जिला प्रशासन ध्यान दे तो चित्तौड़गढ़ विकास के मामले में फिसड्डी नही बल्कि अग्रणी जिला बन सकता है।
ओम जैन
शंभूपुरा।स्मार्ट हलचल।चित्तौड़गढ़ जिले में औद्योगिक विस्तार और फैक्ट्रियों के भारी-भरकम टर्नओवर के बावजूद स्थानीय विकास की जमीनी हकीकत पर अब सवाल उठाने लगे है।
फैक्ट्रियों का करोड़ों का CSR, फिर भी विकास में पिछड़ा
चित्तौड़गढ़ की पहचान देश-दुनिया में सिर्फ शौर्य, त्याग और भक्ति की पावन धरा के रूप में ही नहीं, बल्कि राजस्थान के एक प्रमुख औद्योगिक केंद्र (Industrial Hub) के रूप में भी है। सीमेंट उत्पादन से लेकर अन्य बड़े उद्योगों के मामले में यह जिला अग्रणी भूमिका निभाता है। नियम के मुताबिक, इन उद्योगों को अपने मुनाफे का एक निश्चित हिस्सा कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत स्थानीय क्षेत्र के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण सुधार पर खर्च करना होता है।
कागजों पर हर साल करोड़ों रुपये का सीएसआर फंड जारी भी होता है, लेकिन धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। आज भी चित्तौड़गढ़ का एक बड़ा हिस्सा बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। आखिर क्या वजह है कि फैक्ट्रियों के करोड़ों के बजट के बाद भी विकास के मामले में यह जिला फिसड्डी साबित हो रहा है?
सीएसआर का बड़ा बजट, मगर धरातल पर कमी
बड़ी कंपनियों को अपने पिछले तीन वर्षों के शुद्ध लाभ का 2% सामाजिक विकास कार्यों में लगाना अनिवार्य होता है। चित्तौड़गढ़ जिले में स्थापित सीमेंट प्लांट जेके, वंडर, नुवोको, आदित्य, बिड़ला व जेके और अन्य खदानों, मार्बल व्यवसाय से हर साल करोड़ों रुपये का फंड जनरेट होता है। लेकिन इस भारी-भरकम राशि का एक बड़ा हिस्सा या तो प्रशासनिक फाइलों में अटका रहता है या जनप्रतिनिधियों ने बैंक बैलेंस बढ़ा रहा या फिर ऐसे कामों में लगा दिया जाता है जिनका आम जनता को सीधा लाभ नहीं मिल पाता।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव और जन-समस्याएं
औद्योगिक क्षेत्र के आस-पास के गांवों और कस्बों पर नजर डालें, तो विकास के दावों की पोल खुल जाती है-
सड़कों की बदहाली:
इन सीमेंट प्लांटों ओर मार्बल फेक्ट्रियो के भारी वाहनों के लगातार आवागमन के कारण स्थानीय सड़कें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। आए दिन होने वाले हादसों से स्थानीय लोग सहमे रहते हैं, लेकिन सड़कों के सुदृढ़ीकरण पर सीएसआर फंड का सही इस्तेमाल नहीं दिख रहा।
स्वास्थ्य सेवाओं की कमी:
फेक्ट्रियो से निकलने वाले प्रदूषण (धूल और धुआं) के कारण स्थानीय आबादी में श्वास, फेफड़ों और त्वचा से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इसके बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में समय समय पर जांच, आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं या स्पेशलिस्ट डॉक्टरों वाले अस्पतालों का घोर अभाव है।
पेयजल का संकट:
कई औद्योगिक इकाइयों के कारण भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। कई गांवों में आज भी शुद्ध पीने के पानी के लिए महिलाओं को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
प्रदूषण का दंश झेलती स्थानीय जनता
चित्तौड़गढ़, निम्बाहेड़ा और इसके आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों के ग्रामीण फैक्ट्रियों के प्रदूषण की सबसे बड़ी मार झेल रहे हैं। खेतों पर सीमेंट की धूल जमने से फसलों की पैदावार प्रभावित हो रही है। नियमानुसार, सीएसआर फंड का एक बड़ा हिस्सा पर्यावरण संरक्षण और सघन वृक्षारोपण पर खर्च होना चाहिए, लेकिन ग्रीन बेल्ट विकसित करने के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है।
स्थानीय युवाओं को रोजगार से महरुम रखना
उद्योगों की स्थापना के समय यह भरोसा दिलाया जाता है कि स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता दी जाएगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि उच्च पदों और तकनीकी कार्यों में बाहरी लोगों को प्राथमिकता मिलती है, जबकि स्थानीय युवाओं को केवल कम वेतन वाले या संविदा/ ठेकाकर्मी आधारित मजदूरी के कामों तक सीमित कर दिया जाता है। इससे स्थानीय स्तर पर आर्थिक संपन्नता की जगह असंतोष बढ़ रहा है।
कहां कमी रह जाती है? प्रशासनिक या राजनीतिक हस्तक्षेप
जवाबदेही और मॉनिटरिंग का अभाव:
जिला प्रशासन और संबंधित विभागों द्वारा कंपनियों के सीएसआर खर्च का कड़ाई से ऑडिट नहीं किया जाता। कंपनियां अक्सर अपनी मर्जी से प्रोजेक्ट चुनती हैं, जो जनता की वास्तविक जरूरतों से मेल नहीं खाते।
जनप्रतिनिधियों और जनता की आवाज की अनदेखी:
सीएसआर के तहत कौन से कार्य करवाए जाने हैं, इसमें स्थानीय ग्राम पंचायतों या प्रबुद्ध नागरिकों से राय मशविरा बहुत कम किया जाता है।
निष्कर्ष और समाधान
चित्तौड़गढ़ जिले को विकास की दौड़ में आगे ले जाने के लिए अब केवल कागजी दावों से काम नहीं चलेगा। यदि जिला प्रशासन सजगता दिखाए और निम्नलिखित कदम उठाए, तो तस्वीर बदल सकती है:
पारदर्शी जिला सीएसआर पोर्टल:
एक ऐसा डिजिटल सिस्टम हो जहां हर कंपनी के सीएसआर फंड और स्वीकृत कार्यों की लाइव ट्रैकिंग जनता के सामने हो।
वास्तविक आवश्यकता का आकलन
उद्योगों के आस-पास के 50 किलोमीटर के दायरे में शिक्षा, स्वास्थ्य और शुद्ध पेयजल की मैपिंग करवाकर प्राथमिकता तय की जाए।
प्रदूषण नियंत्रण पर सख्त रुख:
जो कंपनियां पर्यावरण मानकों का उल्लंघन कर रही हैं, उन पर भारी जुर्माना लगाने के साथ-साथ सीएसआर का पैसा सीधे प्रभावित गांवों के विकास में डायवर्जन किया जाए।
चित्तौड़गढ़ की जनता विकास की हकदार है, क्योंकि वे उद्योगों की समृद्धि के बदले अपनी जमीन, पानी और स्वच्छ हवा का बलिदान दे रहे हैं। समय आ गया है कि करोड़ों के इस सीएसआर फंड का हिसाब धरातल पर दिखे, ताकि चित्तौड़गढ़ विकास के मामले में फिसड्डी नहीं, बल्कि अग्रणी जिला बन सके।
