– बिलौता पंचायत में घोटालो व भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश?-आरटीआई में खुली पोल-पंचायत पर गंभीर सवाल,
– पंचायत में पारदर्शिता या प्रबंधन का खेल? ग्राम पंचायत बिलौता में आरटीआई विवाद गहराया
शिवराज बारवाल मीना
उनियारा (टोंक)। स्मार्ट हलचल|उनियारा पंचायत समिति क्षेत्र की ग्राम पंचायत बिलौता में सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी ने पंचायत प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला सिर्फ सूचना देने का नहीं, बल्कि पारदर्शिता बनाम पर्दादारी का बन गया है।
आरटीआई आवेदक लोकेश मीणा निवासी खेड़ली बालाजी ने 17 जनवरी 2026 को विगत पांच वर्षों में हुए विकास एवं निर्माण कार्यों, विभिन्न योजनाओं के खर्च, मस्टर रोल, तकनीकी स्वीकृतियां और उपयोगिता प्रमाण पत्रों की जानकारी मांगी थी।
*पहले बनाया ‘11 हजार पन्नों’ का दबाव*
12 फरवरी को ग्राम विकास अधिकारी ने पत्र जारी कर बताया कि सूचना करीब 11,000 पन्नों में है और 2 रूपये प्रति पेज के हिसाब से 22,000 रूपये की राशि तीन दिन में जमा कराएं। सवाल उठता है — क्या सूचना वास्तव में 11 हजार पन्नों की थी, या आवेदक को हतोत्साहित करने की रणनीति? आवेदक ने 22,000 रूपये की डीडी जमा करा दी। इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे मामले को संदेहास्पद बना दिया।
*11 हजार नहीं, सिर्फ 4500 पन्ने!*
27 फरवरी को पंचायत द्वारा भेजे गए दस्तावेज मात्र लगभग 4,500 पन्नों के निकले। साथ में 13,000 रूपये का चेक लौटाया गया।
*यहां सबसे बड़ा सवाल यही है —*
यदि सूचना 11 हजार पन्नों की नहीं थी, तो 22 हजार क्यों जमा करवाए गए?
क्या पहले गलत आकलन किया गया?
या फिर जानबूझकर भारी भरकम संख्या बताकर सूचना को रोकने की कोशिश की गई?
*जिन मदों में गड़बड़ी की आशंका, वही रिकॉर्ड गायब?*
आरोप है कि जिन विकास और निर्माण कार्यों में अनियमितताओं की आशंका है, उन्हीं से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। कार्टन में भरे कागजों में कई ऐसे दस्तावेज शामिल हैं जिनका आवेदन से सीधा संबंध नहीं बताया जा रहा। यदि रिकॉर्ड पूरा है, तो छिपाने की जरूरत क्यों? और यदि रिकॉर्ड अधूरा है, तो विकास कार्यों की पारदर्शिता कहां है?
*प्रशासनिक जवाबदेही पर सीधा सवाल*
यह मामला अब सिर्फ पंचायत स्तर का नहीं रहा।
*प्रशासन के सामने ये सवाल खड़े हैं :*
क्या ग्राम पंचायत में रिकॉर्ड प्रबंधन पारदर्शी है?
क्या सूचना को जानबूझकर उलझाया गया?
क्या संबंधित अधिकारी पर सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20 के तहत कार्रवाई होगी?
क्या पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?
सूचना का अधिकार अधिनियम नागरिक को जवाब मांगने का अधिकार देता है, लेकिन यदि सूचना को ही भ्रमित कर दिया जाए तो यह कानून की मूल भावना पर चोट है।
*मामला प्रथम अपील की ओर*
अब मामला प्रथम अपील में ग्राम पंचायत बिलौता के सरपंच (प्रशासक) की ओर बढ़ चुका है। यदि वहां भी संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है तो प्रकरण द्वितीय अपील में राज्य सूचना आयोग तक जाएगा। स्थानीय स्तर पर सामाजिक अंकेक्षण और उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज हो रही है।
*असली सवाल*
क्या विकास कार्यों का पूरा हिसाब सार्वजनिक होगा?
या फिर कागजों के बोझ में सच्चाई दबा दी जाएगी? अब निगाहें प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं।
