धारचूला से कैलाश तक का रहस्यमयी पथ और शास्त्रों में छिपा परम सत्य
(रमाकांत पन्त)
स्मार्ट हलचल।देवभूमि के आंचल में बसा धारचूला केवल एक भौगोलिक सीमा या कस्बा नहीं है, बल्कि उस रहस्यमयी दुनिया का प्रवेश द्वार है जहाँ पहुंचकर इंसानी समझ और विज्ञान के नियम अक्सर मौन हो जाते हैं। काली नदी की गर्जना के बीच स्थित यह स्थान तीर्थ शिरोमणि महातीर्थ कैलाश मानसरोवर यात्रा पथ का महत्वपूर्ण बिंदु है, जहाँ से आगे बढ़ते ही हर कदम पर एक अनजाना रोमांच और गहरा सस्पेंस शुरू हो जाता है। घने कोहरे में लिपटे ऊंचे पहाड़ों को देखकर लगता है मानो वे सदियों से किसी गहरे रहस्य को छुपाए खड़े हों। यात्रियों को यहाँ प्रकृति के ऐसे अनूठे और चमत्कारी रूपों का सामना करना पड़ता है, जो श्रद्धा के साथ मन में अजीब सी सिहरन पैदा कर देते हैं।
जैसे-जैसे मार्ग धारचूला से आगे कुमाऊं मंडल की दुर्गम पहाड़ियों और व्यास घाटी की अलौकिक कंदराओं की ओर बढ़ता है, हवा पतली होने लगती है और दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं। स्थानीय लोककथाओं और प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, इस पूरे पथ पर कुछ अदृश्य शक्तियां और सिद्ध योगी निवास करते हैं जो आम नजरों से दूर हैं। कई बार यात्रियों को एकांत वादियों में अनजान मंत्रोच्चार की गूंज या हवाओं में तैरती दिव्य सुगंध का अनुभव होता है, जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिलता। पथरीले रास्तों, गहरी खाइयों और बादलों को छूती चोटियों के बीच छिपा यह मार्ग रहस्य का ऐसा ताना-बाना बुनता है, जिसमें हर मोड़ पर नई पहेली मिलती है।
यात्रा का चरम सस्पेंस तब गहरा जाता है जब यात्री पावन मानसरोवर और कैलाश के समीप पहुंचता है। सनातन संस्कृति में देवात्मा माने जाने वाले हिमालय के उत्तुंग शिखरों के बीच प्रतिष्ठित महातीर्थ कैलाश केवल भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि चेतना का सर्वोच्च शिखर है जहां मनुष्य का अहंकार शून्य हो जाता है और आत्मा परम सत्ता से एकाकार होने लगती है। पुराणों में इस क्षेत्र की अलौकिक गुफाओं का वर्णन है, जहां माना जाता है कि समय की गति बदल जाती है। शांत मानसरोवर के जल में अचानक उठने वाली तरंगें और रात के सन्नाटे में आकाश से उतरती रहस्यमयी रोशनी इस स्थान को विस्मयकारी बनाती हैं।
हिंदू धर्म में यह देवाधिदेव महादेव का साक्षात निवास, जैन परंपरा में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का निर्वाण स्थल अष्टापद, और बौद्ध संस्कृति में भगवान चक्रसंवर का वास माना जाने वाला यह वैश्विक आध्यात्मिक केंद्र अनसुलझे रहस्यों से भरा है। धारचूला से मोक्ष के इस अंतिम बिंदु तक का पथ केवल शारीरिक यात्रा नहीं, बल्कि प्रकृति के अनछुए रहस्यों से आमना-सामना करने का सफर है। यह यात्रा मानसिक दृढ़ता और अगाध श्रद्धा की परीक्षा लेती है, क्योंकि मान्यता है कि शिव की कृपा के बिना कोई इस महामार्ग पर कदम नहीं बढ़ा सकता।
इन रहस्यों की गहराई समझने के लिए हमें शास्त्रों की ओर मुड़ना होगा। स्कन्द पुराण के मानसखण्ड के सातवें अध्याय से एक अलौकिक विवरण सामने आता है। कथा का आरंभ राजा जनमेजय और सूत जी के संवाद से होता है। शिव-पार्वती विवाह सुनने के बाद राजा के मन में हिमालय के पुनीत चरित्र को जानने की तीव्र जिज्ञासा उत्पन्न होती है। सूत जी वेदव्यास द्वारा वर्णित उस परम रहस्यमयी गाथा को सामने लाते हैं जो सामान्य बुद्धि से परे है।
