आरक्षण बदलता रहा, अध्यक्ष की कुर्सी पर मीणा समाज का दबदबा कायम

आरक्षण बदलता रहा, अध्यक्ष की कुर्सी पर मीणा समाज का दबदबा कायम

जहाजपुर में 31 साल का सियासी इतिहास फिर चर्चा में, इस बार सामान्य महिला सीट ने बढ़ाई दावेदारों की धड़कनें; नरेश-कांता की निर्दलीय चुनौती से भाजपा का गणित भी उलझा

अलकेश पारीक | जहाजपुर

जहाजपुर नगर पालिका चुनाव 2026 में मुकाबला केवल पार्षदों की जीत-हार तक सीमित नहीं है। असली नजर नगर पालिका अध्यक्ष की कुर्सी पर भी है। पिछले 31 वर्षों के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो अध्यक्ष पद के आरक्षण की तस्वीर कई बार बदली, लेकिन अध्यक्ष की कुर्सी पर मीणा समाज का राजनीतिक प्रभाव लगातार दिखाई देता रहा है। अब 2026 में अध्यक्ष पद एक बार फिर सामान्य महिला के लिए आरक्षित होने से पुराने इतिहास और नए सियासी समीकरणों की चर्चा तेज हो गई है।

छह चुनाव, आरक्षण की तीन तस्वीरें… लेकिन अध्यक्ष की कुर्सी पर मीणा समाज

उपलब्ध चुनावी इतिहास के अनुसार वर्ष 1995 में एसटी सीट से मोहनलाल मीणा, वर्ष 2000 में सामान्य महिला सीट से काली देवी मीणा, वर्ष 2005 में एसटी सीट से कांता देवी मीणा, वर्ष 2010 में सामान्य महिला सीट से काली देवी मीणा, वर्ष 2015 में एसटी ओपन सीट से विवेक मीणा और वर्ष 2021 में सामान्य सीट से नरेश मीणा अध्यक्ष बने।

वर्षआरक्षणअध्यक्ष
1995एसटीमोहनलाल मीणा
2000सामान्य महिलाकाली देवी मीणा
2005एसटीकांता देवी मीणा
2010सामान्य महिलाकाली देवी मीणा
2015एसटी ओपनविवेक मीणा
2021सामान्यनरेश मीणा

इस तरह 1995 से 2021 तक हुए छह चुनावों में अध्यक्ष पद के आरक्षण की श्रेणी तीन अलग-अलग रूपों में सामने आई—तीन बार एसटी, दो बार सामान्य महिला और एक बार सामान्य वर्ग। लेकिन इन सभी चुनावों में अध्यक्ष पद पर मीणा समाज की राजनीतिक मौजूदगी बनी रही।

इस बार सामान्य महिला सीट… पुराने चेहरे फिर चर्चा में

वर्ष 2026 में जहाजपुर नगर पालिका अध्यक्ष पद एक बार फिर सामान्य महिला के लिए आरक्षित है। ऐसे में राजनीतिक दलों के साथ-साथ निर्दलीय खेमे की गतिविधियां भी महत्वपूर्ण हो गई हैं।

सबसे अधिक चर्चा पूर्व पालिका अध्यक्ष नरेश मीणा और उनकी पत्नी कांता देवी मीणा के निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने को लेकर है। भाजपा से टिकट नहीं मिलने के बाद दोनों के निर्दलीय मैदान में आने से पार्टी के सामने वार्डवार समीकरण साधने की चुनौती बढ़ गई है।

नरेश मीणा वार्ड 22 से और कांता देवी मीणा वार्ड 21 से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं। दोनों को पालिका की राजनीति का पुराना अनुभव है। ऐसे में इनके चुनावी प्रदर्शन का असर केवल संबंधित वार्ड तक सीमित रहेगा या अध्यक्ष पद के गणित को भी प्रभावित करेगा, यह चुनाव परिणाम के बाद ही स्पष्ट होगा।

भाजपा-कांग्रेस के लिए भी प्रतिष्ठा का सवाल

जहाजपुर नगर पालिका चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने स्थानीय स्तर पर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित करने की चुनौती है। खासकर भाजपा के लिए बागी तेवर और निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी वार्डवार समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।

दूसरी ओर कांग्रेस भी अपनी स्थिति मजबूत करने के प्रयास में है। अध्यक्ष पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित होने के कारण दोनों प्रमुख दलों के लिए केवल पार्षदों की संख्या हासिल करना ही पर्याप्त नहीं होगा। चुनाव परिणाम के बाद अध्यक्ष पद के लिए उपयुक्त महिला चेहरे और उनके समर्थन में बनने वाला पार्षदों का समीकरण भी निर्णायक हो सकता है।

आज नाम वापसी का आखिरी दिन, इसके बाद खुलेगा असली चुनावी पत्ता

नामांकन प्रक्रिया के बाद 3 सितंबर को दोपहर 3 बजे तक नाम वापसी का समय है। इसके बाद प्रत्याशियों की अंतिम तस्वीर सामने आएगी और 4 सितंबर को चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाएंगे। जहाजपुर में 11 सितंबर को मतदान तथा 14 सितंबर को मतगणना प्रस्तावित है।

चुनावी कार्यक्रम

नाम वापसी : 3 सितंबर, दोपहर 3 बजे तक

चुनाव चिन्ह आवंटन : 4 सितंबर

मतदान : 11 सितंबर

मतगणना : 14 सितंबर

यही कारण है कि नाम वापसी का दिन जहाजपुर के चुनावी खेल में बेहद अहम माना जा रहा है। कौन मैदान में डटा रहता है, कौन किसके समर्थन में पीछे हटता है और कौन-सा वार्ड किस दल या प्रत्याशी के लिए मजबूत अथवा कमजोर बनता है—इन सभी सवालों के जवाब आने वाले दिनों में अध्यक्ष पद के समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं।

सबसे बड़ा सवाल—क्या 31 साल का ट्रेंड फिर दोहराएगा?

जहाजपुर की राजनीति में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आरक्षण की तस्वीर भले ही बार-बार बदलती रही हो, लेकिन क्या अध्यक्ष की कुर्सी पर मीणा समाज का दबदबा इस बार भी कायम रहेगा?

या फिर भाजपा-कांग्रेस के बीच मुकाबले और निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी से ऐसा नया समीकरण बनेगा, जो अध्यक्ष पद की पूरी तस्वीर बदल देगा?

3 सितंबर की नाम वापसी के बाद जहाजपुर के चुनावी मैदान की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी। इसके बाद मुकाबला केवल वार्डों में जीत-हार का नहीं रहेगा, बल्कि नगर पालिका अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने के लिए जरूरी पार्षदों के समर्थन और चुनाव बाद बनने वाले राजनीतिक समीकरणों का भी होगा।