भीलवाड़ा निकाय चुनाव: महापौर चयन से पहले ही कुर्सी की जंग तेज!

महेन्द्र नागौरी

आधा दर्जन से ज्यादा महिला दावेदारों ने बढ़ाई राजनीतिक सरगर्मी, पार्षद की कुर्सी के लिए भी घमासान; जनता पूछ रही—शहर का क्या होगा?

भीलवाड़ा | स्मार्ट हलचल|निकाय चुनाव का बिगुल बजते ही भीलवाड़ा में महापौर चयन से पहले ही कुर्सी की जंग तेज हो गई है। आधा दर्जन से अधिक महिला दावेदार महापौर की कुर्सी पर नजरें गड़ाए बैठी हैं। दूसरी ओर पार्षद बनने के लिए भी दावेदारों की लंबी फौज मैदान में है। टिकट, समर्थन और राजनीतिक समीकरणों को लेकर अंदरखाने जोर आजमाइश शुरू हो चुकी है।
लेकिन इस पूरी राजनीतिक कवायद के बीच शहर का मतदाता एक सीधा सवाल पूछ रहा है—कुर्सी के लिए इतनी बेचैनी है, लेकिन भीलवाड़ा के विकास की चिंता किसे है?
महापौर कौन? फैसला बाद में, दावेदारी अभी से तेज!
महापौर का चयन चुनाव परिणाम और बोर्ड की स्थिति के बाद होगा, लेकिन कुर्सी के संभावित दावेदारों ने अभी से राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है। कौन किस खेमे में है? किसके पीछे कौन-सी ताकत खड़ी है? किसका राजनीतिक वजन भारी है? और किसके पक्ष में पार्षदों का समर्थन जुट सकता है?
इन सवालों को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है।
क्या महापौर की कुर्सी के लिए शुरू हुई यह दौड़ शहर के विकास की दौड़ में भी बदलेगी?
कुर्सी के लिए घमासान, जनता के मुद्दे कहां?
चुनाव आते ही राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। दावेदार टिकट और समर्थन के लिए राजनीतिक आकाओं से संपर्क साध रहे हैं। कोई अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है तो कोई विरोधी खेमे की घेराबंदी में जुटा है।
लेकिन जनता पूछ रही है—यह पूरी कवायद शहर के विकास के लिए है या सिर्फ सत्ता और कुर्सी हासिल करने के लिए?
पार्षद बनने के इच्छुक दावेदार भी अपने-अपने वार्डों में सक्रिय हैं। मगर मतदाता इस बार केवल चेहरा, पार्टी या राजनीतिक पहचान देखकर वोट करेगा? या फिर पिछले पांच साल का हिसाब भी मांगेगा?
जनता पूछ रही—सड़क, सफाई और ट्रैफिक का क्या?
भीलवाड़ा शहर की समस्याएं किसी से छिपी नहीं हैं। सड़कें, सफाई, जलभराव, यातायात, पार्किंग, अतिक्रमण, पेयजल, सीवरेज और आवारा पशु जैसे मुद्दे आज भी जनता की परेशानी बने हुए हैं।
तो फिर सवाल उठना लाजिमी है—चुनाव के समय जनता की याद आती है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद यही समस्याएं क्यों नजर नहीं आतीं?
महापौर पद के दावेदारों से जनता पूछ सकती है—शहर की पहली प्राथमिकता क्या होगी? पहले 100 दिन में क्या करेंगे? और पांच साल बाद भीलवाड़ा को कहां खड़ा देखना चाहते हैं?
पिछला महापौर कार्यकाल बना राजनीतिक आईना
नगर निगम का पिछला महापौर कार्यकाल शहर की जनता देख चुकी है। अब उपलब्धियों के दावों और जमीनी हकीकत का फैसला भाषणों से नहीं, बल्कि जनता के वोट से होगा।
जनता के सामने सवाल है—पिछले कार्यकाल में शहर को क्या मिला? क्या बदला? कौन से वादे पूरे हुए और कौन से अधूरे रह गए?
यही सवाल इस चुनाव में महापौर और पार्षद पद के प्रत्येक दावेदार के सामने खड़े होंगे।
पार्षद की कुर्सी भी कम महत्वपूर्ण नहीं
महापौर की कुर्सी को लेकर भले ही सबसे ज्यादा चर्चा हो, लेकिन निगम की असली ताकत वार्डों से होकर गुजरती है। पार्षद ही अपने-अपने वार्ड की जनता के सीधे संपर्क में रहते हैं।
इसलिए वार्डों में भी सवाल उठ रहा है—सड़क कब बनेगी? नालियां कब सुधरेंगी? सफाई व्यवस्था कब पटरी पर आएगी? जलभराव से कब निजात मिलेगी?
क्या प्रत्याशी इन सवालों के जवाब लेकर जनता के बीच जाएंगे या फिर चुनावी मौसम में एक बार फिर वादों की पोटली ही बांटी जाएगी?
इस बार जनता सिर्फ वोट नहीं, हिसाब भी देगी!
महापौर की कुर्सी के लिए दावेदार कितने भी हों, राजनीतिक खेमेबंदी कितनी भी तेज हो और समीकरण कितने भी बदलें—अंतिम फैसला जनता करेगी।
इस बार मुकाबला सिर्फ प्रत्याशियों के बीच नहीं, बल्कि वादों और काम, राजनीति और विकास तथा कुर्सी और जनता की उम्मीदों के बीच भी होगा।
महापौर की कुर्सी किसके हिस्से आएगी? कौन पार्षद बनेगा? किसका बोर्ड बनेगा? इन सवालों का जवाब चुनाव परिणाम देगा।
लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है—क्या इस बार भीलवाड़ा को सिर्फ नया महापौर और नए पार्षद मिलेंगे, या शहर को विकास की नई दिशा भी मिलेगी?
कुर्सी के दावेदार बहुत हैं… शहर के सवाल भी बहुत हैं। अब जनता किसे चुनती है—कुर्सी का खिलाड़ी या विकास का जिम्मेदार चेहरा?