सड़क,पंखे,पानी की लड़ाई से लोकतंत्र सीखती नई पीढ़ी

 

(राज कुमार सिन्हा-)

स्मार्ट हलचल|भारत की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बदहाली का कोई एक अकेला कारण नहीं है, बल्कि इसके पीछे अपर्याप्त बजट आवंटन, बुनियादी ढांचे की कमी और जवाबदेही का अभाव है। स्कूलों में नियमित शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं और जो शिक्षक हैं, उनका शिक्षण स्तर व प्रशिक्षण आधुनिक समय के अनुकूल नहीं है। शिक्षा प्रणाली कौशल विकास या व्यावहारिक ज्ञान के बजाय केवल परीक्षा में अंक लाने और रटने पर जोर देती है। सरकारी शिक्षा की बदहाली के खिलाफ सड़कों पर उतरती नई पीढ़ी सिर्फ सुविधाएं नहीं, जवाबदेही मांग रही है। भारत में एक नई पीढ़ी धीरे-धीरे अपने सामाजिक और राजनीतिक तेवर का परिचय दे रही है। यह जेन अल्फा जिसने मोबाइल, इंटरनेट, वीडियो और सोशल मीडिया की दुनिया में आंखें खोली है। अभी यह पीढ़ी मतदान की उम्र में नहीं पहुंची है, लेकिन लोकतंत्र की भाषा सीखने के लिए उसे अठारह वर्ष का इंतजार नहीं है। जुलाई और अगस्त 2026 में उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान तक सरकारी तथा सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के बच्चों के आंदोलनों की जो श्रृंखला दिखाई दी है, वह इसी बदलाव का संकेत है।
इन बच्चों की मांगें किसी राजनीतिक दल के घोषणापत्र से नहीं निकली है। वे बेहद बुनियादी हैं, शिक्षक चाहिए, पंखे चाहिए, साफ पानी चाहिए, शौचालय चाहिए, अच्छा भोजन चाहिए, सड़क चाहिए और सुरक्षित स्कूल चाहिए। लेकिन इन छोटी दिखाई देने वाली मांगों के भीतर भारतीय शिक्षा व्यवस्था की एक बहुत बड़ी विफलता छिपी हुई है। लखनऊ के जय प्रकाश नारायण सर्वोदय बालिका विद्यालय की छात्राओं का हालिया आंदोलन इस बदलते माहौल का सबसे ताजा उदाहरण है। करीब 250 छात्राएं भारी बारिश के बीच स्कूल से बाहर निकलीं और सड़क पर उतरकर यातायात रोक दिया। उनकी शिकायतों में शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव प्रमुख था। रिपोर्टो के अनुसार विज्ञान विषय के शिक्षकों की कमी ने उनकी पढ़ाई को प्रभावित किया है। यह घटना अकेली नहीं है। कुछ दिन पहले इसी क्षेत्र में स्कूली बच्चों के विरोध और सड़क जाम की घटनाएं सामने आ चुकी थी। यानी बच्चों ने यह संदेश दे दिया है कि स्कूल के भीतर शिकायत की सुनवाई नहीं होती तो वे स्कूल के बाहर अपनी आवाज सुनाएंगे।
यह आवाज अब एक जिले या एक राज्य तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के किशनपुर स्थित सर्वोदय इंटर कॉलेज में लगभग 1500 विद्यार्थियों ने कई घंटे धरना दिया। उनकी मांगों में साफ पीने का पानी, काम करने वाले पंखे, स्वच्छ शौचालय, फर्नीचर, पुस्तकालय और अन्य बुनियादी सुविधाएं शामिल थी। प्रशासन को छात्रों के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत करनी पड़ी और कई मांगों पर कार्रवाई का आश्वासन देना पड़ा। हमीरपुर में बच्चे स्कूल तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क की मांग को लेकर तिरंगा लेकर जिला मुख्यालय तक पहुंचे। कीचड़ और दलदल से गुजरकर स्कूल पहुंचना उनकी रोजमर्रा की समस्या थी। बिहार के गया जिले में बच्चों ने खराब मध्याह्न भोजन, जिसमें कीड़े मिलने की शिकायत भी सामने आई, खराब पानी, गंदे शौचालय, पंखों और