लोकतंत्र की थोक मंडी: पाप की कमाई का 5% री-इन्वेस्टमेंट और 5 साल का नया लूट-लाइसेंस


विशेष संपादकीय | चुनावी व्यंग्य

मांडलगढ़ नगर पालिका: 20 वार्ड, 51% की बोली और एक ‘प्राइवेट लिमिटेड’ पार्टी का रिमोट!

जब सियासत धंधा बन जाए, तो चुनाव जनसेवा नहीं बल्कि ‘मुनाफेदार टेंडर’ बन जाते हैं। मांडलगढ़ नगर पालिका के चुनावी दंगल में इस बार कोई राजनीतिक विचारधारा या जनहित नहीं, बल्कि एक ‘प्राइवेट लिमिटेड पार्टी’ ताल ठोक रही है।

मकसद बिल्कुल शीशे की तरह साफ है—बीते 16-20 सालों में सरकारी जमीनों, नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाने और घपलों की जो फसल काटी गई है, उसकी पुरानी फाइलों पर कफन डालना और आने वाले 5 सालों के लिए नए घोटालों का खुला परमिट हासिल करना।

मुनाफे का इन्वेस्टमेंट प्रोजेक्ट:

महीनों से एक ही गुप्त प्रोजेक्ट पर काम चल रहा था—‘जनाधार की थोक खरीद’। आज के दौर में जनाधार सेवा से नहीं कमाया जाता, बल्कि तिजोरी खोलकर खरीदा जाता है। पिछले दो दशकों में सरकारी खजाने और जमीनी खेल से जो काली कमाई जमा हुई है, उसका महज 5% से 5.5% हिस्सा ही तो इस चुनावी मंडी में झोंकना है!

“इसे घूस मत कहिए जनाब! यह तो अगले 5 साल तक नगर पालिका से 1000% का रिटर्न हासिल करने के लिए किया गया एक ‘स्मार्ट बिजनेस इन्वेस्टमेंट’ है।”

मांडलगढ़ के कुल 20 वार्ड हैं। सत्ता हथियाने का गणित बेहद आसान है—कुर्सी पर अपना शिकंजा कसने के लिए केवल 51% का जादुई आंकड़ा (11 वार्ड) चाहिए। रणनीति ऐसी रची गई है कि जिन चंद वार्डों में मुख्य पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी पहले से ही घर की कठपुतली और पुराना रिमोट है, वहां तो निश्चिंतता है। लेकिन बाकी वार्डों में, जहां पार्टी ने अपनी मर्जी का मोहरा नहीं बिठाया, वहां अपनी ही निजी जेब के खर्चे पर ‘निर्दलीय सिपहसालार’ मैदान में उतार दिए गए हैं।

खेल बिल्कुल तय है—सिंबल चाहे किसी का भी हो, कुर्सी पर बैठने के बाद उंगलियां उसी एक पुराने बंगले के रिमोट पर नाचनी चाहिए, ताकि नगर पालिका के बजट से अपनी निजी प्रॉपर्टी का साम्राज्य और फैलाया जा सके।

जनता और चुनावी मंडी का कड़वा सच

साफ-सुथरी नालियां, पक्की सड़कें, मीठा पानी, स्ट्रीट लाइटें और पारदर्शी प्रशासन? ये सब तो केवल चुनावी भाषणों के खोखले जुमले हैं। भ्रष्ट व्यवस्था मानकर चलती है कि 5 साल तक काम करने का हिसाब कौन दे, इससे कहीं ज्यादा सस्ता और आसान यह है कि मतदान से 48 घंटे पहले जाति, धर्म, शराब, कबाब और गुलाबी नोटों की रेवड़ियां फेंक दी जाएं!

51% का बहुमत चाहिए, और दुर्भाग्य से यह सिंडिकेट मानकर चल रहा है कि 51% ईमान हर वक्त बिकने के लिए चुनावी हाट में तैयार बैठा है।

हमारा क्या? हमारी तरफ से यह ‘व्यक्ति विशेष पार्टी’ भी जिंदाबाद, भाजपा भी जिंदाबाद और कांग्रेस भी जिंदाबाद! किसी से कोई निजी राग-द्वेष नहीं। लेकिन आईने के सामने खड़े होकर अंतिम फैसला मांडलगढ़ की जनता को करना है—क्या वे चंद नोटों और बोतलों के बदले 5 साल तक अपने शहर का भविष्य गिरवी रखने को तैयार हैं? क्या उन्हें बिकना पसंद है या फिर इस कठपुतली और रिमोट कंट्रोल राज को हमेशा के लिए कबाड़ में फेंकना है?

संपादकीय नोट: यह आलेख मांडलगढ़ नगर पालिका क्षेत्र में चल रही चुनावी चौपालों, जन-चर्चाओं और अंदरूनी राजनीतिक समीकरणों पर आधारित एक व्यंग्यात्मक विश्लेषण है। इसका उद्देश्य चुनावी तंत्र की विद्रूपताओं और मतदाता जागरूकता पर स्वस्थ विमर्श खड़ा करना है।