गंगा संधि का नया अध्याय: क्या सुनी जाएगी बिहार की पुकार?

(कुमार कृष्णन -)
स्मार्ट हलचल|दिसंबर 2026 में भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि के 30 साल पूरे हो रहे हैं। 2050 की जल जरूरतों को देखते हुए बिहार इस बार अपना हक ज्यादा मुखरता से मांग रहा है। भागलपुर जनसंवाद ने इस बहस को बराज की तकनीक से निकालकर गंगा की अविरलता, गाद और मछुआरों की आजीविका के सवाल से जोड़ दिया है।
गंगा को दूर से देखने और गंगा के साथ जीने में फर्क है। दूर से गंगा एक विराट, शांत और पवित्र नदी दिखाई देती है, लेकिन उसके किनारे रहने वाला किसान जानता है कि यही नदी कभी खेतों को जीवन देती है और कभी पूरी फसल बहा ले जाती है। मछुआरा जानता है कि उसकी रोजी-रोटी नदी की धारा में है। दियारा का परिवार जानता है कि गंगा की चाल बदलने का अर्थ जमीन, घर और भविष्य,तीनों का संकट है। इसलिए बिहार के लिए गंगा केवल पानी नहीं, जीवन और अधिकार का प्रश्न है।
इसी संदर्भ में फरक्का एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। 1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुई गंगा जल बंटवारा संधि की तीस वर्ष की अवधि दिसंबर 2026 में पूरी हो रही है। संधि के भविष्य पर बातचीत की तैयारी के बीच बिहार की आवाज इस बार पहले से कहीं अधिक मुखर है।
खास बात यह है कि इस बार दबाव केवल विपक्ष की ओर से नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की महत्वपूर्ण सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) भी बिहार के जल-अधिकार को लेकर केंद्र से स्पष्ट आश्वासन मांग रही है। वर्ष 2050 तक बिहार की जल जरूरतों को ध्यान में रखकर संधि की समीक्षा की मांग वर्तमान से निकालकर भविष्य की चिंताओं में बदल देती है।
केंद्र की ओर से भी बिहार को भरोसा दिया गया है लेकिन राजनीति में भरोसा और नीति में फर्क होता है। असली परीक्षा तब होगी, जब नई व्यवस्था की शर्तें सामने आएंगी और यह स्पष्ट होगा कि बिहार की जल जरूरत, गंगा का पर्यावरणीय प्रवाह तथा नदी पर निर्भर समुदायों के हित उसमें कितनी जगह पाते हैं। इसी पृष्ठभूमि में भागलपुर में हुआ राष्ट्रीय जनसंवाद और उससे निकला भागलपुर घोषणा-पत्र विशेष महत्व रखता है।
गंगा मुक्ति आंदोलन की पहल पर हुए इस संवाद ने फरक्का को केवल एक बराज या भारत-बांग्लादेश के बीच पानी के बंटवारे की तकनीकी समस्या के रूप में नहीं देखा। उसने इसे गंगा की अविरलता, नदी पर निर्भर समुदायों और पूरे गंगा तंत्र के भविष्य से जोड़ा। फरक्का सहित नदी पर बने अवरोधों की समीक्षा और गंगा के न्यायपूर्ण, पर्यावरण सम्मत प्रवाह की मांग इसी व्यापक चिंता से निकली है। भागलपुर की यह आवाज अचानक पैदा नहीं हुई। 1982 में कहलगांव से शुरू हुआ गंगा मुक्ति आंदोलन मछुआरों के अधिकार और गंगा की स्वतंत्र धारा का सवाल उठाता रहा है। आंदोलन से जुड़े अनिल प्रकाश ने लंबे संघर्ष के दौरान गंगा पर बराजों के प्रभाव और उसकी अविरलता का प्रश्न उठाया था। आज फरक्का की बहस में वह आवाज फिर सुनाई दे रही है। सवाल केवल यह नहीं कि पानी किस दिशा में जाएगा,सवाल यह भी है कि नदी अपने स्वाभाविक जीवन के साथ कितनी दूर तक बह सकेगी।