फर्नीचर की कमी के खिलाफ लगभग चार किलोमीटर मार्च किया। मध्य प्रदेश में भी यह लहर दिखाई दे रही है। छिंदवाड़ा के तामिया स्थित एकलव्य आवासीय विद्यालय के विद्यार्थियों ने मेस के भोजन की गुणवत्ता को लेकर बारिश में सड़क पर बैठकर विरोध किया। उनकी शिकायतों में भोजन में कीड़े मिलने और स्वास्थ्य तथा खेल सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दे शामिल थे। उज्जैन में कई सरकारी स्कूलों की छात्राओं ने स्कूलों को शहर से दूर स्थानांतरित करने की योजना के खिलाफ कलेक्टर कार्यालय का घेराव किया। छात्राओं का तर्क था कि दूर जाने से यात्रा का समय और खर्च बढ़ेगा तथा गरीब परिवारों की लड़कियों की पढ़ाई छूट सकती है। बच्चियों के दबाव में कलेक्टर ने स्कूल स्थानांतरित करने के निर्णय को रोक दिया है। सिरोंज में छात्राओं के विरोध के बाद रियायती बस किराया 10 रुपये से बढ़ाकर 25 रुपये करने का फैसला वापस लेना पड़ा। महाराष्ट्र में भी शिक्षक अनुपस्थिति, शौचालय और पानी जैसे सवालों पर विद्यार्थियों के विरोध सामने आए हैं। यानी अलग-अलग राज्यों में बच्चे अलग-अलग स्कूलों में हैं, लेकिन उनकी शिकायतों की भाषा लगभग एक जैसी है। असल में ये आंदोलन सरकारी शिक्षा व्यवस्था के उस मॉडल पर सवाल उठा रहा है, जिसमें स्कूल का भवन तो बना दिया जाता है, लेकिन शिक्षक नहीं होते, शौचालय बना दिया जाता है लेकिन पानी नहीं होता, छात्रावास बना दिया जाता है लेकिन भोजन की गुणवत्ता और स्वास्थ्य सुविधाओं की निगरानी नहीं होती, सड़क का बजट स्वीकृत हो जाता है लेकिन बच्चे बारिश में कीचड़ से गुजरते रहते हैं। उनके लिए शिक्षा केवल किताब और परीक्षा नहीं है। शिक्षा का अर्थ है, कक्षा में शिक्षक, पीने का पानी, शौचालय, भोजन, बिजली, सुरक्षा, परिवहन और सम्मान। यही कारण है कि इन आंदोलनों में सबसे मुखर आवाज लड़कियों की दिखाई दे रही है। वे शिक्षा के साथ-साथ सुरक्षा और आवागमन के सवाल को भी सीधे जोड़ रही हैं।
जेन जी से जेन अल्फा तक आंदोलन की तकनीक बदल रही है। अब इसका असर स्कूली बच्चों के आंदोलनों में दिखाई दे रहा है। बच्चा दूसरे जिले में हुए आंदोलन को देखता है और समझता है, “अगर वहां के बच्चों ने अपनी मांग मनवाई है, तो हम भी अपनी आवाज उठा सकते हैं।” यही वह मनोवैज्ञानिक बदलाव है जो आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। जेन अल्फा की सबसे बड़ी ताकत उसकी डिजिटल पहुंच है। ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे लोकप्रिय एप्लिकेशन 21वीं सदी के बच्चों के लिए नवीनतम उपकरण बन गए हैं। पिछली पीढ़ी में किसी सरकारी स्कूल की खराब स्थिति की शिकायत प्रधानाचार्य, शिक्षक, पंचायत या स्थानीय जनप्रतिनिधि तक सीमित रह जाती थी। शिकायत के बाद फाइल चलती थी और कई बार मामला वहीं समाप्त हो जाता था। आज बच्चे स्कूल के टूटे पंखे, गंदे शौचालय, खराब भोजन, कीचड़ भरे रास्ते या पानी की समस्या का वीडियो बना सकते हैं। फिर वही वीडियो कुछ घंटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। इससे स्थानीय समस्या सार्वजनिक जवाबदेही का विषय बन जाती है। यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है क्योंकि सोशल मीडिया ने बच्चों को सिर्फ दर्शक नहीं रखा है, उसने उन्हें दस्तावेज बनाने वाला नागरिक बना दिया है। अभी इसे देशव्यापी, एकीकृत और