BRICS: मंच बदला, समीकरण बदले, अब भारत लिख रहा नई इबारत

(शाश्वत तिवारी)

स्मार्ट हलचल|भारत की अध्यक्षता में आयोजित यह सम्मेलन केवल राष्ट्राध्यक्षों की बैठक नहीं है। यह उस बदलती वैश्विक व्यवस्था का संकेत है जिसमें एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ग्लोबल साउथ की आवाज पहले से कहीं अधिक मजबूत होती दिखाई दे रही है।
भारत से दुनिया को जो सबसे बड़ा संदेश मिला है, वह यही है कि भारत अब वैश्विक राजनीति का दर्शक नहीं है। भारत एक बड़ी  निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है, और आने वाले समय में लक्ष्य इससे भी बड़ा होना चाहिए। भारत ऐसा देश बने जो दुनिया के फैसलों से प्रभावित होने के बजाय दुनिया के फैसलों को प्रभावित करे। BRICS भारत को यह अवसर देता है।
लेकिन अवसर को शक्ति में बदलने के लिए नीति, व्यापार, तकनीक, कूटनीति और राष्ट्रीय हित, इन पांचों को एक दिशा में चलाना होगा। यदि भारत ऐसा कर पाया तो आने वाला दशक केवल भारत की आर्थिक वृद्धि का दशक नहीं होगा। यह भारत के वैश्विक प्रभाव के विस्तार का दशक हो सकता है। BRICS की नई दिल्ली बैठक इसलिए इतिहास के पन्नों में केवल एक सम्मेलन के रूप में दर्ज नहीं होनी चाहिए। इसे उस मोड़ के रूप में याद किया जाना चाहिए जब भारत ने दुनिया से कहा, हम दुनिया से अलग नहीं हैं, हम दुनिया के साथ हैं, लेकिन भारत की आवाज, भारत के हित और भारत का भविष्य, अब वैश्विक व्यवस्था के केंद्र में होगा।
कभी दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक ताकत का केंद्र कुछ चुनिंदा पश्चिमी देशों को माना जाता था। फैसले कहीं और होते थे और दुनिया के बड़े हिस्से को उन फैसलों का पालन करना पड़ता था। लेकिन 21वीं सदी की बदलती तस्वीर बता रही है कि शक्ति का केंद्र अब धीरे-धीरे बदल रहा है।
नई दिल्ली में आयोजित 18वां BRICS शिखर सम्मेलन इसी बदलती हुई दुनिया की एक महत्वपूर्ण तस्वीर है।
——
यह बदलाव केवल बड़े उद्योगपतियों के लिए नहीं है। इसका सीधा लाभ, भारतीय MSME, किसान, स्टार्टअप, इंजीनियरिंग उद्योग, फार्मा, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्नोलॉजी और सेवा क्षेत्र को मिलेगा।
—–
आज BRICS में 11 देश शामिल हैं और ये देश मिलकर दुनिया की करीब आधी आबादी तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगभग 40 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। यानी सवाल अब यह नहीं है कि BRICS कितना बड़ा संगठन है।
सवाल यह है कि भारत इस संगठन को अपनी आर्थिक, कूटनीतिक और रणनीतिक शक्ति में कितना बदल सकता है? और यहीं से भारत के भविष्य की सबसे बड़ी कहानी शुरू होती है।
—-
अगर सही नीति बनी तो, लखनऊ का छोटा कारोबारी, कानपुर का उद्यमी, नोएडा का स्टार्टअप, मुरादाबाद का निर्माता, और बड़ी संख्या में यूपी के साथ देश का किसान भी इसके लाभार्थी बन सकते हैं।
—–
BRICS को लंबे समय तक केवल एक आर्थिक समूह के रूप में देखा जाता रहा। लेकिन आज इसकी भूमिका तेजी से व्यापक हो रही है।
व्यापार, निवेश, ऊर्जा, तकनीक, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, आपूर्ति श्रृंखला, स्टार्टअप और वित्तीय सहयोग जैसे क्षेत्रों में BRICS का महत्व बढ़ रहा है। भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान, यानी लचीलापन, नवाचार, सहयोग और टिकाऊ विकास को प्राथमिकता दी है। यह भारत की बदलती सोच का भी परिचायक है।
भारत अब केवल यह नहीं कह रहा कि दुनिया में उसकी हिस्सेदारी बढ़े। भारत यह भी कह रहा है कि दुनिया के नियम बनाने की प्रक्रिया में उसकी आवाज भी निर्णायक होनी चाहिए।
BRICS का सबसे सीधा फायदा भारतीय व्यापार और उद्योग को हो सकता है। भारत के पास दुनिया के बड़े उपभोक्ता बाजारों में से एक है। दूसरी तरफ BRICS के विस्तारित समूह में एशिया, अफ्रीका, खाड़ी क्षेत्र, यूरोप के आसपास के भूभाग और लैटिन अमेरिका तक पहुंच बनाने की संभावना मौजूद है। यदि भारत इन देशों के साथ व्यापारिक बाधाओं को कम करने, भुगतान व्यवस्था को आसान बनाने और बाजार तक पहुंच बढ़ाने में सफल होता है तो इसका सीधा लाभ, भारतीय MSME, किसान, स्टार्टअप, इंजीनियरिंग उद्योग, फार्मा, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्नोलॉजी और सेवा क्षेत्र को मिलेगा।
भारत की BRICS अध्यक्षता के दौरान MSME वित्त, वैश्विक बाजारों तक छोटी कंपनियों की पहुंच और व्यापार वित्त से जुड़े मुद्दों पर महत्वपूर्ण पहल हुई है। यह बदलाव केवल बड़े उद्योगपतियों के लिए नहीं है। अगर सही नीति बनी तो लखनऊ का छोटा कारोबारी, कानपुर का उद्यमी, नोएडा का स्टार्टअप, सूरत का निर्माता और देश का किसान भी इसके लाभार्थी बन सकते हैं।
BRICS की चर्चा में सबसे अधिक आकर्षण स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान व्यवस्था का है। यह समझना जरूरी है कि इसका अर्थ तत्काल कोई नई BRICS मुद्रा बन जाना नहीं है। वर्तमान दिशा अधिक व्यावहारिक है, सदस्य देशों की अपनी मुद्राओं में व्यापार और भुगतान को आसान बनाना तथा भुगतान प्रणालियों के बीच सहयोग बढ़ाना।
भारत के लिए इसका महत्व बहुत बड़ा है।
यदि रुपये सहित स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ता है, भुगतान तंत्र अधिक सुरक्षित और तेज होता है तथा व्यापार की लागत घटती है, तो भारतीय कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय कारोबार के नए रास्ते खुल सकते हैं। यही आर्थिक आत्मनिर्भरता का अंतरराष्ट्रीय संस्करण होगा।

