अपने ही बुने जाल में फंसे मुख्य राजनीतिक दल

दृष्टिकोण :

(डॉ. सुधाकर आशावादी)

स्मार्ट हलचल|अपनी सत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने के प्रयास में राजनीति कब किस कुचक्र में फंस जाए तथा अपनी ही चालों में भटक कर आम आदमी के लिए संकट खड़ा कर दे, कहा नहीं जा सकता। भारत की जाति आधारित राजनीति राष्ट्र की एकता व अखंडता को दाँव पर लगाकर कब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के किए जन भावनाओं को आहत करने लगे, इसका भी पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता।
भारत की राजनीति प्रारंभ से ही सवर्ण विरोध पर आधारित रही है। देश का सवर्ण वोट बैंक कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का बिना शर्त वाला वोट बैंक रहा है। यही कारण है, कि कांग्रेस या भाजपा ने कभी सवर्ण मतदाताओं की समस्या पर कोई ध्यान नहीं दिया। विभिन्न राज्यों में केवल चंद जातियों को अपना वोट बैंक मानने वाले राजनीतिक दलों ने अपनी विशेष जाति के अतिरिक्त सामान्य वर्ग में आने वाली जातियों को अपना वोट बैंक नहीं समझा। यही कारण रहा, कि गैर भाजपा व गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, आजाद समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता पार्टी तथा अन्य दलों में ब्राह्मण, राजपूतों, वैश्यों , कायस्थों के साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया गया। सार्वजनिक मंचों पर आज भी इन दलों का सवर्ण विरोधी चरित्र उजागर है।
जातीय आधार पर वोट बैंक साधने में लगी समाजवादी पार्टी ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों को एकजुट करके सामाजिक बंटवारे की आधारशिला पर ही अपनी सियासी जीत की कामना की। बसपा ने एक समय सर्व जातीय सोशल इंजिनीरिंग के आधार पर उत्तर प्रदेश में शासन चलाया भी, लेकिन वर्तमान दौर में जातीय मानसिक विकलांगता ने जो वातावरण तैयार किया है, वह भाजपा और कांग्रेस को धरती चटाने की दिशा में अग्रसर है। सभी वर्गों के नेताओं को साथ लेकर चलने वाली भाजपा में तथाकथित सवर्ण जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा ने सवर्ण नेताओं को अपने अस्तित्व का आकलन करने हेतु विवश कर दिया है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सवर्ण विरोधी प्रावधान में जिस प्रकार से सवर्णों के विरुद्ध मनमाने उत्पीड़नकारी मुकदमों की छूट प्रदान की गई है तथा बिना किसी जांच के सवर्णों का शैक्षिक,व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन बर्बाद करने का अधिकार दलितों व पिछड़ों को प्रदान किया गया है, उसने भाजपा की सवर्णों के प्रति नीयत का खुलासा कर दिया है। सवर्णों के अंध समर्थन के चलते भाजपा स्वयं को विकल्हीन समझने की गलत फहमी पाले हुए है। ताज्जुब तो तब होता है, कि जब देश का साधन संपन्न प्रधानमंत्री स्वयं को अति पिछड़ा घोषित करने में लज्जा का अनुभव नहीं करता। अपने परिवार को अपने जातीय वोट बैंक के आधार पर संपन्न करने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर नकारात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। प्रधानमन्त्री, गृहमंत्री व जिम्मेदार भाजपाई गंभीर समस्या पर मौन साधकर सवर्णों पर फर्जी मुकदमों के प्रति धृतराष्ट्र बने हुए हैं।
अब ऐसा लगता है, कि देश के लिए अपनी रियासतें दान देने वाले राजपूतों ने अपनी संपत्ति का दान करके, ब्राह्मणों व कायस्थों ने अपने ज्ञान से समाज में शिक्षा का परचम लहराकर तथा दानवीर भामाशाहों ने जनसाधारण के लिए कुएँ, बावड़ी, खुदवाकर व भोजन शालाएं खोलकर बहुत बड़ा अपराध किया है तथा जिनके लिए यह व्यवस्था की, उनसे गाली खाने के लिए ही उन्होंने ऐसा किया है तथा इन सबके पीछे इनके वोटबैंक के आधार पर पनप रही भाजपा और कांग्रेस जैसी राजनीतिक पार्टियाँ ही सर्वाधिक दोषी है।
समय आ गया है, कि जब देश के सामान्य वर्ग की अनदेखी करने वाले राजनीतिक दलों की अक्ल ठिकाने लगाने के लिए प्रबुद्ध वर्ग एकजुट हो तथा इन्हें समझाए कि देश का सामान्य वर्ग मानसिक रूप से विकलांग नहीं हुआ है, उसमें सोचने समझने की सामर्थ्य है तथा यदि वह अंध समर्थन कर सकता हैं तो उपेक्षा का शिकार होने के चलते वह शासक वर्ग की दोगली और सवर्ण विरोधी नीतियों के विरुद्ध भी विद्रोह का बिगुल फूंक सकता है