जहाजपुर में ‘अलमारी’ ने बढ़ाई भाजपा-कांग्रेस की बेचैनी, 46 निर्दलीयों से उलझा अध्यक्ष की कुर्सी का गणित

जहाजपुर में ‘अलमारी’ ने बढ़ाई भाजपा-कांग्रेस की बेचैनी, 46 निर्दलीयों से उलझा अध्यक्ष की कुर्सी का गणित की

नरेश मीणा-कांता देवी समेत करीब 20 प्रत्याशी अलमारी के निशान पर मैदान में; धीरज गुर्जर चुनावी प्रचार से पूरी तरह नदारद, सत्ता के सहारे भाजपा के सामने स्थानीय समीकरणों की चुनौती

अलकेश पारीक 

जहाजपुर, स्मार्ट हलचल। नगर पालिका चुनाव इस बार महज भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला नहीं रह गया है। मैदान में उतरे 46 निर्दलीय प्रत्याशियों ने चुनावी गणित को इस कदर पेचीदा कर दिया है कि अब हर वार्ड का परिणाम सीधे अध्यक्ष की कुर्सी के बड़े समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। इसी बीच ‘अलमारी’ चुनाव चिह्न भी जहाजपुर की सियासी चर्चाओं के केंद्र में आ गया है।

नगर पालिका के वर्तमान अध्यक्ष नरेश मीणा और उनकी पत्नी कांता देवी मीणा अलमारी के निशान पर चुनाव मैदान में हैं। इनके अलावा करीब 20 अन्य निर्दलीय प्रत्याशी भी इसी चुनाव चिह्न पर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अलमारी के निशान पर मैदान में उतरे प्रत्याशियों का सामूहिक प्रदर्शन चुनाव परिणाम के बाद नगर पालिका के सत्ता समीकरण को किस दिशा में ले जाएगा।

46 निर्दलीयों ने बिगाड़ा दोनों दलों का गणित

जहाजपुर के कई वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने भाजपा और कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशियों के सामने सीधी चुनौती खड़ी कर दी है। कहीं मुकाबला आमने-सामने का है तो कहीं त्रिकोणीय और बहुकोणीय स्थिति बनी हुई है।

निर्दलीयों की इतनी बड़ी संख्या का सीधा असर भाजपा और कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ सकता है। कई वार्डों में प्रत्याशियों की व्यक्तिगत पहचान, स्थानीय पकड़ और वर्षों से बने सामाजिक संबंध भी दल के चुनाव चिह्न से ज्यादा प्रभावी साबित हो सकते हैं।

यही वजह है कि दोनों प्रमुख दल अब केवल अपने प्रत्याशियों की जीत का हिसाब नहीं लगा रहे, बल्कि यह भी आंक रहे हैं कि निर्दलीय कितने वोट काटेंगे और कितने जीतकर नगरपालिका में पहुंच सकते हैं।

‘अलमारी’ बनी चुनावी चर्चा का नया केंद्र

इस चुनाव में अलमारी का चुनाव चिह्न सामान्य निर्दलीय प्रत्याशियों के निशान से आगे निकलकर राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। नरेश मीणा और कांता देवी मीणा सहित करीब 20 प्रत्याशियों का इसी निशान पर मैदान में उतरना इसे खास बना रहा है।

यदि अलमारी के निशान वाले कई प्रत्याशी जीत दर्ज करते हैं तो परिणाम के बाद उनका संख्या बल अध्यक्ष पद के समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालांकि फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अलमारी का समूह किसी एक राजनीतिक खेमे के साथ जाएगा। असली तस्वीर परिणाम आने के बाद ही साफ होगी।

धीरज गुर्जर चुनावी मैदान से पूरी तरह नदारद

दूसरी ओर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता धीरज गुर्जर की चुनावी सक्रियता को लेकर भी जहाजपुर में चर्चा तेज है। चुनाव प्रचार निर्णायक दौर में पहुंच चुका है, कांग्रेस के प्रत्याशी अपने-अपने वार्डों में मतदाताओं के बीच पहुंच रहे हैं, लेकिन गुर्जर की सक्रिय चुनावी मौजूदगी नजर नहीं आ रही है।