भारत ने जिस क्षेत्र में दुनिया को सबसे अधिक प्रभावित किया है, उनमें डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रमुख है। UPI इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत अब अपने डिजिटल अनुभव को केवल घरेलू सफलता की कहानी के रूप में नहीं देखता। BRICS के मंच पर डिजिटल ढांचे, भुगतान, स्वास्थ्य और औद्योगिक क्षमता जैसे क्षेत्रों में भारतीय पहल को आगे बढ़ाया गया है।
कल्पना कीजिए, भारत की डिजिटल भुगतान तकनीक, डिजिटल पहचान का अनुभव और सार्वजनिक डिजिटल ढांचा यदि BRICS देशों के साथ साझा होता है तो यह केवल तकनीकी सहयोग नहीं होगा। यह भारत के डिजिटल प्रभाव का वैश्विक विस्तार होगा।

आने वाले 20 वर्षों की सबसे बड़ी शक्ति तेल नहीं, केवल हथियार भी नहीं, डेटा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI होने वाली है। BRICS ने AI को भी प्रमुख एजेंडे में स्थान दिया है और ऐसे AI की आवश्यकता पर बल दिया है जो सुरक्षित, समावेशी और ग्लोबल साउथ की जरूरतों के अनुरूप हो। भारत के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर है। भारत के पास- विशाल युवा आबादी, तेजी से बढ़ता डिजिटल बाजार, तकनीकी प्रतिभा, स्टार्टअप इकोसिस्टम, IT क्षेत्र की वैश्विक क्षमता पहले से मौजूद है। यदि BRICS के भीतर AI, साइबर सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, डिजिटल भुगतान और नई तकनीक में साझा अनुसंधान विकसित होता है, तो भारत आने वाले दशक में टेक्नोलॉजी का केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता और नीति-निर्धारक बन सकता है।

BRICS का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है- कूटनीति। भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। एक तरफ भारत अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ सहयोग करता है, दूसरी तरफ रूस के साथ अपने पुराने संबंध बनाए रखता है और चीन जैसे प्रतिस्पर्धी पड़ोसी के साथ भी संवाद के रास्ते खुले रखता है। नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात भी इसी जटिल लेकिन महत्वपूर्ण कूटनीतिक संतुलन का उदाहरण रही।
यही भारत की ताकत है। भारत किसी एक खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अनेक शक्ति केंद्रों से संबंध बनाने की क्षमता रखता है। BRICS इस क्षमता को और मजबूत करता है।

भारत लंबे समय से सीमा-पार आतंकवाद का सामना करता आया है। BRICS के मंच से आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट और सामूहिक आवाज भारत की कूटनीतिक स्थिति को मजबूत करती है। नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद और विशेष रूप से पहलगाम हमले की निंदा तथा सीमा-पार आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश सामने आया। यह भारत के लिए केवल कूटनीतिक उपलब्धि नहीं है। यह संदेश है कि- आतंकवाद किसी देश की विदेश नीति का औजार नहीं बन सकता। और यदि आने वाले वर्षों में BRICS आतंकवाद के वित्तपोषण, साइबर आतंकवाद और आतंकवादी नेटवर्क के खिलाफ ठोस सहयोग विकसित करता है, तो यह वैश्विक सुरक्षा में बड़ा योगदान हो सकता है।

