लाडपुरा गांव में बुवाई के बाद खेतों की जुताई भी जोर-शोर से चल रही
बुवाई के साथ ही खेतों में फसल जोतने में जुटे किसान
लाडपुरा [ शिव जांगिड़ ] लाडपुरा गांव में इस बार पारंपरिक खेती की झलक एक बार फिर देखने को मिल रही है। बुवाई के साथ-साथ किसान बैलों की जोड़ी से खेतों में फसल हलाई करने में जुटे हैं। सुबह-सुबह खेतों में बैलों के गले की घंटियों की आवाज और किसानों की मेहनत का नजारा आम है। ट्रैक्टर के साथ-साथ कई किसान अब भी बैलों से जुताई और हलाई को बेहतर मानते हैं। उनका कहना है कि बैलों से हलाई करने से मिट्टी भुरभुरी होती है, नमी बनी रहती है और जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बढ़ती है। इस मौसम में गांव में मुख्य रूप से मक्का मूंगफली बाजरा, मूंग और उड़द की बुवाई की है। बीज बोने के तुरंत बाद हल चलाकर मिट्टी को ढक दिया जाता है ताकि बीज अच्छे से अंकुरित हो सके और पक्षियों से भी बचाव हो सके। बुजुर्ग किसान बताते हैं कि “पहले से चली आ रही परंपरा है। मशीनें अपनी जगह, पर बैल से की गई हलाई में मिट्टी का स्वभाव बना रहता है।” युवा किसान भी खेती में हाथ बटा रहे हैं जिससे ये परंपरा आगे बढ़ रही है। गांव में इन दिनों खेतों में मेहनत, उम्मीद और मिट्टी की खुशबू तीनों एक साथ दिख रही हैं।
लाडपुरा गांव में इन दिनों खेतों में रौनक लौट आई है। बुवाई खत्म होते ही किसान अब बैलों की जोड़ी से खेतों में हलाई करने में लगे हैं। बीज बोने के तुरंत बाद हलाई करने से मिट्टी में नमी बनी रहती है और बीज मिट्टी के अंदर अच्छे से दब जाते हैं। इसी वजह से आज भी कई किसान मशीनों के साथ-साथ बैलों से हलाई को जरूरी मानते हैं। सुबह से शाम तक खेतों में बैलों के चलने की आवाज और किसानों की मेहनत साफ दिख रही है। गांव में इस बार मक्का और सोयाबीन मूंगफली और बाजरा, मूंग और उड़द की बुवाई हुई है। किसानों ने बताया “हलाई से खरपतवार भी कम होते हैं और फसल की पैदावार भी अच्छी होती है। ये हमारे बाप-दादा की सीख है।”बुजुर्ग और युवा दोनों पीढ़ी के किसान मिलकर खेती कर रहे हैं। खेतों में मेहनत के साथ-साथ उम्मीद भी है कि समय पर बारिश हुई तो फसल अच्छी होगी।
लाडपुरा क्षेत्र में इस बार मुख्यतः मक्का और मूंगफली की बुवाई हुई है। और बैलों से हलाई करने में किसान जुट गए हैं। गांवों में बुवाई के बाद हलाई का काम, बुवाई हो जाने के बाद बैलों से “हलाई लगाना” बहुत जरूरी होता है। इससे: सुबह तड़के किसान अपने बैलों की जोड़ी के साथ खेत में उतर जाते हैं। एक तरफ बुवाई चल रही है, दूसरी तरफ बुवाई वाले खेतों में हलाई। ट्रैक्टर वाले भी हैं, पर छोटे खेत और पथरीली जमीन में आज भी बैल ही सबसे भरोसेमंद हैं। मूंगफली-मक्का की बुवाई के बाद ये हलाई का काम 2-3 दिन तक चलता है। शाम को बैलों को नहला-धुला कर चारा देना, फिर अगले दिन फिर से खेत।
खेतों का नजारा
बुवाई के साथ-साथ कई किसान अभी भी बैलों से ही खेत हलाई कर रहे हैं। ट्रैक्टर के साथ-साथ बैलों से जुताई करने से मिट्टी भुरभुरी होती है और लागत भी कम आती है। खासकर छोटे खेतों और क्यारियों में बैल ही सबसे सुविधाजनक रहते हैं।
क्यों बैल से हलाई
1. कम खर्च: डीजल-खर्च नहीं, सिर्फ चारा और देखभाल
2. मिट्टी के लिए बढ़िया: बैल के पंजे से मिट्टी ज्यादा दबती नहीं, हवा पास होती रहती है।
3. बुवाई में आसानी: मक्का मूंगफली की लाइन-बुवाई बैलों से अच्छे से हो जाती है।
लाडपुरा गांव में इन दिनों खेतों में चहल-पहल है। मानसून से पहले की तैयारियों के बीच किसान बुवाई के साथ-साथ खेतों की जुताई में भी जुट गए हैं। ट्रैक्टरों की गड़गड़ाहट और बैलों की जोड़ी के साथ सुबह से ही खेतों में काम शुरू हो जाता है। कुछ किसान बीज बोने में लगे हैं तो कुछ खेतों को फसल के लिए तैयार कर रहे हैं। मिट्टी पलटने से नमी बनी रहती है और खरपतवार भी कम होते हैं, इसलिए जुताई और बुवाई एक साथ करना किसानों के लिए फायदेमंद रहता है। किसानों का कहना है कि अगर समय पर बारिश हो गई तो इस बार फसल अच्छी होगी। मेहनत अब है तभी त्योहार पर घर में खुशहाली आएगी।
लाडपुरा में खरीफ की फसल मक्का, मूंगफली, ज्वार, बाजरे, सोयाबिन, उड़द और मूंग की हलाई का सीजन है। सुबह-सुबह ही किसान बैलों को लेकर खेत पहुंच जाते हैं और दिन ढलते तक हलाई करते हैं।
