राजनैतिक व्यंग्य-समागम
स्मार्ट हलचल|मुहावरा वैसे तो देर आयद, दुरुस्त आयद ही है। पर चूंकि जिक्र योगी जी-मोदी जी का है, क्या ये मुहावरा कुछ छोटा नहीं पड़ जाता है। माने देर आयद पर इतना जोर, उसे ही आगे रखना और दुरुस्त आयद की बात बाद में धीरे से कह देना ; इसमें भी क्या उसी नेगेटिविटी की झलक दिखाई नहीं देती है, जिसकी मोदी जी से लेकर भागवत जी तक को इंडिया की पब्लिक से शिकायत रही है।
ऐसी नेगेटिविटी का इल्जाम हम अपने सिर पर क्यों लेंगे? और वैसे भी, योगी जी के मामले में तो देर आयद भी, दुरुस्त आयद का प्रभाव ही बढ़ाने का काम करता है। जैसे आजादी — नहीं, नहीं, स्वतंत्रता — के 79 साल पूरे होने से ठीक एक दिन पहले, योगी जी को अचानक इसका बोध या ज्ञान हुआ कि, 79 साल पहले अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री होते, तो ‘लाखों हिंदुओं का रक्त व्यर्थ नहीं बहता’! हाय मोदी, तब तुम न हुए!
अब प्लीज, इसे यह कहकर खारिज करने की कोशिश कोई नहीं करे कि देश के पहले प्रधानमंत्री, नेहरू से मोदी जी हमेशा ही कंपटीशन मानते आए हैं और यह भी उनसे नेहरू को एक और पटखनी लगवाने का ही मामला है। बेशक, नेहरू को मोदी जी इस मैदान में भी पटखनी लगाते हैं और सिर्फ पटखनी ही नहीं लगाते हैं, बल्कि चारों खाने चित्त भी कर देते हैं।
आखिर, विभाजन के समय हुए खून-खराबे में अंगरेजों की खींची सीमा के उस पार से भाग कर आते हुए, हजारों हिंदू और सिख मारे गए थे, जबकि नेहरू जी प्रधानमंत्री थे। इसी की याद दिलाने के लिए तो मोदी जी, योगी जी और सारे ‘‘जी’’ लोग, पिछले कई साल से स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पहले, ‘‘विभाजन विभीषिका दिवस’’ मनाते हैं।
नेहरू प्रधानमंत्री थे, तो विभाजन विभीषिका थी। काश तब मोदी जी प्रधानमंत्री होते, तो योगी जी को विभाजन विभीषिका दिवस कभी नहीं मनाना पड़ता। सिंपल है, विभाजन विभीषिका होती भी तो, साफ इंकार कर देते, बेरोजगारी की तरह! मीडिया भी बताता कि कहीं कुछ नहीं हुआ, सब चंगा सी। अब मोदी जी होते, तो गोदी मीडिया भी तब होता ही होता!
खैर! ये नेहरू से मोदी जी के भिड़ने का मामला है ही नहीं। यह तो हिस्ट्री का गंभीर सवाल है। काश तब मोदी जी होते! तब मोदी जी होते तो ‘‘लाखों हिंदुओं का रक्त व्यर्थ नहीं बहता।’’ क्या हुआ कि इस पार से उस पार भागते हुए और बहुत से मामलों में तो भागने से इंकार करते हुए भी, हिंदुओं की तरह ही तब हजारों मुसलमान भी मारे गए थे, जबकि जिन्ना पाकिस्तान के गवर्नर जनरल थे। पर वो जिन्ना की प्राब्लम थी, हो सकता है कि उनके यहां भी कोई मोदी होता, तो ‘लाखों मुसलमानों का खून जाया नहीं होता’। खैर! पाकिस्तान की पाकिस्तान जाने, हम तो इतना जानते हैं कि नेहरू की जगह मोदी जी प्रधानमंत्री होते, तो हिंदुओं का खून व्यर्थ नहीं बहता।
अब कोई ये मत कहने लगना कि मोदी जी न सही, मोदी जी के वैचारिक पुरखे तो 79 साल पहले भी मौजूद थे ही — सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, गोलवलकर, वगैरह सब के सब। यहां तक कि गोडसे भी। बेशक थे, वे सब थे, पर अव्वल तो वे प्रधानमंत्री नहीं थे। और अगर प्रधानमंत्री होते भी, तो भी मोदी जी के बराबर थोड़े ही हो जाते।