BRICS को केवल बड़े शहरों और बड़े उद्योगों का मंच समझना भूल होगी। भारत की वास्तविक आर्थिक शक्ति गांवों में है। कृषि, खाद्य सुरक्षा, जलवायु-सक्षम खेती, कृषि तकनीक और खाद्य व्यापार BRICS के एजेंडे में महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। भारत यदि अपनी कृषि तकनीक, डिजिटल कृषि, मिलेट्स, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि उत्पादों के लिए BRICS बाजार विकसित कर सके तो करोड़ों किसानों को नए बाजार मिल सकते हैं। यानी BRICS का सही अर्थ होगा,
दिल्ली से लेकर गांव तक आर्थिक अवसरों का विस्तार।

भारत पहले ही मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। BRICS के भीतर MSME, स्टार्टअप, लॉजिस्टिक्स, फोटोवोल्टिक उद्योग और नई औद्योगिक तकनीक में सहयोग के लिए पहल हुई हैं। भारत ने ब्रिक्स स्टार्टअप फंड और इनक्यूबेटर नेटवर्क जैसे अहम प्रस्ताव भी आगे बढ़ाए हैं। यदि यह सहयोग जमीन पर उतरता है तो भारतीय स्टार्टअप को केवल भारतीय निवेशक नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय साझेदार मिल सकते हैं।
और यही वह बिंदु है जहां, “मेक इन इंडिया” से “मेक फॉर ब्रिक्स” और आगे चलकर “मेक फॉर वर्ड” की यात्रा तेज हो सकती है।
यहां एक सावधानी भी जरूरी है। किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन की सफलता केवल घोषणाओं से नहीं होती। BRICS में चीन और भारत के बीच प्रतिस्पर्धा है। सदस्य देशों के राजनीतिक और रणनीतिक हित भी हमेशा एक जैसे नहीं होते। विशेषज्ञों ने BRICS के विस्तार के साथ संस्थागत एकजुटता और आंतरिक मतभेदों को बड़ी चुनौती बताया है। इसलिए भारत को भावनात्मक उत्साह से आगे बढ़कर व्यावहारिक रणनीति बनानी होगी।
नई दिल्ली में दुनिया के बड़े देशों का एक मंच पर आना निश्चित रूप से भारत की कूटनीतिक ताकत का प्रदर्शन है। लेकिन असली सफलता तब मानी जाएगी जब, भारतीय निर्यात बढ़े, भारतीय कंपनियों को नए बाजार मिलें, विदेशी निवेश बढ़े, तकनीकी साझेदारी बढ़े, स्टार्टअप को वैश्विक पूंजी मिले, MSME अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचें, रुपये में व्यापार का दायरा बढ़े, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो, और भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता और मजबूत हो। तभी BRICS भारत के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं, बल्कि आर्थिक परिवर्तन का इंजन बनेगा।
आज दुनिया एक ध्रुवीय व्यवस्था से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। इस बदलाव में भारत की स्थिति सबसे अलग है। भारत के पश्चिम से भी संबंध हैं और पूर्व से भी। भारत ग्लोबल साउथ की आवाज भी है और विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझेदार भी। भारत लोकतंत्र है, विशाल बाजार है, युवा शक्ति है, तकनीकी क्षमता है और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में भारत केवल BRICS का एक सदस्य नहीं रहेगा। भारत BRICS के भीतर संतुलन, संवाद और विकास का प्रमुख केंद्र बन सकता है।

नई दिल्ली से दुनिया को जो सबसे बड़ा संदेश मिला है, वह यही है कि भारत अब वैश्विक राजनीति का दर्शक नहीं है। भारत एक बड़ी  निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है, और आने वाले समय में लक्ष्य इससे भी बड़ा होना चाहिए। भारत ऐसा देश बने जो दुनिया के फैसलों से प्रभावित होने के बजाय दुनिया के फैसलों को प्रभावित करे। BRICS भारत को यह अवसर देता है।
लेकिन अवसर को शक्ति में बदलने के लिए नीति, व्यापार, तकनीक, कूटनीति और राष्ट्रीय हित, इन पांचों को एक दिशा में चलाना होगा। यदि भारत ऐसा कर पाया तो आने वाला दशक केवल भारत की आर्थिक वृद्धि का दशक नहीं होगा। यह भारत के वैश्विक प्रभाव के विस्तार का दशक हो सकता है। BRICS की नई दिल्ली बैठक इसलिए इतिहास के पन्नों में केवल एक सम्मेलन के रूप में दर्ज नहीं होनी चाहिए। इसे उस मोड़ के रूप में याद किया जाना चाहिए जब भारत ने दुनिया से कहा, हम दुनिया से अलग नहीं हैं, हम दुनिया के साथ हैं, लेकिन भारत की आवाज, भारत के हित और भारत का भविष्य, अब वैश्विक व्यवस्था के केंद्र में होगा।
___
(लेखक: स्वतंत्र पत्रकार हैं)