राजेन्द्र बबलू पोखरना
कोटड़ी।स्मार्ट हलचल|मेवाड़ गौरव एवं प्रखर वक्ता पूज्य गुरुदेव श्री रविन्द्र मुनि महाराज ने प्रवचन के दौरान कहा कि मनुष्य शरीर के बाहरी मेल को धोने और उसे सजाने-संवारने में तो बहुत समय, धन और ऊर्जा खर्च करता है, लेकिन आत्मा पर चढ़े राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी मैल को दूर करने का प्रयास नहीं करता। जब तक आत्मा का मैल समाप्त नहीं होगा, तब तक वास्तविक शांति और भवसागर से मुक्ति संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि बाहरी स्वच्छता आवश्यक है लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण आत्मिक शुद्धि है। तप, त्याग, संयम, स्वाध्याय, ध्यान और धर्म आराधना के माध्यम से आत्मा को निर्मल बनाया जा सकता है। यदि मनुष्य बाहरी आडंबर और व्यर्थ के खर्चों को सीमित कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़े तो उसका जीवन सार्थक बन सकता है। रविन्द्र मुनि ने कहा कि चातुर्मास आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और धर्म साधना का श्रेष्ठ अवसर है। इस अवधि में प्रत्येक व्यक्ति को अपने दोषों का निरीक्षण करते हुए उन्हें दूर करने का संकल्प लेना चाहिए। जीवन की वास्तविक सफलता बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि आत्मा की पवित्रता और सदाचार में निहित है।
प्रवचन के अंत में श्रद्धालुओं से नियमित धर्म आराधना, नवकार मंत्र का जाप, स्वाध्याय तथा संयमपूर्ण जीवन अपनाने का आह्वान किया गया। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के प्रेरक प्रवचनों का श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया। इस दौरान श्री वर्द्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के अध्यक्ष निर्मल लोढ़ा, चातुर्मास समिति के अध्यक्ष शान्ति लाल पोखरना ने चातुर्मास में आयोजित सभी कार्यक्रमो में अधिक से अधिक श्रावक-श्राविकाओं को उपस्थित होने का आह्वान किया। साथ ही तप आराधना कर चातुर्मास को सफल बनाने पर जोर दिया।
