सर्वोदय ही ध्येय, पुण्य से मिले सामर्थ्य का उपयोग सबके मंगल में : युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी

गुरुवार को 1008 आयंबिल के साथ मनेगी आचार्य आनंद ऋषिजी की 126वीं जन्मजयंती

पुनित चपलोत
भीलवाड़ा | स्मार्ट हलचल|सर्वोदय ही ध्येय है और पुण्य के साथ मिला सामर्थ्य तभी सार्थक है, जब उसका उपयोग केवल स्वयं के लिए नहीं, सबके मंगल के लिए हो। श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने बुधवार को शांतिभवन में नवदिवसीय आनंद जन्मोत्सव के अंतर्गत आयोजित विशाल धर्मसभा में आचार्य आनंद ऋषिजी के जीवन-प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि महापुरुष अपने आत्मकल्याण के साथ लोकमंगल को जीवन का उद्देश्य बनाते हैं।
युवाचार्यश्री ने कहा कि कई बार व्यक्ति अच्छे कार्य करता है, फिर भी सफलता नहीं मिलती, जबकि गलत कार्य करने वाला सफल होता दिखाई देता है। सही कार्य के साथ साहस और पुरुषार्थ भी जरूरी है। भय और संकोच में व्यक्ति अपनी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पाता। परिस्थितियां प्रतिकूल हों, तब भी सही दिशा में आगे बढ़ने का साहस ही पुरुषार्थ को परिणाम तक पहुंचाता है।
उन्होंने कहा कि पुण्य हो तो मिट्टी भी सोना बन जाती है और पुण्य न हो तो सोना भी कोयला बन जाता है। जीवन में मिले साधन और अनुकूलता सफलता की गारंटी नहीं हैं। उनका सदुपयोग करने के लिए पुरुषार्थ तथा उसे सही दिशा देने के लिए विवेक और संस्कार जरूरी हैं।
आचार्यश्री के जीवन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उनके पास आया सामर्थ्य व्यक्तिगत सुविधा तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने उसे संघ और साधर्मिक समाज की आवश्यकता से जोड़ा। आयंबिल आराधना के लिए आयंबिल खाते की व्यवस्था, धार्मिक शिक्षा के लिए पाठशाला एवं परीक्षा बोर्ड तथा साधु-साध्वी शिक्षण निधि इसी दृष्टि के उदाहरण हैं।
साधर्मिकों की सहायता और चिकित्सा सुविधा का उल्लेख करते हुए युवाचार्यश्री ने कहा कि आनंद ऋषिजी आवश्यकता को पहचानकर उसके स्थायी समाधान की दिशा में प्रेरणा देते थे। आनंद ऋषि हॉस्पिटल भी इसी व्यापक लोकमंगल की भावना का परिणाम है। उनके लिए सेवा किसी व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं थी, बल्कि जहां आवश्यकता हो वहां सहायता पहुंचाना ही उसका उद्देश्य था।
युवाचार्यश्री ने कहा कि महापुरुष की साधना की व्यापकता उसके व्यक्तिगत पुरुषार्थ से नहीं, बल्कि उससे जुड़े सामूहिक कल्याण से पहचानी जाती है। आचार्यश्री ने अपने सामर्थ्य को लोकमंगल का माध्यम बनाया और कुशल संघनायक के रूप में दायित्व निभाया।
इस अवसर पर साध्वी सोम्याश्रीजी ने 21 उपवास एवं साध्वी नाव्याश्रीजी ने 10 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। बड़ी संख्या में तपस्वी भाई-बहनों ने भी युवाचार्यश्री से तीन उपवास, दो उपवास एवं आयंबिल सहित विविध तप.के प्रत्याख्यान ग्रहण किए।
इस दौरान साध्वीद्वय की तपस्या के उपलक्ष्य में शांति जैन महिला मंडल की ओर से शांतिभवन में भव्य चौबीसी भावा कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें शहर के सभी महिला मंडलों की महिलाओं ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर मंगल गीतों के माध्यम से साध्वी सोम्याश्रीजी एवं साध्वी नाव्याश्रीजी की तपस्या की अनुमोदना की। कार्यक्रम में यशोदिप्ती मधुकंवरजी,उपप्रवर्तिनी दिव्य ज्योतिजी,महासती सुचेताजी, साध्वी प्रियदर्शनाजी सहित साध्वीवृंद का सान्निध्य रहा।
श्रीसंघ के मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि गुरुवार को आचार्य आनंद ऋषिजी महाराज की 126वीं जन्मजयंती पर 1008 आयंबिल तप एवं तीन-तीन सामायिक के साथ जन्मजयंती मनाई जाएगी। उन्होंने बताया कि 15 अगस्त को विशेष प्रवचन एवं बच्चों की फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता तथा 16 अगस्त, रविवार को दोपहर में “मन की बात युवाचार्यश्री के साथ” बच्चो का कार्यक्रम रखा गया है।