वैसे योगी जी ने स्वतंत्रता के 80वें वर्ष पर जो ज्ञान दिया है, उसमें मोदी जी का एक आप्शन भी दिया है। 79 साल पहले अगर नेहरू की जगह, सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते, शायद तब भी ‘‘हिंदुओं का रक्त व्यर्थ नहीं बहता।’’ पर हमें लगता है कि सरदार पटेल वाला यह आप्शन भी कागजी ही है। सरदार पटेल के होने से वह बात होनी मुश्किल थी, जो मोदी जी होते तो होती। सरदार शेर तो थे, पर तब तक शेर बूढ़ा हो चुका था। ज्यादा भाग-दौड़ करना उनके वश की बात नहीं रही थी। फिर सरदार पटेल गृहमंत्री तो वैसे भी थे ही और गृह मंत्रालय की एक-एक कार्रवाई की जिम्मेदारी लेने वाले गृहमंत्री थे। और तो और, उन्होंने आरएसएस पर पाबंदी की घोषणा भी अपने दस्तखत से जारी की थी। भारत में ‘हिंदुओं का रक्त नहीं बहे’ इसके लिए तो बेशक उन पर भरोसा किया जा सकता था, लेकिन क्या इस पर भी भरोसा किया जा सकता था कि जो रक्त बह गया, वह ‘‘व्यर्थ नहीं जाए’’। आखिर, चेले तो वह भी गांधी के ही थे! वह भी किसी का भी रक्त बहने नहीं देना चाहते थे, नेहरू की तरह। हिंदुओं का जो रक्त बहा व्यर्थ न जाए, एक-एक बूंद का हिसाब लिया जाए, यह तो मोदी जी जैसा कोई नागपुर-दीक्षित स्वयंसेवक ही पक्का कर सकता था। बूंद के बदले में ज्यादा नहीं, तो कम से कम एक बूंद! वैसे अपनी ओर से गोडसे ने ऐसा हिसाब लिया भी था, लेकिन छोटे पैमाने पर ही। वैसे भी योगी जी बात प्रधानमंत्री की कुर्सी के बेहतर दावेदार की कर रहे थे, निजी स्तर पर ‘हिंदू हिसाब’ निपटाने की नहीं।
पर एक बात समझ में नहीं आयी। योगी जी ने यह क्यों कहा कि ‘‘1947 में कांग्रेस अड़ जाती, तो विभाजन की त्रासदी नहीं होती।’’ उन्हें प्राब्लम किस से है, विभाजन से या विभाजन के समय घटी त्रासदी से? बेहतर होता कि योगी जी ‘‘लाखों हिंदुओं का रक्त व्यर्थ’’ बहने-नहीं बहने पर ही रुक जाते। विभाजन रोकने के चक्कर में उलझेंगे तो ऐसे उलझेंगे कि उलझन से निकल ही नहीं पाएंगे और 1947 में पीएम बनकर मोदी जी भी किसी काम नहीं आएंगे।
बात यह है कि कांग्रेस तो बहुत देर तक अड़ी रही थी। गांधी जी के ही पीछे चलने वालों की कांग्रेस तो आखिर-आखिर तक अड़ी रही थी। पर उधर जिन्ना और इधर मोदी जी का विचार-कुनबा ही पहले से इसकी रट लगाए थे कि हिंदू और मुसलमान, अलग-अलग राष्ट्र हैं और अंगरेजों की गुलामी को छोड़कर, एक देश में हर्गिज नहीं रह सकते। दोनों को प्राब्लम थी तो कांग्रेस से, जो बहुधार्मिक राष्ट्र की बात करती थी। दोनों ने विभाजन के ही दशक में बंगाल, सिंध समेत तीन प्रांतों में मिलकर सरकारें चलायी थीं। ये विभाजन रोकते या विभाजन कराते! ये तो पिछले ही दिनों श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पश्चिम बंगाल का सृजनकर्ता बता रहे थे क्योंकि उन्होंने विधानसभा में बंगाल के विभाजन का प्रस्ताव रखा था! बांटने वाले, बंटते हुए देश को कैसे एक करते — तलवार से सिलाई कर के! बहते खून को भी हिंदू-मुस्लिम में बांट कर देखने वाले, देश को सिर्फ बांट सकते हैं, एक नहीं कर सकते!
पर योगी जी ने एक और बात बहुत दिलचस्प कही। बोले कि 1526 में संभल में हरिहर मंदिर ध्वस्त किया गया। यदि तब एकजुट प्रतिकार होता तो 1528 में अयोध्या में वही दुस्साहस नहीं होता। तो क्या मोदी जी को 1526 से ही देश की जिम्मेदारी संभाल लेनी चाहिए थी? हाय मोदी, तब तुम ना हुए!
