स्मार्ट हलचल|रामदेव जी हिंदू मुस्लिम एकता के प्रतीक,बाबा रामदेव,धवली ध्वजा रा धणी,पीरो के पीर, रुणिचा रा धणी,रामसा पीर,एकता के प्रतीक आदि नाम से जाने जाते हैं।तंवर वंशीय राजपूत अजमाल जी और माता मैणादे के पुत्र रामदेव जी का जन्म भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को उण्डूकाश्मेर शिव तहसील जिला बाड़मेर में हुआ था।ये अर्जुन के वंशज माने जाते हैं। भाद्रपद शुक्ला द्वितीया को “बाबा रो बीज” (दूज)कहा जाता है।इस तिथि को रामदेव जी के अवतार की तिथि भी माना जाता है।अजमाल जी के दो पुत्र थे बड़े पुत्र बीरमदेव को “बलराम का अवतार”तथा रामदेव जी को “कृष्ण का अवतार” माना जाता है,रामदेव जी का विवाह अमरकोट (पाकिस्तान) के सोडा राजपूत दलैसिंह सोढा की पुत्री नेतल दे के साथ हुआ।
रामदेव जी हड़बूजी व मल्लिनाथ जी के समकालीन थे।मल्लिनाथ जी ने रामदेव जी को पोकरण का क्षेत्र जागीर में दिया था।रामदेव जी ने इस क्षेत्र में भैरव राक्षस का वध कर जनता को कष्टो से मुक्ति दिलाई थी।और पोकरण कस्बे को पुन बसाया।रामदेव जी ने अपनी भतीजी के विवाह में पोकरण को दहेज में दे दिया और तत्पश्चात रामदेवरा (रुणिचा) नामक गांव बसाकर यहां रामसरोवर का निर्माण करवाया।रामदेव जी ने 1458 ईस्वी में भाद्रपद शुक्ला एकादशी को रुणेचा के रामसरोवर की पाल पर जीवित समाधि ली थी।
मेघवाल जाति की कन्या डाली बाई रामदेव जी की धर्म बहन एवं शिष्या थी।रामदेव जी द्वारा समाधि लिये जाने से एक दिन पहले उनके पास डाली बाई द्वारा जीवित समाधि ली गई।रामदेवरा रुणेचा में डालीबाई का मंदिर है।सुगना बाई रामदेव जी की वास्तविक बहन थी।भैरव राक्षस,लख्खी बंजारा,रतन राइका का संबंध रामदेव जी से ही था।
रामदेव जी के गुरु का नाम बालीनाथ था।रामदेव जी के चमत्कारों को”पर्चा” कहा जाता है। रामदेव जी के भक्तों द्वारा गाये जाने वाले भजन “ब्यावले”कहलाते हैं।रामदेव जी ने कामडपंथ(कामड़िया पंथ) चलाया था। इस पंथ के सर्वाधिक लोग पादरला गाम पाली में निवास करते हैं। रामदेव जी के भोपे कामड जाति के होते हैं।रामदेव जी ने मूर्ति पूजा,तीर्थ यात्रा तथा बाहरी आडंबरों को दूर किया। रामदेव जी ने गुरु की महत्वता स्वीकार करते हुये कहा था” यह संसार अथाह समुद्र के समान है जिसे गुरु ही पार उतार सकता है” रामदेव जी के अनुयायियों में दलित,निम्न जातियों के लोगों की संख्या सर्वाधिक है सभी पूज्य लोकदेवताओ मे इनकी मान्यता सर्वाधिक है।जनविश्वास के अनुसार रामदेव जी को सर्वसिद्धि प्रदाता,संबुद्धिदायक एवं कामनापूर्वक देवता माना जाता है।रामदेव जी को “रूणेचा रा धणी” “पीरों का पीर” “रामसापीर” “कृष्ण का अवतार” “सांप्रदायिक सद्भाव के लोक देवता”आदि उपनामों से जाना जाता है।मक्का से आए पांच पीरों ने रामदेव जी के चमत्कारों से प्रभावित होकर कहा था कि”मैं तो केवल पी हां और थे पीरा रा पीर” पंचपीपली नामक धार्मिक स्थल पर रामदेव जी ने पंच पीरो को पर्चा दिया था। यहीं पर पर्चा बावड़ी स्थित है।रामदेव जी की पूजा स्थल को थान तथा मंदिर को”देवरा”कहा जाता है।जिन पर सफेद या पांच रंगों की ध्वजा”नेजा” फहराई जाती है। रामदेव जी के मेघवाल भक्तों को”रिखिया”कहा जाता है।तीर्थ यात्रियों को जातरू कहा जाता है।रामदेव जी का वाहन लीला या नीला घोड़ा था। रामदेव जी का प्रतीक चिन्ह “पगलिया” है
रामदेव जी के प्रमुख मंदिर रामदेवरा या रुणिचा पोकरण तहसील जैसलमेर,मसूरिया की पहाड़ी पर(जोधपुर) बिराठिया (पाली) सुरताखेड़ा(चित्तौड़गढ़) छोटा रामदेवरा(गुजरात) आधारशिला रामदेव का मंदिर (जोधपुर) खुंण्डियावास धाम परबतसर नागौर आदि स्थलों पर है।
रामदेव जी की स्मृति में भाद्रपद शुक्ल द्वितीया व एकादशी को रात्रि जागरण किया जाता है जिसे”जम्मा जागरण”कहते हैं।रामदेव जी द्वारा रचित ग्रंथ चौबीस बांणिया के नाम से प्रसिद्ध है। रामदेव जी एकमात्र एसे लोक देवता है जो कवी और लेखक थे।रामदेव जी द्वारा पश्चिमी भारत में धर्मांतरण व्यवस्था को रोकने हेतु तथा हिंदू धर्म की शुद्धीकरण हेतु चलाया गया अभियान”परावर्तन” या “शुद्धि आंदोलन” कहलाता है।
रामदेव जी की जीवन गाथा का चित्रण करने वाली रामदेव जी की पड का चित्रांकन सर्वप्रथम चौथमल चितेरे ने किया था।यह पड कोली,भांभी,मेघवाल जाति में प्रचलित है।यह पड कामड जाति के भोपो द्वारा रावणहत्था वाद्ययंत्र के साथ बांची जाती है।रामदेव जी की पड मुख्य रूप से बीकानेर व जैसलमेर में बांची जाती है। रामदेव जी हैजा व कुष्ठ रोगों से बचाते हैं।रामदेव जी ने अस्पृश्यता,छुआछूत,शोषण,सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ चलाया गया जनजागृति अभियान”जम्मा जागरण”कहलाता है।
रामदेव जी राजस्थान के एकमात्र ऐसे लोक देवता हैं जिसकी मान्यता हिंदू एवं मुसलमान दोनों ही संप्रदायों में बराबर रूप से है।रामदेवरा रुणिचा में प्रतिवर्ष लगने वाले मेले में जहां हिंदू एवं मुसलमान दोनों ही जातियों के लोग बहुत संख्या में जाते हैं। यह राजस्थान के लख्खी मेलों में से एक मेला माना जाता है। दोनों संप्रदायों में मान्यता होने के कारण इसे”सांप्रदायिक सद्भाव” का मेला भी कहा जाता है। हिंदू लोग जहां इन्हें बाबा रामदेव के नाम से पूजते हैं वही मुसलमान रामसा पीर के नाम से पूजते हैं।
-राजेश कुमार मीना
करौली