किसान की आमदनी बढ़ेगी तभी विकसित होगा भारत, खेती की लागत घटाना जरूरी- डॉ. सोनी

कृषि विज्ञान केंद्र शाहपुरा में वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक; ड्रोन तकनीक, संरक्षित व जैविक खेती, फसल प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर जोर

शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
स्मार्ट हलचल|किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए खेती की लागत में कमी करना जरूरी है। विकसित भारत का रास्ता किसानों के विकास से होकर जाता है। किसान विकसित होगा, तभी देश विकसित होगा। यह बात महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के प्रसार शिक्षा निदेशालय के निदेशक प्रसार डॉ. आर.एस. सोनी ने कृषि विज्ञान केंद्र शाहपुरा में आयोजित वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक में कही।
डॉ. सोनी ने कहा कि बदलते कृषि परिदृश्य में किसानों को पारंपरिक खेती के साथ ऐसी तकनीकों और फसलों को अपनाना होगा, जिनसे प्रति इकाई क्षेत्र अधिक आमदनी प्राप्त हो सके। उन्होंने किसानों को सूरजमुखी, अलसी, मसाला फसलों और मेहंदी की खेती को बढ़ावा देने की सलाह दी। इसके साथ ही संरक्षित खेती और जैविक खेती को अपनाने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीक का उपयोग समय की आवश्यकता है। किसानों को ड्रोन तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन के माध्यम से किसान अपने उत्पाद का बेहतर मूल्य प्राप्त कर आय में वृद्धि कर सकते हैं।
केंद्र की गतिविधियों और प्रगति का प्रस्तुत किया ब्यौरा–
कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. सी.एम. यादव ने केंद्र की ओर से संचालित विभिन्न गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने पिछली वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक में प्राप्त सुझावों पर की गई कार्रवाई का विवरण प्रस्तुत किया। साथ ही केंद्र का वार्षिक प्रगति प्रतिवेदन भी समिति के समक्ष रखा।
डॉ. यादव ने कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा किसानों तक वैज्ञानिक तकनीकों को पहुंचाने, प्रशिक्षण आयोजित करने तथा कृषि क्षेत्र में नवाचारों को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी।
मातृवृक्ष बगीचा और नई फल फसलों पर जोर-
क्षेत्रीय निदेशक अनुसंधान, उदयपुर डॉ. एस.एस. लखावत ने कृषि विज्ञान केंद्र में मातृवृक्ष बगीचे की स्थापना करने का सुझाव दिया। उन्होंने किसानों को परंपरागत फसलों के साथ ड्रैगन फ्रूट, लीची, एवोकाडो और सेब जैसी फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जल की उपलब्धता को देखते हुए जल संरक्षण के उपायों को प्राथमिकता देनी होगी। सिंचाई में सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों का उपयोग कर पानी की बचत के साथ फसल उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
वर्षा जल संरक्षण का प्रशिक्षण जरूरी-
कृषि महाविद्यालय भीलवाड़ा के अधिष्ठाता डॉ. के.के. यादव ने वर्षा जल संरक्षण को लेकर किसानों के लिए विशेष प्रशिक्षण आयोजित करने की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण कार्यक्रमों में विशेष रूप से जरूरतमंद किसानों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि वैज्ञानिक तकनीकों का वास्तविक लाभ खेतों तक पहुंच सके।
सह निदेशक अनुसंधान डॉ. रविकांत शर्मा ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने तथा प्रगतिशील किसानों के खेतों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि किसानों को सफल किसानों के खेतों पर ले जाकर व्यावहारिक जानकारी देने से नई तकनीकों को अपनाने में अधिक प्रभावी परिणाम मिल सकते हैं।
बारानी खेती और संतुलित उर्वरक उपयोग पर भी चर्चा-
बारानी कृषि अनुसंधान केंद्र के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. के.सी. नागर ने कृषि विज्ञान केंद्र की प्रसार गतिविधियों में बारानी कृषि अनुसंधान केंद्र का सहयोग लेने का सुझाव दिया। उन्होंने क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुरूप बारानी कृषि की तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने पर जोर दिया। क्षेत्रीय निदेशक इफको डॉ. लालाराम चौधरी ने संतुलित उर्वरकों के उपयोग पर किसानों के लिए प्रशिक्षण आयोजित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने जल प्रबंधन के प्रति किसानों को जागरूक करने और उपलब्ध जल का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करने पर भी जोर दिया।
प्रगतिशील किसानों की सफलता की कहानियों की बुकलेट का विमोचन-
बैठक के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से प्रकाशित प्रगतिशील किसानों की सफलता की कहानियों पर आधारित बुकलेट का विमोचन किया गया। इसमें किसानों द्वारा अपनाई गई नवीन तकनीकों, फसल विविधीकरण और कृषि क्षेत्र में किए गए सफल प्रयोगों को शामिल किया गया है। अधिकारियों ने कहा कि ऐसी सफलता की कहानियां दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा का माध्यम बन सकती हैं।
बैठक में डॉ. कुंदन सिंह, कुलदीप, प्रवीण कुमार, मीना कुमारी, मीरा सुथार, शंकर लाल चौधरी सहित प्रगतिशील कृषक रामचंद्र, माणक वैष्णव एवं पूजा वैष्णव ने भी कृषि क्षेत्र से जुड़े विभिन्न सुझाव समिति के समक्ष रखे।
35 प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा-
बैठक में कृषि विज्ञान केंद्र के उद्यान वैज्ञानिक डॉ. राजेश जलवानियां, पशुपालन वैज्ञानिक डॉ. एच.एल. बुगालिया, फार्म मैनेजर गोपाल लाल टेपन, तकनीकी सहायक हेमलता मीणा, महेश चंद्र सुवालका, अजीत सिंह राठौड़, डॉ. लालचंद सहित कुल 35 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक में कृषि की लागत कम करने, फसल विविधीकरण, जल संरक्षण, प्राकृतिक एवं जैविक खेती, आधुनिक तकनीक, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन जैसे विषयों पर मंथन हुआ। बैठक का मूल संदेश यही रहा कि किसान को केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि कम लागत में गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और उत्पाद का बेहतर मूल्य प्राप्त कर खेती को अधिक लाभकारी बनाना होगा।