प्राचीन पृष्ठों से पता चलता है कि महर्षि वेदव्यास ने हिमालय को केवल पर्वत नहीं, बल्कि समस्त पापों को नष्ट करने वाली जीवित चेतना बताया है। मान्यता है कि सूर्योदय के समय जैसे बर्फ पिघलती है, वैसे ही इस पर्वतराज के दर्शन मात्र से करोड़ों जन्मों के पाप विलीन हो जाते हैं। इसी महिमा से आकर्षित होकर योगी दत्तात्रेय सह्याद्रि छोड़कर यहाँ आए, जहाँ स्वर्ण खानें, कस्तूरी मृग और भोजपत्र के वृक्ष रहस्यमयी वातावरण बनाते हैं।
दत्तात्रेय के आगमन पर साक्षात हिमालय ने साकार रूप धारण कर उनका स्वागत किया। इस मिलन में दत्तात्रेय ने विन्ध्याचल सहित अन्य पर्वतों की तुलना में हिमालय को सर्वश्रेष्ठ बताया क्योंकि यहाँ स्वयं महादेव का वास है। शिव-पार्वती विवाह की सूचना पाकर वे इस क्षेत्र के गुप्त तीर्थों और शिवलिंगों के दर्शन को आतुर थे।
इसके बाद पर्वतराज हिमालय ने दत्तात्रेय को ब्रह्मा की मानस सृष्टि के प्रतीक अलौकिक मानसरोवर के दर्शन कराए। इसके मध्य में भगवान शिव का चमकदार सुवर्णमय लिंग स्थापित था, जहाँ भोलेनाथ राजहंस का रूप धारण कर विचरण करते थे। यहाँ साक्षात गंगा का अवतरण और देवताओं द्वारा रचित गुप्त गुफाओं का जाल था, जिसे देखकर दत्तात्रेय भावविभोर हो उठे।
यात्रा का चरमोत्कर्ष तब आता है जब दत्तात्रेय कैलाश पर साक्षात महादेव के सम्मुख पहुँचे। घनी जटाओं वाले नीलकंठ की स्तुति से महादेव प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहा। दत्तात्रेय ने वर रूप में यह शक्ति मांगी कि संपूर्ण पृथ्वी उनके लिए कभी अगम्य न रहे।
आख्यान का सबसे बड़ा रहस्य तब उजागर होता है जब स्वयं शंकर दत्तात्रेय के संशयों का निवारण करते हैं। दिव्य संवादों से स्पष्ट है कि महादेव ने स्वीकार किया कि यद्यपि वे विंध्याचल में भी निवास करते हैं, परंतु हिमालय उनका सबसे प्रिय और अविनाशी धाम है जिसे उन्होंने तीनों कालों में कभी नहीं छोड़ा। इसके उत्तर भाग में स्थित नन्द-पर्वत पर स्वयं ब्रह्मा और विष्णु उनकी आराधना करते हैं।
महादेव की आज्ञा पाकर दत्तात्रेय ने उन गुप्त मार्गों का अनुसरण किया जो केदारमंडल और बदरिकाश्रम की ओर जाते थे। जामुन के वृक्षों से घिरे सरोवर, नर-नारायण पर्वत और मंदाकिनी के पावन जल का स्पर्श कर उन्होंने अद्वितीय शांति पाई।
इस परम रहस्यमयी ज्ञान को समेटकर योगी दत्तात्रेय काशी लौट आए। स्कन्द पुराण का यह अध्याय आज भी उन साधकों के लिए गुप्त मार्गदर्शिका है जो हिमालय के भौतिक स्वरूप के पीछे छिपी आध्यात्मिक ऊर्जा को खोजना चाहते हैं।
इस प्रकार धारचूला से आरंभ होकर मानसरोवर-कैलाश तक फैला यह पथ और शास्त्रों में वर्णित यह आख्यान दोनों मिलकर बताते हैं कि यह यात्रा केवल भूगोल नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के सबसे गूढ़ रहस्य से साक्षात्कार है। यहाँ हर शिला में कथा है, हर हवा में मंत्र है और हर मोड़ पर शिव का मौन आमंत्रण। विज्ञान जहाँ थककर रुक जाता है, श्रद्धा वहाँ से चलना शुरू करती है। कैलाश की ओर बढ़ता हर कदम मनुष्य को उसके भीतर के कैलाश से मिलाने का प्रयास है,जहाँ संदेह मिटता है और केवल परम सत्य शेष रहता है। *(विभूति फीचर्स)*