बिहार की राजनीति में भी फरक्का को लेकर एक असामान्य स्थिति बन रही है। जदयू का दबाव और राष्ट्रीय जनता दल के बक्सर सांसद सुधाकर सिंह की पहल अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि के बावजूद एक साझा चिंता की ओर संकेत करती है। सुधाकर सिंह ने फरक्का जल संधि पर पुनर्विचार की मांग उठाई है। यह आग्रह बताता है कि पानी का सवाल किसी एक दल की सीमा में बांधकर नहीं देखा जा सकता। इसी तरह राकेश कुमार मंडल जैसे नेताओं की ओर से कटाव और जमीन बचाने का सवाल उठाया जाना बताता है कि नदी का संकट केवल पानी की मात्रा का संकट नहीं, जमीन और आजीविका का संकट भी है।
फरक्का की बहस को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदल देना समस्या को छोटा करना होगा। गंगा की बाढ़ के अनेक कारण हैं। अत्यधिक वर्षा, हिमालयी नदियों का व्यवहार, गाद, तटबंध, नदी की बदलती धारा और जल निकासी की सीमाएं। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि से किसी एक कारण को पूरी त्रासदी का जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं। फरक्का, गाद और नदी के प्रवाह के बीच संबंधों की समग्र समीक्षा जरूरी है, लेकिन उसका आधार वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए।
फरक्का के प्रश्न का एक दूसरा संवेदनशील पक्ष भी है,वह है इसे धार्मिक पहचान से जोड़ने का खतरा। अभी सीधे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि भारतीय जनता पार्टी फरक्का के सवाल का सांप्रदायीकरण करना चाहती है। नदी कर्मी जया मित्र के अनुसार बराज और जल संधि दो अलग अलग मुद्दे है ।नदी कई प्रदेश और देश से गुजरती है। नदी के पानी पर हक सभी का है। सामाजिक माध्यमों पर फरक्का को धार्मिक पहचान से जोड़ने वाली सामग्री दिखाई देती है। लेकिन गंगा की बाढ़ हिंदू और मुसलमान के घर में अंतर नहीं करती। गाद खेत की फसल को जाति पूछकर नष्ट नहीं करती। नदी में मछली पकड़ने वाले मछुआरे की आजीविका उसकी धार्मिक पहचान से नहीं, नदी के प्रवाह से जुड़ी है। गंगा की डॉल्फिन को इस बात से कोई मतलब नहीं कि उसके किनारे कौन रहता है। यदि फरक्का की बहस को धार्मिक पहचान में बदल दिया गया तो बिहार के वास्तविक जल-अधिकार का प्रश्न पीछे चला जाएगा।
इसलिए फरक्का का सवाल जितना राजनीतिक है, उतना ही मानवीय और पर्यावरणीय भी। भारत-बांग्लादेश संबंधों को बिहार के हितों के विरुद्ध खड़ा करना भी उचित नहीं होगा। बांग्लादेश की निचली गंगा पर निर्भरता वास्तविक है। वहां कृषि, मत्स्य और करोड़ों लोगों की आजीविका नदी से जुड़ी है। भारत को पड़ोसी देश के साथ जल संबंधों में विश्वास, सहयोग और न्याय बनाए रखना होगा। लेकिन अंतरराष्ट्रीय सहयोग का अर्थ भारत के भीतर संबंधित राज्यों की आवाज को गौण कर देना भी नहीं हो सकता।
नई व्यवस्था की कसौटी इसलिए तीन स्तरों पर होनी चाहिए। बांग्लादेश के साथ न्याय, बिहार के साथ न्याय और गंगा के साथ न्याय।
1996 की परिस्थितियां आज जैसी नहीं हैं। आबादी बढ़ी है, कृषि का स्वरूप बदला है, शहरों और उद्योगों की जल जरूरत बढ़ी है, भूजल पर दबाव बढ़ा है और जलवायु परिवर्तन ने वर्षा तथा नदी के व्यवहार को अधिक अनिश्चित बनाया है। इसलिए वर्ष 2050 को ध्यान में रखकर जल की जरूरत का वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए। नई व्यवस्था केवल पुरानी संधि की अवधि बढ़ाने वाली व्यवस्था न हो, बल्कि बदलते जलवायु और नदी-विज्ञान के अनुरूप नई समझ पर आधारित हो।