*2. “तड़ीपार सदन में हाजिर हो!” : संजय पराते*
इस नई सदी में हमारे देश के प्रजातंत्र में नेताओं और आपराधिक कृत्यों का चोली-दामन का साथ हैं। यदि नहीं होता, तो गृह मंत्री अमित शाह तड़ीपार नहीं होते। और तड़ीपार नहीं होते, तो शायद ही गृहमंत्री बनते। संसद का सत्र चल रहा है। सरकार और समूचा मंत्रिमंडल संसद के प्रति जवाबदेह हैं, लेकिन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री समेत कई मंत्री इस जवाबदेही को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। सदन से वे तड़ीपार हैं और समूचा विपक्ष इन तड़ीपारों को सदन में हाजिर होने की पुकार लगा रहा है, ठीक वैसे ही, जैसे अदालत का कोई अर्दली पुकार लगाता है। अर्दलियों की पुकार अदालत की दीवारों से बाहर नहीं आती, लेकिन संसद में जो पुकार हो रही है, वह पूरे देश में गूंज रही है कि तड़ीपार सदन में हाजिर हो! आखिर सदन ही तो देश की सबसे बड़ी अदालत है, जनता की अदालत। और जनता की अदालत के सामने तो सुप्रीम अदालत भी छोटी ही होती है। कॉकरोच टिप्पणी के मामले में सबने यही देखा है।
यह अजीब बात है कि देश में गृहमंत्री अमित शाह की पहचान गृहमंत्री से ज्यादा तड़ीपार के रूप में ही होती है। सदन से वे अपनी इच्छा से तड़ीपार हैं, लेकिन साल 2010 में वे अपनी इच्छा से नहीं, सुप्रीम कोर्ट की इच्छा से तड़ीपार होने के लिए मजबूर हो गए थे। कथित सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें गुजरात से दो साल के लिए तड़ीपार कर दिया था और उन्हें गुजरात में घुसने की भी अनुमति नहीं थी। तभी से वे तड़ीपार की उपाधि धारण किए हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई कथित संत शिरोमणि की उपाधि कसकर पकड़े रहता है।
तड़ीपार होना किसी साधारण आदमी के बस की बात नहीं है। इसके लिए उसके पास अमित शाह जैसे तड़ीपारों का जिगर होना चाहिए। यह क्या कम साहस की बात है कि हमारा तड़ीपार गृहमंत्री संसद के गलियारों में पूरे समय चहलकदमी कर रहा है, अपने एसी कक्ष में बैठकर कॉफी और चाय सुड़के जा रहा है, टीवी स्क्रीन पर सदन की कार्यवाही देख रहा है, देख रहा है कि विपक्ष उन्हें सदन में हाजिर करने की मांग पीठासीन से कर रही है, पीठासीन “ऑर्डर-ऑर्डर” के हथौड़े मार रहा है, थक-हारकर वह भी गृहमंत्री से संसद में आने की गुहार कर रहा है, लेकिन मजाक है कि गृहमंत्री की खलवाट खोपड़ी में कोई जूं रेंगे। उसे अपनी सत्ता का अहसास होता है कि यदि वह चाहे तो, पूरे सदन को ही कॉफी या चाय की तरह सुड़क सकता है। लेकिन वह ऐसा नहीं करता। उसे अपने नाम पर हंगामा होते देख और मजा आता है। तब और मजा आता है, जब सदन में और-और जोर से हंगामा होता है और सदन स्थगित हो जाता है। वह अपनी खोल से बाहर निकलकर विपक्ष को कोसता है कि वह सदन को ठप्प लिए हुए हैं, वह अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है। अमृतकाल में सदन चलाना अब विपक्ष की जिम्मेदारी है, सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी तो लाठी, गोलियां, पैलेट गन चलाकर लोगों को अनुशासित करना है। सदन में जवाब देने से यह अनुशासन टूटता है। सवाल यही है कि गृहमंत्री के रूप में उसकी जिम्मेदारी ज्यादा कहां है? : वह सदन में जबान चलाए या मैदान में हथियार?
