‘काव्य रश्मिका’ की साहित्यिक गोष्ठी में रचनाकारों ने बांधा समां, स्त्री-विमर्श से लेकर बदलते सामाजिक मूल्यों तक उठे तीखे सवाल
उदयपुर /स्मार्ट हलचल|भीलवाडा जब कविता समाज की धड़कनों को आवाज देती है और ग़ज़ल वक्त के सवालों को शब्द देती है, तो साहित्य महज मनोरंजन नहीं रहता, बल्कि समाज का आईना और व्यवस्था से संवाद का माध्यम बन जाता है। ऐसा ही संवेदनाओं, सरोकारों और सवालों से भरा माहौल रविंद्र फाइन आर्ट्स अकादमी परिसर में देखने को मिला, जहां श्रीमती हंसा रविंद्र की मेजबानी में ‘काव्य रश्मिका’ साहित्यिक समूह की गरिमामय कवि गोष्ठी आयोजित हुई।
सरस्वती वंदना से सजी साहित्यिक शाम
गोष्ठी का शुभारंभ शकुंतला सोनी की मधुर सरस्वती वंदना से हुआ। मुख्य अतिथि सीए राजकुमार बाबेल और अध्यक्ष वरिष्ठ ग़ज़लकार अरुण त्रिपाठी का उपरणा व माल्यार्पण से स्वागत किया गया।
मुख्य अतिथि राजकुमार बाबेल ने कहा कि श्रेष्ठ कवि केवल शब्दों को सजाता नहीं, बल्कि संवेदना के जरिए दुनिया को बेहतर बनाने का प्रयास करता है। उन्होंने राजस्थानी गीत “तीज त्यौहार जो आवे, हियै हवा सुगन्धी आवे…” सुनाकर लोक संस्कृति की खुशबू बिखेरी। वहीं उनकी हास्य पैरोडी ‘जय पत्नी देवी’ ने श्रोताओं को खूब गुदगुदाया।
अरुण त्रिपाठी की ग़ज़ल में जीवन के संघर्ष और भाषा की पीड़ा
गोष्ठी अध्यक्ष वरिष्ठ ग़ज़लकार अरुण त्रिपाठी ने करीब 30 शेरों की प्रभावशाली ग़ज़ल से श्रोताओं को बांधे रखा। उनके शेरों में जीवन संघर्ष, अनुभव और मनुष्य की आंतरिक ताकत उभरकर सामने आई—
“समझदारी स्वच्छता के साथ रहे तो योग्यताएं मिलने आतीं,
भीतर से मजबूत बनाने के लिए परीक्षाएं मिलने आतीं।”
हिंदी भाषा की मौजूदा स्थिति पर उनकी ग़ज़ल ने खास असर छोड़ा—
“शब्द अहंकार के नशे में दूरियां बढ़ने लगे,
भाषा के सर पर चढ़कर शब्द इतराने लगे।”
वहीं “इस तरफ से उस तरफ तक मिट्टियां रह जाएंगी, आदमी के हाथ बस दो रोटियां रह जाएंगी” जैसे शेरों ने जीवन की नश्वरता और मनुष्य की वास्तविक जरूरतों पर गंभीर चिंतन कराया।
डॉ. शकुंतला सरूपरिया ने उठाए वक्त के सवाल
‘काव्य रश्मिका’ की संस्थापक डॉ. शकुंतला सरूपरिया ने प्रभावी संचालन के साथ अपनी रचनाओं से भी गोष्ठी को धार दी। उनकी ग़ज़ल—
“वह सुबह कहां थम गई, उन उजालों का क्या हुआ?
पूछने थे जवाब जिनमें, उन सवालों का क्या हुआ?”
ने श्रोताओं को आत्ममंथन के लिए मजबूर किया।
आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ पर उनकी पंक्तियां—
“खत्म कर दी जिंदगी पैसा कमाने के लिए,
खो दिया सब कुछ ही अपना, कुछ बचाने के लिए।”
रिश्तों और संवेदनाओं के बदलते स्वरूप की पीड़ा को उजागर कर गईं।
स्त्री की पीड़ा से लेकर आधुनिक समाज की विडंबनाओं तक
युवा कवि जगवीर सिंह ने ‘वह कौन है?’ के जरिए सृष्टि के रचयिता को तलाशा, वहीं ‘तुम्हारा नाम’ में स्त्री जीवन की विडंबनाओं को स्वर दिया।
कवयित्री डॉ. सुमन पामेचा की ‘आज फिर’ कविता ने स्त्री जीवन के अनुत्तरित सवाल उठाए। ‘आधुनिक मानव’ में वर्तमान सामाजिक विषमताओं पर कटाक्ष किया तो ‘पैसा है भगवान’ के जरिए बदलते जीवन-मूल्यों और संवेदनाओं के क्षरण को रेखांकित किया।
‘पका हुआ विकास’ ने विकास की परिभाषा पर उठाया सवाल
कार्यक्रम की मेजबान हंसा रविंद्र ने ‘वर्तमान की कीमत’ और विशेष रूप से ‘पका हुआ विकास’ कविता से प्रभाव छोड़ा। उन्होंने विकास की अंधी दौड़ के बीच प्रकृति, परिवार और प्रेम की जरूरत को रेखांकित करते हुए कहा—
“हर शहर में होनी चाहिए एक अदद झील,
दूसरा पहाड़, रंगीन चिड़ियां…
घरों में प्रेम होना चाहिए,
बेटियां होनी चाहिए
और वहां हंसता हुआ पिता होना चाहिए।”
इन पंक्तियों ने विकास की चमक के पीछे छूटती प्रकृति और पारिवारिक संवेदनाओं पर श्रोताओं को सोचने पर मजबूर किया।
बेटियों की पीड़ा ने नम कर दी आंखें
शकुंतला सोनी ने बेटियों की सामाजिक स्थिति पर मार्मिक मुक्तक प्रस्तुत किया—
“मां-बाप के घर बेटियां पराई हैं,
ससुराल में बेटियां पराई जाई हैं…”
वहीं कोलकाता में दुष्कर्म पीड़िता डॉ. मोहिता की हत्या की घटना पर उनकी मार्मिक कविता ने माहौल को भावुक कर दिया। कविता के दौरान कई श्रोताओं की आंखें नम हो गईं।
कविता बनी समाज और समय की आवाज
गोष्ठी में प्रेम, परिवार, स्त्री-विमर्श, भाषा, संस्कृति, सामाजिक मूल्यों के बदलाव और आधुनिक जीवन की विडंबनाओं जैसे मुद्दे प्रमुखता से उभरे। रचनाकारों ने अपनी कविताओं और ग़ज़लों के जरिए समाज की पीड़ा, व्यवस्था की विसंगतियों और मानवीय संवेदनाओं को शब्द दिए।
इस तरह ‘काव्य रश्मिका’ की यह शाम महज कविता-पाठ नहीं रही, बल्कि साहित्य के बहाने समाज और समय से सीधा संवाद बन गई।
कार्यक्रम के अंत में कल्पना भाटी ने आभार व्यक्त किया। साहित्यप्रेमियों और रचनाकारों की मौजूदगी में संपन्न गोष्ठी देर तक अपनी संवेदना, सवालों और काव्यात्मक गूंज छोड़ती रही।
