25 वार्डों के मंथन से निकली ऐसी सियासी पहेली, 13 के जादुई आंकड़े ने बढ़ाई बेचैनी—अब किसके हिस्से आएगा कुर्सी का अमृत?
नीरज मीणा
मंडावर। स्मार्ट हलचल/सतयुग में देवता और दानव अमृत के लिए समुद्र मंथन कर रहे थे, लेकिन मंडावर में कलियुग का मंथन कुछ ऐसा है कि समुद्र कम और सियासी लहरें ज्यादा उठ रही हैं। वहां अमृत कलश क्षीर सागर से निकला था, यहां अमृत कलश सीधे नगर पालिका की चेयरमैन कुर्सी पर रखा दिखाई दे रहा है।
25 वार्डों के चुनावी मंथन के बाद तस्वीर साफ है—भाजपा के खाते में 10, कांग्रेस के खाते में 8 और 7 निर्दलीय। बहुमत चाहिए 13 का। यानी कुर्सी सामने है, लेकिन बहुमत का रास्ता अभी भी सात निर्दलीयों की चौखट से होकर गुजरता दिखाई दे रहा है।
कुर्सी एक… दावेदार दो… और चाबी सात के पास!
भाजपा की ओर से अशोक नारेड़ा और कांग्रेस की ओर से अनीता देवी मीणा मैदान में हैं। कागज पर मुकाबला सीधा है, लेकिन गणित इतना सीधा नहीं कि कैलकुलेटर भी चैन की सांस ले सके।
भाजपा के पास 10 और कांग्रेस के पास 8 पार्षद हैं। दोनों को बहुमत के लिए अतिरिक्त समर्थन की जरूरत है। ऐसे में वे 7 निर्दलीय पार्षद, जिनके पास अपनी-अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता है, इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।
यानी कहानी कुछ ऐसी है—
कुर्सी दो दावेदारों की, बहुमत 13 का और नजरें सात पर!
बगावत की आग बुझी या सिर्फ धुआं थमा?
नाम वापसी के आखिरी दिन भाजपा खेमे से गुड्डी देवी और आशा देवी के नाम वापस होने के बाद मुकाबला दो प्रत्याशियों तक सिमट गया। बाहर से देखें तो मैदान साफ नजर आता है, लेकिन राजनीति में मैदान साफ होना और रास्ता साफ होना—दो अलग-अलग बातें हैं।
अब असली परीक्षा उन रणनीतिकारों की है जो अपने-अपने खेमे के आंकड़ों को 13 तक पहुंचाने की कवायद में जुटे हैं।
किसके साथ कौन जाएगा?
किसे समर्थन मिलेगा?
कौन आखिरी समय तक अपना रुख बनाए रखेगा?
और सबसे बड़ा सवाल—किसके खाते में चेयरमैन की कुर्सी जाएगी?
इन सवालों के जवाब अभी बंद लिफाफे में हैं।
सात निर्दलीय—राहु, केतु या अमृत के देवदूत?
इन सात निर्दलीयों को कोई सियासी राहु-केतु मान रहा है तो कोई अमृत कलश की चाबी। लेकिन इतना तय है कि इनके रुख पर निगाहें टिकी हैं।
आज जो समीकरण दिखाई दे रहा है, मतदान के दिन वही रहे—यह जरूरी नहीं।
राजनीति के इस समुद्र मंथन में कौन किसके साथ खड़ा होता है, यही तय करेगा कि अमृत किसे मिलता है और किसके हाथ सिर्फ खाली कलश आता है।
21 सितंबर को खुलेगा सियासी पिटारा
अब सबकी नजर 21 सितंबर को प्रस्तावित चेयरमैन चुनाव के मतदान पर है। बाड़ेबंदी, बैठकों और राजनीतिक गणित के बीच आखिरकार वह घड़ी आएगी जब दावों की जगह वोट बोलेंगे।
उस दिन न भाषण काम आएगा, न कागजी गणित।
जिसके पक्ष में आंकड़ा खड़ा होगा, वही कुर्सी पर बैठेगा।
और मंडावर की जनता?
जनता को न अमृत की चिंता है, न राहु-केतु की।
जनता की सीधी मांग है—
चेयरमैन कोई भी बने,
कुर्सी किसी की भी हो,
बस मंडावर के विकास की फाइलों पर अगले पांच साल धूल न जमे।