शाहपुरा की सियासत में खुला ‘सामान्य पुरुष’ का दरवाजा

अब किसके सिर सजेगा पालिका का ताज?
अध्यक्ष पद की लॉटरी ने बदले चुनावी समीकरण, दावेदारों की धड़कनें तेज
सोशल मीडिया पर चेहरों की दस्तक शुरू

शाहपुरा-मूलचन्द पेसवानी
स्मार्ट हलचल|शाहपुरा नगर पालिका चुनाव की सियासत ने गुरुवार को अचानक करवट ले ली। नगर पालिका अध्यक्ष पद के आरक्षण की लॉटरी में अध्यक्ष पद सामान्य पुरुष वर्ग के लिए आरक्षित होने के साथ ही शहर की राजनीति में संभावित दावेदारों की दौड़ शुरू हो गई है। पांच साल पहले जहां अध्यक्ष की कुर्सी पर पहुंचने का रास्ता अन्य पिछड़ा वर्ग पुरुष के आरक्षण से होकर निकला था, वहीं इस बार सामान्य पुरुष वर्ग के लिए मैदान खुलने से भाजपा-कांग्रेस सहित स्थानीय राजनीति में सक्रिय नेताओं ने अपने-अपने समीकरण साधने शुरू कर दिए हैं।
लॉटरी का नतीजा सामने आते ही शाहपुरा में राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। चाय की थड़ियों से लेकर राजनीतिक बैठकों और सोशल मीडिया तक एक ही सवाल तैर रहा है आखिर अगली बार पालिका अध्यक्ष की कुर्सी पर कौन बैठेगा?
आरक्षण ने कई संभावित दावेदारों के लिए रास्ता खोला है तो कई नेताओं के राजनीतिक गणित को नए सिरे से लिखने की नौबत भी ला दी है। अभी चुनाव की तारीख घोषित नहीं हुई है, लेकिन अध्यक्ष पद सामान्य पुरुष के लिए तय होते ही चुनावी बिसात पर मोहरों की शुरुआती चाल चल दी गई है।

पांच साल पहले ओबीसी आरक्षण, अब बदला पूरा समीकरण-
पिछले नगर पालिका चुनाव में शाहपुरा अध्यक्ष पद ओबीसी पुरुष वर्ग के लिए आरक्षित था। उस चुनाव के बाद भाजपा का बोर्ड बना और रघुनंदन सोनी पालिका अध्यक्ष बने। पांच साल तक पालिका की कमान सोनी के हाथों में रही।
अब आरक्षण बदलने के साथ ही अगला चुनाव केवल पार्षद चुनने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अध्यक्ष पद को लेकर राजनीतिक दलों और स्थानीय गुटों के बीच जोरदार खींचतान देखने को मिल सकती है।
सामान्य पुरुष वर्ग के लिए आरक्षण होने से भाजपा और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब ऐसे चेहरे को मैदान में उतारने की होगी, जो वार्डों में पकड़ के साथ-साथ अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को भी साध सके। एसडीपीआई और कुछ निर्दलीय दावेदार भी समीकरणों को इधर उधर करेगें।
यही वजह है कि लॉटरी के बाद संभावित दावेदारों की गतिविधियां तेज होने लगी हैं। कुछ चेहरे सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गए हैं तो कुछ पर्दे के पीछे अपने समर्थकों और राजनीतिक संपर्कों को मजबूत करने में जुट गए हैं।

35 वार्ड, 23 हजार से ज्यादा मतदाता तय करेंगे अगली तस्वीर-
शाहपुरा नगर पालिका में कुल 35 वार्ड हैं। इनमें कुल 23,152 मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। मतदाता सूची में 11,414 पुरुष और 11,738 महिला मतदाता शामिल हैं। चुनाव के लिए कुल 35 मतदान केंद्र बनाए जाएंगे।
आंकड़े बताते हैं कि मुकाबला भले ही 35 वार्डों में होगा, लेकिन राजनीतिक नजरें अध्यक्ष पद के समीकरण पर टिकी रहेंगी। कौन सा गुट कितने पार्षद जिताकर लाता है और चुनाव बाद किसके पास बहुमत का आंकड़ा होगा, यही पालिका की सत्ता की दिशा तय करेगा। यानी इस बार चुनावी मैदान में केवल पार्षद नहीं उतरेंगे, बल्कि अध्यक्ष पद के संभावित चेहरे भी अपने-अपने वार्डों से लेकर पूरे शहर तक राजनीतिक जमीन तैयार करते नजर आएंगे।

