मसूरी में 600 प्रशिक्षु आईएएस और एक सवाल: “उंगलियों पर हल होने वाला सवाल और भविष्य के प्रशासकों की तैयारी का सच”
मसूरी से उठता सवाल: क्या हमारी प्रशासनिक शिक्षा केवल पुस्तकीय हो गई है? लाल बहादुर शास्त्री अकादमी का लक्ष्य: ‘थिंकिंग एडमिनिस्ट्रेटर’ तैयार करना।
✍️ डॉ प्रियंका सौरभ
उत्तराखंड के शांत, अनुशासित और सुसंस्कृत वातावरण में स्थित मसूरी का प्रसिद्ध प्रशासनिक अकादमी परिसर—लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA)—देश के सर्वोच्च सिविल सेवकों के निर्माण का केंद्र बिंदु है। यहाँ आज भी 600 से अधिक प्रशिक्षु अधिकारी भविष्य के भारतीय प्रशासन की रूपरेखा तय करने की तैयारी में डटे हैं।
हाल ही में 100वें फाउंडेशन कोर्स का समापन समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा और भी बढ़ा दी, लेकिन वहां एक साधारण से सवाल ने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया।
वह सवाल जिसने खड़ी कर दी प्रशासनिक प्रशिक्षण पर बहस
समारोह के दौरान रक्षा मंत्री ने एक सरल-सा गणितीय प्रश्न पूछा, जिसने कक्षाओं में सन्नाटा खींच दिया:
रक्षा मंत्री का सवाल:
“एक आदमी के पास कुछ पैसे थे। उसने आधा ‘ए’ (A) को, एक-तिहाई ‘बी’ (B) को और शेष 100 रुपये ‘सी’ (C) को दिए। बताइए, कुल पैसा कितना था?”
दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाला यह सीधा-सा सवाल प्रशिक्षुओं के लिए अप्रत्याशित सिद्ध हुआ। कई प्रशिक्षु अधिकारी प्रश्न में उलझ गए, जबकि समाधान उंगलियों पर किया जा सकता था। बाद में स्वयं राजनाथ सिंह ने इसे सरल तरीके से हल कर समझाया।
किताबी ज्ञान बनाम व्यवहारिक बुद्धि (Common Sense)
यह घटना भले ही साधारण प्रतीत हो, पर प्रशासनिक प्रशिक्षण और नेतृत्व क्षमता की वास्तविक दिशा पर यह बेहद महत्त्वपूर्ण संकेत देती है। प्रशासन का मूल तत्व केवल कानून और नियमों का ज्ञान नहीं, बल्कि तुरंत समझने, तर्क लागू करने और व्यवहारिक समाधान निकालने की क्षमता है।
“कभी-कभी सबसे कठिन परिस्थितियों में सर्वाधिक सरल समाधान ही सर्वश्रेष्ठ होता है—पर इसके लिए मन का खुलापन और व्यावहारिक सोच आवश्यक होती है। यही गुण एक सक्षम प्रशासक को भीड़ से अलग करता है।”
प्रशासनिक सोच के दो मूलमंत्र
राजनाथ सिंह द्वारा पूछा गया प्रश्न प्रशासनिक सोच के दो महत्त्वपूर्ण पहलुओं को उजागर करता है:
- मूल समस्या पर ध्यान: अधिकारी का ध्यान समस्या के मूल की ओर होना चाहिए, न कि उसकी सतही जटिलता की ओर।
- दबाव में सरलता: किसी भी चुनौती में घबराना नहीं, बल्कि उसे विभाजित कर सरल रूप में हल करना चाहिए।
निष्कर्ष: नेतृत्व की असल परीक्षा
सिविल सेवा का इतिहास बताता है कि देश के श्रेष्ठ अधिकारी वही रहे, जिन्होंने अत्यधिक बुद्धि के साथ-साथ सरल सोच, जन-संपर्क की क्षमता और सहज निर्णय-प्रक्रिया अपनाई।
मसूरी में घटित यह छोटा-सा घटनाक्रम इस बात का प्रतीक है कि नेतृत्व की ताकत केवल बड़े भाषणों या उच्च ज्ञान में नहीं, बल्कि सरल तर्क और मौलिक समझ में भी निहित होती है। सिविल सेवा के भविष्य को आकार देने वाले प्रशिक्षुओं के लिए यह एक स्मरणीय संदेश है—प्रशासन की महानता सरलता में है, न कि जटिलता में।
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