(पवन वर्मा)
स्मार्ट हलचल|मध्यप्रदेश सरकार बड़े-बड़े इन्वेस्टमेंट समिट और ग्लोबल दावों में व्यस्त है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि राज्य के नौनिहाल बुनियादी जरूरतों के लिए सड़क पर हैं। मध्यप्रदेश में सत्ता के सामने अब एक ऐसी पीढ़ी सवाल लेकर खड़ी हो रही है, जिसने अभी वोट देना भी शुरू नहीं किया है। जेन अल्फा के बच्चे स्कूल की सड़क, बस का किराया और स्कूल की जगह जैसे मुद्दों पर सड़क पर उतर रहे हैं। 15 अगस्त को छतरपुर के चंदला में बच्चों ने मंत्री दिलीप अहिरवार का काफिला रोक दिया। सिरोंज में छात्राएं बढ़े बस किराये के खिलाफ सड़क पर आ गईं और उसी समय उज्जैन में छात्राओं ने स्कूल को दूसरी जगह ले जाने के विरोध में कलेक्ट्रेट घेर लिया। खास बात यह है कि उज्जैन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का गृह जिला है और उज्जैन संभाग की संगठनात्मक जिम्मेदारी भाजपा की प्रदेश महामंत्री लता वानखेड़े के पास है, जो सिरोंज की सांसद भी हैं। यानी जेन अल्फा की आवाज उन इलाकों से आ रही है, जहां सरकार और भाजपा संगठन की सीधी राजनीतिक मौजूदगी है। आज ये बच्चे मतदाता नहीं हैं, मगर कल इनके पास वोट होगा और तब सरकार की आज की संवेदनशीलता या उदासीनता उनके राजनीतिक नजरिये का हिस्सा बन चुकी होगी।
यह घटनाक्रम इसलिए भी गंभीर है क्योंकि बच्चों की नाराजगी किसी राजनीतिक मुद्दे पर नहीं है। वे सत्ता परिवर्तन की मांग नहीं कर रहे। उन्हें किसी नेता से राजनीतिक हिसाब नहीं चाहिए। वे अपनी पढ़ाई से जुड़ी उन जरूरतों की बात कर रहे हैं, जिन्हें पूरा करना शासन व्यवस्था की बुनियादी जिम्मेदारी है। चंदला में बच्चों को सड़क चाहिए तो सिरोंज की छात्राओं को स्कूल आने-जाने का उचित किराया चाहिए। उज्जैन में छात्राओं ने अपने स्कूल को उसी स्थान पर रखने की मांग की। इन तीनों जगहों पर बच्चों को अपनी बात प्रशासन तक पहुंचाने के लिए प्रदर्शन करना पड़ा,ऐसे में यह सवाल सरकार से पूछा जाना चाहिए कि बच्चों की आवाज सड़क तक पहुंचने से पहले शासन की चौखट तक क्यों नहीं पहुंची?
ये बच्चे अपनी तकलीफों से कितने परेशान हो चुके होंगे कि स्वतंत्रता दिवस के दिन जब मंत्री दिलीप अहिरवार का काफिला चंदला से गुजर रहा था,तब स्कूली बच्चों ने काफिला रोककर स्कूल तक पहुंचने वाली सड़क की समस्या बताई। सड़क नहीं होने से बच्चों को होने वाली परेशानी पर मंत्री ने बच्चों की बात सुनी और सड़क बनवाने का आश्वासन दिया। यहां मुद्दा बहुत साफ है। बच्चों को सड़क चाहिए थी और उन्हें अपनी मांग सरकार तक पहुंचाने के लिए मंत्री का काफिला रोकना पड़ा।
अब सवाल यह है कि सड़क की जरूरत का पता प्रशासन को बच्चों के प्रदर्शन के बाद क्यों चला? स्कूल जाने वाले बच्चों की रोज की आवाजाही पर किसी अधिकारी या खुद मंत्री जी,जो वहां के विधायक भी हैं, की नजर क्यों नहीं गई? स्थानीय स्तर पर समस्या का समाधान पहले क्यों नहीं हुआ?