जिला बहाली का मुद्दा बनेगा सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार?
शाहपुरा नगर पालिका चुनाव इस बार सामान्य चुनाव से कहीं अधिक राजनीतिक महत्व रखता है। इसकी सबसे बड़ी वजह है शाहपुरा के जिला दर्जे की बहाली का मुद्दा।
शाहपुरा का अपना ऐतिहासिक और राजनीतिक गौरव रहा है। आजादी से पहले यह एक रियासत थी और लंबे समय से शाहपुरा को जिला बनाने की मांग राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रही। पिछली सरकार के कार्यकाल में शाहपुरा को जिला बनाया गया, लेकिन करीब 513 दिन जिला रहने के बाद वर्तमान सरकार ने इसे समाप्त कर दिया।
इसके बाद से ही शाहपुरा जिला बचाओ आंदोलन के जरिए जिला बहाली की मांग लगातार उठती रही है। ऐसे में आगामी नगर पालिका चुनाव में यह मुद्दा राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों के लिए बड़ा चुनावी सवाल बन सकता है।

कौन शाहपुरा को जिला वापस दिलाने की लड़ाई में कितना प्रभावी रहा? किसने आवाज उठाई और कौन खामोश रहा? ये सवाल मतदाताओं के बीच चुनावी चर्चा का हिस्सा बनने की पूरी संभावना है।

रियासतकाल से नगर निकाय की परंपरा, अब नई सियासी पटकथा-
शाहपुरा का नगर निकाय इतिहास भी पुराना है। रियासतकाल से ही यहां नगरीय प्रशासन की परंपरा रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नगर पालिका के चुनावों ने इस परंपरा को नई राजनीतिक पहचान दी। यही कारण है कि नगर पालिका चुनाव शाहपुरा के लिए महज स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं, बल्कि शहर की राजनीति में प्रभाव और नेतृत्व तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।
इस बार सामान्य पुरुष आरक्षण ने राजनीतिक समीकरणों को और दिलचस्प बना दिया है। अब पार्षदों के चुनाव के साथ-साथ अध्यक्ष पद की कुर्सी के लिए भी अंदरखाने लॉबिंग, गुटबाजी और समर्थन जुटाने का दौर तेज होने की संभावना है।

अब लॉटरी के बाद अगली नजर चुनाव की तारीख पर-
यूडीएच मंत्री झाबर सिंह के अनुसार भीलवाड़ा में अब जिला कलेक्टर स्तर पर पार्षदों के वार्ड आरक्षण की लॉटरी की प्रक्रिया होगी। इसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करेगा। चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही आचार संहिता लागू होगी और सितंबर में चुनाव प्रक्रिया पूरी किए जाने की संभावना जताई गई है। फिलहाल तारीख का ऐलान बाकी है, लेकिन अध्यक्ष पद का आरक्षण सामने आते ही शाहपुरा में चुनावी मौसम समय से पहले दस्तक दे चुका है। अब असली मुकाबला टिकट की दौड़, वार्डों के समीकरण और अध्यक्ष पद के लिए बहुमत जुटाने का होगा।

शाहपुरा की सियासत में कुर्सी एक है, दावेदार कई होंगे।
देखना यही है कि सामान्य पुरुष के लिए खुले इस राजनीतिक दरवाजे से कौन अंदर दाखिल होता है और आखिरकार पालिका अध्यक्ष की कुर्सी का ताज किसके सिर सजता है।