक स्वयं नियमों के पालन को अपना नैतिक दायित्व मानेंगे, तभी संस्थाएँ भी बदलेंगी।
किसी व्यवस्था का वास्तविक उत्थान संसदों, सचिवालयों और पुलिस मुख्यालयों से पहले नागरिक के अंतःकरण में प्रारंभ होता है।
अंततः पुलिस सुधार का प्रश्न समाज सुधार से अलग नहीं है। पुलिस कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि उसी समाज का अनुशासित और संगठित रूप है, जिसे हमने अपने व्यवहार, मूल्यों और प्राथमिकताओं से निर्मित किया है।
इसलिए पुलिस को बदलने की आकांक्षा से पहले हमें स्वयं से यह पूछना चाहिए—क्या हम ऐसे समाज के निर्माण के लिए तैयार हैं, जिसकी वर्दी को देखकर हमें आलोचना नहीं, गर्व का अनुभव हो?
