आज नवरात्रि पर विशेष
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शक्ति पूजा से जगदंबा को प्रकट करने के बाद राम ने की थी रावण पर चढ़ाई
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स्मार्ट हलचल|आज रविवार से प्रारंभ होने वाली शारदीय नवरात्रि का समापन 20 अक्टूबर को होगा। नवरात्रि के नौ दिनों में मां भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा के तहत प्रतिदिन एक शक्ति की पूजा का विधान है। सृष्टि की संचालिका कही जाने वाली आदिशक्ति की नौ कलाएं (विभूतियां) नवदुर्गा कहलाती हैं। ‘मार्कण्डेय पुराण’ में नवदुर्गा का शैलपुत्री, बह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री के रूप में उल्लेख मिलता है।
नवरात्र के दौरान कन्या पूजन के बिना भगवती महाशक्ति कभी प्रसन्न नहीं होती। कन्या पूजन के माध्यम से ऋषि-मुनियों ने हमें स्त्री वर्ग के सम्मान की ही शिक्षा दी है। नवरात्र में देवी भक्तों को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह आजीवन बच्चियों और महिलाओं को सम्मान देगा और उनकी सुरक्षा के लिए सदैव प्रयत्नशील रहेगा। तभी सही मायनों में नवरात्र की शक्ति पूजा संपन्न होगी। तभी हमारा और समाज में भी जागरण होगा।
फिलहाल आज 11 अक्टूबर नवरात्र का पहला दिन मां शैलपुत्री की पूजा, 12 अक्टूबर नवरात्र का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, 13 अक्टूबर नवरात्र का तीसरा दिन मां चंद्रघंटा की पूजा, 14 अक्टूबर नवरात्र का चौथा दिन मां कूष्मांडा की पूजा, 15 अक्टूबर नवरात्र का पांचवा दिन मां स्कंदमाता की पूजा, 16 अक्टूबर नवरात्र का छठा दिन मां कात्यायनी की पूजा, 17 अक्टूबर नवरात्र का सातवां दिन मां कालरात्रि की पूजा, 18 अक्टूबर नवरात्र का आठवां दिन दुर्गा अष्टमी व्रत, 19 अक्टूबर नवां दिन मां महागौरी की पूजा व 20 अक्टूबर (दशमी) को मां सिद्धिदात्री की पूजा के साथ ही शारदीय नवरात्र का समापन होगा।
धार्मिक मान्यताओं अनुसार- विधि विधान के साथ मां दुर्गा की पूजा अर्चना करने से जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति होती है और परिवार के सदस्यों की उन्नति भी होती है।
नवरात्रि कलश स्थापना मुहूर्त और आध्यात्मिक महत्व के बारे में पंडित जन जो कुछ बताते हैं। उसके मुताबिक ‘या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः, पापात्मनां कृतघियां हृदयेषुवृद्धिः। श्रद्धा सतांकुलजन प्रभवस्य लज्जा, तां त्वां नताः स्म परिणालय देवी विश्वम्।।’ जो देवी पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं ही लक्ष्मी रूप से, पापियों के यहां दरिद्रतारूप से, शुद्धान्तःकरण वाले पुरुषों के हृदयों में बुद्धिरूप से सत्पुरुषों में श्रद्धारूप से और कुलीन मनुष्यों में लज्जारूप से निवास करती है, उन आप भगवती को हम सब श्रद्धापूर्वक नमन करते है। हे पराम्बा! समस्त विश्व का कल्याण कीजिए। नवरात्र को आद्याशक्ति की आराधना का सर्वश्रेष्ठ काल माना गया है। नवरात्र वृद्धि आश्विन शुक्ला प्रतिपदा को अशुभ नक्षत्र चित्रा और वैधृति योग का अभाव एवं शुक्ला तृतीया तिथि की वृद्धि होने से नवरात्र विशेष शुभ एवं राष्ट्र के शत्रुओं का पराभवकारी सिद्ध होगा।
पंडित ज्योतिषाचार्य के मुताबिक घटस्थापन मंदिरों और शक्तिपीठों में सुबह 06:19 से 10:12 तक विशेष शुभ रहेगा। भगवती की पूजा के लिए बनाए गए विशेष पंडालों और घरों में सुबह 11:44 से 12:31 तक सामान्य शुभ रहेगा।
अगर नवरात्रि के आध्यात्मिक महत्व के बारे में बात करें तो सवंत्सर (वर्ष) में चार नवरात्र होते है। चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी पर्यंत नौ दिन नवरात्र कहलाते है। इन चार नवरात्रों में दो गुप्त और दो प्रकट, चैत्र का नवरात्र वासंतिक और आश्विन का नवरात्र शारदीय नवरात्र कहलाता है। वासंतिक नवरात्र के अंत में रामनवमी आती है और शारदीय नवरात्र के अंत में दुर्गा महानवमी इसलिए इन्हें राम नवरात्र और देवी नवरात्र भी कहते है। किंतु शाक्तों की साधना में शारदीय नवरात्र को विशेष महत्व दिया गया है। इसी कारण बंगाल में दुर्गा पूजा मुख्यतः शारदीय नवरात्र में ही होती है।
वहीं ऋृग्वेद में शारदीय शक्ति दुर्गा पूजा का उल्लेख मिलता है। बंगाल में विशाल प्रतिमाओं में सप्तमी, अष्टमी और महानवमी को दुर्गापूजा होती है। जगन्माता को यहां कन्या रूप से अपनाया गया है, मानो विवाहिता पुत्री पति के घर से पुत्र सहित तीन दिन के लिए माता-पिता के पास आती है। मां दस भुजाओं में दस प्रकार के आयुध धारण कर शेर पर सवार होकर, महिषासुर कें कंधे पर अपना एक चरण रखे त्रिशूलद्वारा उसका वध कर रही होती है। शारदीय शक्ति पूजा को विशेष लोकप्रियता त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चंद्र के अनुष्ठान से भी मिली। देवी भागवत में भगवान श्रीरामचंद्र द्वारा किए गए शारदीय नवरात्र के व्रत तथा शक्ति पूजन का सुविस्तृत वर्णन मिलता है। इसके अनुसार, श्रीराम की शक्ति पूजा सम्पन्न होते ही जगदंबा प्रकट हो गई थीं। शारदीय नवरात्र के व्रत का पारण करके दशमी के दिन श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई कर दी। रावण का वध करके कार्तिक कृष्ण अमावस्या को श्रीरामचंद्र भगवती सीता को लेकर अयोध्या लौट आए। शायद यही मानता यही मान्यता यही विश्वास और आध्यात्मिक अवधारणा ही
हमें मां भगवती के भक्त होने का सौभाग्य प्रदान किए हुए है। जो भक्तों को हर संकट से मुक्ति दिलाने में देर नहीं लगातीं।