गंगा के साथ न्याय का अर्थ यह भी है कि नदी को केवल पानी की मात्रा में नापा न जाए। उसका प्राकृतिक प्रवाह, गाद, मत्स्य संसाधन, डॉल्फिन, भूजल और नदी किनारे की जैव-विविधता भी जल नीति का हिस्सा बने। नदी का पानी बांटते समय नदी का जीवन न बांट दिया जाए। यदि जल बंटवारे के आंकड़े पूरे कर दिए गए, लेकिन नदी का पारिस्थितिक जीवन नष्ट होता गया, तो कोई भी समझौता न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता।
भागलपुर घोषणा-पत्र की प्रासंगिकता यहीं है। उसने नदी के सवाल को फिर समाज के बीच खड़ा किया है। यह केवल फरक्का के विरोध का दस्तावेज नहीं, बल्कि गंगा को एक जीवित नदी मानने की पुकार है। यह उस पुराने संघर्ष की स्मृति भी है जिसने मछुआरों और नदी किनारे के समुदायों को अपनी आवाज दी।
जदयू का दबाव इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह सत्ता-साझेदारी का हिस्सा है। यदि सत्ता के भीतर से बिहार के जल-अधिकार की आवाज उठ रही है और विपक्ष भी इसी दिशा में सवाल कर रहा है तो केंद्र के पास इसे केवल राजनीतिक शोर मानकर टालने की गुंजाइश कम हो जाती है।
दिसंबर 2026 में क्या बिहार की भविष्य की जल जरूरतों का स्पष्ट उल्लेख होगा? क्या नदी के पर्यावरणीय प्रवाह को जल बंटवारे का अनिवार्य हिस्सा माना जाएगा? क्या गाद और बाढ़ के प्रश्न पर समग्र नीति बनेगी? क्या नदी से जुड़े समुदायों की आजीविका को निर्णय प्रक्रिया में स्थान मिलेगा? और क्या बदलती जलवायु के अनुरूप नई व्यवस्था की समयबद्ध समीक्षा का प्रावधान होगा?
दिसंबर 2026 इसलिए केवल एक संधि की अवधि पूरी होने की तारीख नहीं है। यह भारत की जल नीति को नए सिरे से देखने का अवसर है। फरक्का रहेगा या हटेगा, यह महत्वपूर्ण प्रश्न हो सकता है, लेकिन उससे बड़ा प्रश्न यह है कि गंगा बचेगी कैसे। यदि किसी संरचना में परिवर्तन जरूरी है तो उसका निर्णय वैज्ञानिक प्रमाणों पर हो,यदि सुधार संभव है तो उसे लागू किया जाए। नीति का आधार राजनीतिक सुविधा नहीं, नदी और समाज का दीर्घकालिक हित होना चाहिए।
फरक्का पर आज जो दबाव बन रहा है, उसे केवल राजनीतिक दबाव बनकर नहीं रहना चाहिए। उसे गंगा के न्याय की पुकार बनना होगा। बिहार को पानी चाहिए। बांग्लादेश को भी पानी चाहिए। लेकिन गंगा को भी अपना पानी चाहिए। नदी के हिस्से का पानी बचाए बिना किसी भी जल समझौते को न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता। और इसीलिए फरक्का पर असली सवाल यह नहीं कि कौन किसके पक्ष में है। असली सवाल यह है कि क्या बिहार की जल-चिंता को वैज्ञानिक और संघीय अधिकार के प्रश्न के रूप में सुना जा रहा है, या उसे किसी दूसरी राजनीतिक पहचान में बदलने की कोशिश हो रही है। गंगा को धर्म की पहचान में बांटना उसके स्वभाव को समझने से इनकार करना होगा। नदी जोड़ती है, बांटती नहीं। इसलिए फरक्का की बहस को सांप्रदायिक भावनाओं की आग में झोंकने के बजाय विज्ञान, संघीय अधिकार, पड़ोसी देशों के हित और नदी के न्याय की कसौटी पर रखना होगा।
यदि ऐसा हुआ तो दिसंबर 2026 किसी पुरानी संधि की समाप्ति की तारीख भर नहीं होगी। वह गंगा के साथ एक नई समझ की शुरुआत बन सकती है,जिसमें बांग्लादेश का अधिकार, बिहार का जल-अधिकार और नदी का जीवन, तीनों सुरक्षित हों।