स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में यह सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले इस चुनाव में पार्टी के बड़े चेहरे की गैरमौजूदगी का असर प्रत्याशियों के मनोबल और चुनावी प्रदर्शन पर कितना पड़ेगा।

फिलहाल कांग्रेस के स्थानीय प्रत्याशी अपने स्तर पर प्रचार में जुटे हैं, लेकिन धीरज गुर्जर की ओर से चुनावी मैदान में कोई खास सक्रियता दिखाई नहीं देने को लेकर राजनीतिक हलकों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। इसका वास्तविक असर मतदान के बाद परिणामों में ही सामने आएगा।

सत्ता भाजपा के साथ, लेकिन राह आसान नहीं

राजस्थान में भाजपा की सरकार होने से भाजपा को सत्ता पक्ष का मनोवैज्ञानिक और संगठनात्मक लाभ मिलने की उम्मीद है। पार्टी इसी ताकत के सहारे नगर पालिका में अपना प्रभाव मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

लेकिन जहाजपुर की चुनावी जमीन पर तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। स्थानीय समीकरण, प्रत्याशियों की व्यक्तिगत छवि, वार्ड स्तर के संबंध और बड़ी संख्या में निर्दलीयों की मौजूदगी भाजपा के सामने भी चुनौती खड़ी कर रही है।

यानी सत्ता का लाभ भाजपा के साथ जरूर है, लेकिन उसे हर वार्ड में वोट में तब्दील करना पार्टी के लिए असली परीक्षा होगी।

पार्षदों की जीत से ज्यादा नजर अध्यक्ष की कुर्सी पर

जहाजपुर नगर पालिका चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यह बन गया है कि परिणाम के बाद अध्यक्ष की कुर्सी किसके हिस्से आएगी।

यदि भाजपा या कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिल जाता है तो स्थिति काफी हद तक साफ हो जाएगी। लेकिन यदि दोनों दल बहुमत के आंकड़े से पीछे रह जाते हैं, तो निर्दलीय पार्षद अचानक सत्ता की चाबी अपने हाथ में लेते नजर आ सकते हैं।

ऐसी स्थिति में 46 निर्दलीयों में से जीतकर आने वाले पार्षदों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। खासकर अलमारी के निशान पर चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों की संख्या को देखते हुए परिणाम के बाद उनके संख्या बल पर राजनीतिक दलों की नजर रहना तय माना जा रहा है।

किसकी खुलेगी ‘अलमारी’, किसके हाथ आएगी सत्ता की चाबी?

जहाजपुर में इस बार चुनावी मुकाबला कई स्तरों पर दिखाई दे रहा है। भाजपा सत्ता के लाभ और संगठनात्मक ताकत के भरोसे मैदान में है, कांग्रेस अपने प्रत्याशियों के दम पर मुकाबले में बने रहने की कोशिश कर रही है, जबकि 46 निर्दलीय अपने-अपने स्थानीय समीकरणों के सहारे दोनों दलों के सामने चुनौती पेश कर रहे हैं।

इन सबके बीच करीब 20 प्रत्याशियों का अलमारी के निशान पर मैदान में उतरना चुनाव को और दिलचस्प बना रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 46 निर्दलीयों में से कितने नगरपालिका पहुंचेंगे, अलमारी कितनी सीटें खोलेगी, कांग्रेस के बड़े चेहरे धीरज गुर्जर की चुनावी गैरमौजूदगी का कांग्रेस के प्रदर्शन पर क्या असर पड़ेगा और भाजपा सत्ता के लाभ को कितनी सीटों में बदल पाएगी।

क्योंकि अगर बहुमत का आंकड़ा किसी एक दल से दूर रहा तो जहाजपुर में अध्यक्ष की कुर्सी का ताला जीतने वाला दल नहीं, बल्कि निर्णायक संख्या जुटाने वाला गुट खोल सकता है।