सेवानिवृत्त वन अधिकारियों ने वैज्ञानिक नाम जोड़ने से लेकर चंदन, सागवान और रोहिड़ा को सूची में शामिल करने की उठाई मांग
उदयपुर, 28 अगस्त।स्मार्ट हलचल|राजस्थान में वृक्षों के संरक्षण के लिए प्रस्तावित राजस्थान वृक्ष संरक्षण बिल-2026 के ड्राफ्ट में सामने आई विसंगतियों को लेकर उदयपुर के सेवानिवृत्त वन अधिकारियों के समूह ग्रीन सेवियर्स ने राज्य सरकार का ध्यान आकर्षित किया है। समूह की ओर से 25 अगस्त को अतिरिक्त मुख्य सचिव, वन एवं पर्यावरण विभाग को विस्तृत सुझाव भेजे गए हैं। पत्र की प्रतियां मुख्यमंत्री, वन एवं पर्यावरण मंत्री तथा प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं हॉफ को भी भेजी गई हैं।
*स्वागत योग्य पहल : भटनागर*
ग्रीन सेवियर्स के अध्यक्ष, सेवानिवृत्त मुख्य वन संरक्षक एवं NCTA के सदस्य
राहुल भटनागर ने बताया कि पत्र में कहा गया है कि राज्य सरकार द्वारा वृक्ष संरक्षण के लिए कानून लाने की पहल स्वागत योग्य है, लेकिन प्रस्तावित सूची और प्रावधानों में कुछ ऐसी विसंगतियां हैं, जिन्हें बिल को अंतिम रूप देने से पहले दूर किया जाना जरूरी है।
*स्थानीय नामों के साथ वैज्ञानिक नाम भी हों*
ग्रीन सेवियर्स ने सुझाव दिया है कि संरक्षित वृक्ष प्रजातियों की सूची में केवल स्थानीय नामों के बजाय उनके वैज्ञानिक नाम भी स्पष्ट रूप से अंकित किए जाएं। इससे पूरे राजस्थान में प्रजातियों की पहचान को लेकर एकरूपता रहेगी और अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित स्थानीय नामों के कारण होने वाला भ्रम दूर होगा।
*एक ही प्रजाति के अलग-अलग नामों पर भी सवाल*
ग्रीन सेवियर्स ने ड्राफ्ट में सालर और सलाई, तेन्दु और रिमरू तथा टेटू/श्योनल और फरी को अलग-अलग दर्शाए जाने पर भी आपत्ति जताई है। पत्र में कहा गया है कि उदयपुर संभाग में सलाई और सालर को एक ही वृक्ष के रूप में जाना जाता है। इसी तरह सूची में ‘तनुष HINT’ नाम की किसी प्रमाणित वृक्ष प्रजाति की जानकारी नहीं होने की बात कहते हुए उदयपुर संभाग में पाए जाने वाले तणस (Ogeinia oogeinensis) को स्पष्ट रूप से दर्ज करने का सुझाव दिया गया है।
*29 प्रजातियों की सूची में संख्या को लेकर भी विसंगति*
ग्रीन सेवियर्स ने कुसुम, मोरखा, कड़ाया और पाडल जैसे नामों के उल्लेख तथा ‘वेरायटीज’ शब्द के इस्तेमाल से भी भ्रम की स्थिति बनने की बात कही है। समूह का कहना है कि सूची में 29 वृक्ष प्रजातियों का उल्लेख किया गया है, जबकि दिए गए नामों के आधार पर वास्तविक संख्या इससे अधिक दिखाई देती है। इसलिए प्रत्येक प्रजाति का वैज्ञानिक नाम अंकित कर वास्तविक संख्या स्पष्ट की जानी चाहिए।
*2017 के नोटिफिकेशन से टकराव दूर करने की मांग*
समूह ने राजस्थान सरकार के 28 अप्रैल 2017 के नोटिफिकेशन F 15/(33) Forest/98 का हवाला देते हुए कहा है कि इसमें 32 वृक्ष प्रजातियों को काटने के लिए अनुमति आवश्यक नहीं बताई गई थी। इनमें बेर, सेमल और कैंथ भी शामिल हैं, जबकि प्रस्तावित वृक्ष संरक्षण बिल की सूची में भी इनका उल्लेख है। ग्रीन सेवियर्स ने इस विरोधाभास को दूर करने की मांग की है।
*चंदन, सागवान और रोहिड़ा को भी संरक्षण सूची में शामिल करने का सुझाव*
सेवानिवृत्त वन अधिकारियों ने विशेष रूप से चंदन (Santalum album) को प्रस्तावित संरक्षण सूची में शामिल करने का सुझाव दिया है। उनका कहना है कि राज्य सरकार चंदन को संरक्षित करने तथा प्रत्येक जिले में चंदन वन विकसित करने की दिशा में कार्य कर रही है। दक्षिणी राजस्थान में चंदन का प्राकृतिक पुनरुत्पादन भी पाया जाता है। ऐसे में इसे वृक्ष संरक्षण कानून के दायरे में शामिल किया जाना उचित होगा। इसी तरह सागवान (Tectona grandis) और रोहिड़ा (Tecomella undulata) को भी सूची में शामिल करने का सुझाव दिया गया है।
*लंबे वन अनुभव के आधार पर तैयार किए सुझाव*
ग्रीन सेवियर्स की चर्चा में सेवानिवृत्त वन अधिकारियों ने अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर इन बिंदुओं को चिह्नित किया। समूह के अध्यक्ष राहुल भटनागर ने कहा कि वृक्ष संरक्षण के लिए प्रभावी कानून समय की आवश्यकता है, लेकिन इसके लिए प्रजातियों की पहचान, वैज्ञानिक नामकरण और मौजूदा नियमों के साथ समन्वय स्पष्ट होना जरूरी है। समूह ने सरकार से ड्राफ्ट में आवश्यक संशोधन एवं समावेशन कर विसंगतियों को दूर करने का आग्रह किया है।