यही हाल प्रधानमंत्री का है। उन्हें प्रधानमंत्री के पद से प्यार है, उसके कामों से नहीं। वे 2047 तक, जब तक वे बूढ़े होकर मर नहीं जाते, प्रधानमंत्री बने रहने की लालसा है। इसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। वे चुनाव आयोग को अपनी जेब में डाल सकते हैं, वे ईवीएम बदल सकते हैं, यहां तक कि वे अपने मतदाता भी चुन सकते हैं। इससे भी आसान तरीका है कि संविधान में संशोधन कर दिया जाएं और आजन्म अपने प्रधानमंत्री रहने की घोषणा कर दें। वैसे वे सांसदों और विधायकों की खरीदकर इसी महान उद्यम में लगे हैं। उनकी लीला अपरम्पार है, अवर्णनीय है, क्योंकि वे अजैविक हैं, जिसका कोई भी बाल बांका नहीं कर सकता। कबीरदास जी भी बता ही गए हैं कि यदि पूरे समुद्र के पानी से स्याही बना लें, पूरे जंगल की लकड़ियों से कलम बना लें और पूरी धरती को कागज बना लें, तो भी प्रभु की लीला का बखान नहीं किया जा सकता। कबीरदास जी दूरदर्शी थे, उन्हें मालूम था कि 21वीं सदी में भारत की पुण्य धरा पर क्या होने वाला है। यह भारत का सौभाग्य है कि उसे राम और कृष्ण के बाद नरेंद्र मोदी जैसा अजैविक अवतार मिला, जिसका सीना सीधे-सीधे 56 इंच का है। वाल्मीकि और वेद व्यास राम और कृष्ण के सीने का नाप नहीं बता गए तो, अच्छा ही किया, वरना बेचारों की तो शामत ही आ जाती। वैसे विपक्ष के 56 इंच का छोटा बंदर कहने भर से क्या होता है! वैसे ऐसे कहने से यह पता नहीं चलता कि विपक्ष ने भी 56 इंच के उनके जुमले को मान लिया है! वैसे उन्होंने तो अपने को शेर मान लिया है, भले ही देश की जनता उन्हें बंदर कहती फिरे। जनता है, जनता का क्या, आज यहां, तो कल वहां!
बहरहाल, जंतर मंतर से बाहर निकलकर जेन-ज़ी नाम का हौवा पूरे देश में फैल चुका है। कहीं से जेन-अल्फा भी उभर रहा है। सड़कों पर उबाल है। जहां देखो वहीं, कॉकरोच ही कॉकरोच भरे पड़े हैं। बड़े जीवट हैं ये कॉकरोच। लाठियों से पीटो, पैरों से मसलो, गोलियों से छलनी करो, इनका कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। ये अजर-अमर हैं। इनकी प्रजनन दर बहुत ज्यादा है, दिन-रात इनकी संख्या बढ़ रही है। ये संसद की ओर रेंग रहे हैं, जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। ये बर्तन-थाली को बजाने से इंकार कर रहे है, न अंधेरे में टॉर्च जलाने के लिए तैयार हैं। इन्हें पूरी रोशनी चाहिए। प्रधान के इस्तीफे से इन्हें संतोष नहीं मिला है, इन्हें अब प्रधानजी का भी इस्तीफा चाहिए। इस्तीफा रोग ही ऐसा है कि एक जगह लगा, तो तेजी से फैलता है। वे समझते हैं कि इस रोग को फैलने से बचाना ही उनका राष्ट्रीय कर्तव्य है, देशभक्ति है।
देश भक्ति की धुन में वे नाच रहे हैं। समूचा मंत्रिमंडल नाच रहा है। लेकिन कॉकरोचों की फौज संसद का दरवाजा खटखटा रही है। इस फौज में मक्खी, मच्छर, पिस्सू भी शामिल हो गए हैं। तड़ीपारों के मुकाबले वे भी अपने अजर-अमर होने की घोषणा कर रहे हैं। विपक्ष उनका स्वागत कर रहा है। इस बेमेल गठजोड़ को देखकर अचानक तड़ीपारों को कमर के नीचे शरीर के मध्य भाग में कुछ गीला-गीला-सा महसूस होता है। उनके अवतारी शरीर को बोध होता है कि वे संसद में नहीं, सड़क पर नंगे खड़े हैं, अपने भागवत, अपने पुराण के साथ। वे हिंदुओं को हिंदू होने का बोध कराते हुए अपने को बहलाने की कोशिश कर रहे हैं। एक बच्चा जोरों से हंस रहा है, चिल्ला रहा है — राजा तो नंगा है। यह साहित्य का स्थायी भाव है। चलाचली की बेला में यह राजनीति का भी स्थायी भाव बन जाता है।