सरकार के लिए आश्वासन देना आसान है और बच्चों के लिए सड़क बनना जरूरी है। आने वाले दिनों में यही तय करेगा कि चंदला के बच्चों की आवाज व्यवस्था तक पहुंची या फिर एक घटना बनकर रह गई।
सिरोंज की घटना में भी कहानी अलग नहीं है। विदिशा जिले के सिरोंज में स्कूली छात्राएं निजी बसों का किराया बढ़ाए जाने के खिलाफ सड़क पर उतरीं। यहां किराया 10 रुपये से बढ़ाकर 25 रुपये कर दिया गया था। बच्चों के लिए रोजाना 25 रुपये का खर्च बड़ी परेशानी था। छात्राओं ने बस स्टैंड पर प्रदर्शन किया और अपनी आवाज उठाई। बाद में बस संचालकों को किराया वापस 10 रुपये करने पर सहमत होना पड़ा।
यहां राजनीतिक संयोग और भी दिलचस्प है। सिरोंज की सांसद लता वानखेड़े भाजपा की प्रदेश महामंत्री हैं। वे संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रही हैं। इसी के साथ पार्टी ने उन्हें उज्जैन संभाग का संगठन प्रभारी भी बनाया है। उज्जैन संभाग मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का गृह क्षेत्र है। लता वानखेड़े को उज्जैन संभाग का संगठन प्रभारी बनाए जाने की पुष्टि भाजपा के संगठनात्मक नियुक्तियों से जुड़ी रिपोर्टों में भी हुई है।
अब इन तस्वीरों के राजनीतिक पहलू देखिए।
सिरोंज में जेन अल्फा सड़क पर उतरी। वहां की सांसद लता वानखेड़े प्रदेश भाजपा की महामंत्री हैं। वे उज्जैन संभाग की संगठन प्रभारी भी हैं। उज्जैन में भी जेन अल्फा स्कूल के मुद्दे पर कलेक्ट्रेट पहुंचती है। उज्जैन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का गृह जिला है। यह महज संयोग हो सकता है, मगर राजनीतिक रूप से इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
उज्जैन में छात्राओं ने स्कूल को दूसरी जगह ले जाने के विरोध में कलेक्ट्रेट का घेराव किया। उनकी मांग थी कि स्कूल उसी स्थान पर रहे। प्रदर्शन के दौरान छात्राएं भावुक हो गईं। प्रशासन की ओर से लिखित आश्वासन मिलने के बाद प्रदर्शन खत्म हुआ।
यह वही उज्जैन है जिसे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की राजनीतिक पहचान से भी जोड़ा जाता है। मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र में स्कूली छात्राओं का अपनी शिक्षा से जुड़े फैसले के खिलाफ प्रशासन के सामने पहुंचना सरकार के लिए सहज स्थिति नहीं कही जा सकती। वहीं राजधानी भोपाल में भी स्कूली बच्चों के परिवहन संबंधी परेशानी को लेकर सड़क पर आने की खबर सामने आई है। राजधानी में बच्चों की ऐसी आवाज सुनाई देना बताता है कि समस्या दूर-दराज के इलाकों तक सीमित नहीं है।
इन घटनाओं को एक साथ देखने पर मध्यप्रदेश की स्कूल व्यवस्था का एक असहज चेहरा सामने आता है। बच्चों को स्कूल जाने के लिए रास्ता चाहिए, परिवहन चाहिए और स्कूल से जुड़े फैसलों में उनकी सुविधा का ध्यान चाहिए। इन जरूरतों के लिए उन्हें प्रदर्शन करना पड़े तो सवाल व्यवस्था पर उठेगा।
सरकार के पास शिक्षा विभाग है, जिला प्रशासन है, स्थानीय निकाय हैं और जनप्रतिनिधियों की पूरी व्यवस्था है। स्कूलों की स्थिति जानने के लिए अधिकारियों के पास तंत्र है। फिर बच्चों को सड़क पर आने की जरूरत क्यों पड़ रही है? यही सवाल सरकार की उदासीनता, प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीनता को बहुत अच्छी तरह समझाता है।
बच्चों की यह उम्र उन्हें संघर्ष की राजनीति में आने की इजाजत नहीं देती। उनका काम पढ़ना है,इस समय उनकी चिंता किताब, परीक्षा,खेल और भविष्य होनी चाहिए। सड़क, बस किराया और स्कूल प्रबंधन की समस्याओं से जूझना उनके हिस्से में नहीं आना चाहिए लेकिन मध्यप्रदेश के बच्चों को इन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है और यह बच्चों की गलती नहीं, व्यवस्था की कमी है।