औपचारिक जेन अल्फा का राष्ट्रीय आंदोलन कहना उचित नहीं होगा। यह साफ तौर पर कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं है और इस आंदोलन का कोई नेता भी नहीं है। अगर इस आंदोलन का नेतृत्व भी नेताओं द्वारा किया जा रहा होता, तो यह उस मुकाम पर नहीं जा पाता, जहां तक पहुंच गया है। लेकिन इतिहास में बड़े आंदोलन हमेशा किसी एक दिन में राष्ट्रीय संगठन बनकर पैदा नहीं होते। वे पहले छोटे-छोटे स्थानीय असंतोषों से जन्म लेते हैं।
स्कूली बच्चों की इन सभी मांगों को एक सूत्र में बांध दें तो एक बड़ा सवाल सामने आता है कि सरकार हमारे लिए कैसी शिक्षा व्यवस्था बना रही है? यही सवाल इस स्थानीय लहर को राष्ट्रीय मुद्दे में बदल सकता है।आज जेन अल्फा के अधिकांश बच्चे वोट नहीं देंगे। लेकिन यही बच्चे अगले कुछ वर्षों में पहली बार मतदाता बनने वाले हैं। इसलिए राजनीतिक दलों को इस पीढ़ी को केवल बच्चे समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। यह वह पीढ़ी है जो अपने माता-पिता से अधिक डिजिटल जानकारी रखती है। यह वीडियो देखती है, तुलना करती है, सवाल पूछती है और प्रशासनिक कार्रवाई को सार्वजनिक रूप से दर्ज करती है।आज जो बच्चा स्कूल के पंखे के लिए सड़क पर बैठ रहा है। कल वही युवा पूछेगा कि मेरे गांव में अस्पताल क्यों नहीं है? मेरे गांव में पानी क्यों नहीं है? मेरे क्षेत्र में सड़क का काम वर्षों से अधूरा क्यों है? सरकार के बजट का पैसा आखिर गया कहां? यानी आज की स्कूल स्तरीय मांगें कल की लोकतांत्रिक और राजनीतिक चेतना का आधार बन सकती है। राजनीतिक दल यदि इस पीढ़ी की आवाज को केवल चुनावी नारे के रूप में इस्तेमाल करेंगे तो शायद यह पीढ़ी उसे भी स्वीकार नहीं करेगी। इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस आंदोलन का नेतृत्व हमेशा पारंपरिक राजनीतिक नेता नहीं करेंगे। बच्चे स्वयं मुद्दा उठाएंगे, वीडियो बनाएंगे, समूह बनाएंगे, प्रशासन को ज्ञापन देंगे और जरूरत पड़ने पर सड़क पर बैठेंगे। इन घटनाओं को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर पुलिस भेज देना सबसे आसान रास्ता है। लेकिन इससे समस्या खत्म नहीं होगी।
सरकारों को यह समझना होगा कि सड़क पर बैठा बच्चा वास्तव में सरकारी स्कूल का रिपोर्ट कार्ड लेकर बैठा है। हर आंदोलन को दबाने के बजाय प्रत्येक जिले में स्कूलों की सार्वजनिक सोशल ऑडिट व्यवस्था विकसित की जा सकती है। स्कूलों में शिक्षक पदों की स्थिति, भोजन की गुणवत्ता, पानी, शौचालय, बिजली, छात्रावास और परिवहन जैसी सुविधाओं का वास्तविक समय में सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाया जा सकता है। छात्रों की शिकायतों के लिए स्वतंत्र और समयबद्ध शिकायत प्रणाली होनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बच्चों की आवाज को अनुशासनहीनता मानने के बजाय लोकतांत्रिक भागीदारी के रूप में देखा जाना चाहिए। यह डिजिटल लामबंदी और सोशल मीडिया के जरिए पारंपरिक राजनीतिक दलों के नियंत्रण से मुक्त होकर स्वतः स्फूर्त रूप से उभर रहे हैं, जो सत्ता और शासन के खिलाफ नए राजनीतिक समीकरण खड़े कर रहे हैं। यह आंदोलन अभी छोटा है, बिखरा हुआ है और स्थानीय है, लेकिन इसके सवाल राष्ट्रीय हैं। राष्ट्रीय सवाल जब एक पीढ़ी की सामूहिक चेतना बन जाते हैं, तो राजनीति को अंततः बदलना ही पड़ता है।