मध्यप्रदेश में विकास की तस्वीर बड़े प्रोजेक्ट, निवेश और निर्माण कार्यों के साथ पेश की जाती है। यह तस्वीर अपनी जगह है। मगर किसी गांव के बच्चे के लिए विकास का सबसे पहला प्रमाण यही है कि वह बिना परेशानी स्कूल पहुंच सके। परिवार के लिए राहत यह है कि बच्चा सुरक्षित और उचित खर्च में स्कूल जा सके। स्कूल के लिए जरूरी यह है कि बच्चों की पढ़ाई किसी प्रशासनिक निर्णय से बाधित न हो। इन बुनियादी जरूरतों में कमी रह जाए तो बड़े विकास के दावे बच्चों की नजर में अपना असर खो देते हैं।
बात जेन अल्फा की करें तो ये वही नौनिहाल हैं जो आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश की सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर का हिस्सा बनेगें। वह अपने अनुभवों के आधार पर नेताओं और दलों को देखेगें। किसी बच्चे के लिए राजनीति का पहला अनुभव संसद या विधानसभा नहीं होता। उसका पहला अनुभव उसके आसपास की व्यवस्था होती है। स्कूल की सड़क कैसी है, बस कितने रुपये में मिलती है, सरकारी अधिकारी उसकी बात सुनते हैं या नहीं, स्थानीय नेता समस्या हल करते हैं या नहीं,यही छोटे अनुभव आगे चलकर बड़ी राजनीतिक धारणाओं में बदलते हैं। इसलिए इन नौनिहालों का सड़क पर उतरना भाजपा के लिए भी गंभीर संकेत है,क्योंकि आज तो ये बच्चे वोटर नहीं हैं लेकिन आने वाले वर्षों में ये भी वोट देंगे। आज वे किसी दल के पक्ष या विपक्ष में राजनीतिक फैसला नहीं कर सकत, भविष्य में करेंगे। उस समय उनके सामने नेताओं के भाषणों के साथ अपने अनुभव भी होंगे।
भाजपा के लिए चुनौती यह है कि इन घटनाओं को विपक्ष के राजनीतिक प्रदर्शन के रूप में देखने के बजाय शासन की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाए। बच्चों की मांगें पूरी करना किसी राजनीतिक दल पर एहसान नहीं होगा। यह सरकार की जिम्मेदारी है। मगर जिम्मेदारी समय पर निभाई जाए तो उसका असर जनता की धारणा पर पड़ता है। इसके उलट शिकायतों का लंबा इंतजार, बच्चों का सड़क पर आना और उसके बाद आश्वासन देना सरकार की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करता है।
चंदला में बच्चों ने मंत्री का काफिला रोका,सिरोंज में छात्राओं ने बस किराये के खिलाफ आवाज उठाई। उज्जैन में छात्राओं ने कलेक्ट्रेट घेरा। इन घटनाओं को जोड़कर देखने पर एक बात साफ दिखाई देती है कि नई पीढ़ी सजग है और अपनी जरूरतों के लिए आवाज उठाना सीख रही है,ऐसे में शासन व्यवस्था को उसकी आवाज सुनना सीखना होगा। यह सरकार के लिए समय रहते चेत जाने का अवसर है।
स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं की समीक्षा होनी चाहिए। विद्यार्थियों के परिवहन की समस्याओं का पता लगाया जाना चाहिए। स्कूलों से जुड़े बड़े फैसलों में बच्चों और अभिभावकों की वास्तविक परेशानी समझी जानी चाहिए। शिकायतें प्रदर्शन बनने से पहले हल हों, यही अच्छी प्रशासनिक व्यवस्था की पहचान है। वरना खतरा यह नहीं है कि बच्चे आज सरकार के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। खतरा यह भी है कि वे कल यही बच्चे सरकार और भाजपा को अपने आज के अनुभवों की नजर से देखेंगे।
जेन अल्फा अभी स्कूल की ड्रेस में है। आज उसके हाथ में मतदाता पहचान पत्र नहीं है। मगर समय तेजी से बदल रहा है। आज सड़क मांगने वाला बच्चा कल मतदान केंद्र पर खड़ा होगा। आज बस किराये का हिसाब पूछने वाली छात्रा कल सरकार के कामकाज का हिसाब पूछेगी इसलिए मध्यप्रदेश सरकार के लिए जेन अल्फा की आवाज को हल्के में लेना राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर बड़ी भूल होगी। बच्चों को सड़क पर लाने वाली व्यवस्था अपने आप में सरकार के लिए आईना है। उस आईने में सरकार को अपना जो चेहरा आज दिखाई दे रहा है, आने वाले समय में यही चेहरा भाजपा की राजनीतिक छवि का हिस्सा बन सकता है।
