आखिर किसके सिर सजेगा जिला प्रमुख का ताज ! दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर !

विशेष राजनीतिक रिपोर्ट #2 – आकाश शर्मा
चित्तौड़गढ़। स्मार्ट हलचल|चित्तौड़गढ़ के सियासी गलियारों में इन दिनों बस एक ही सवाल कौंध रहा है—”आखिर किसके सिर सजेगा जिला प्रमुख का ताज?” हाल ही में संपन्न हुए निकाय चुनावों में जहाँ प्रत्याशियों को प्रचार और रणनीति के लिए बेहद कम समय मिला था, वहीं इसके ठीक विपरीत पंचायत चुनाव के लिए प्रत्याशियों को मिला अच्छा-खासा वक्त इस बार की राजनीतिक बिसात को बेहद दिलचस्प बना चुका है। एन त्योहारों के इस माहौल में, जहाँ हर प्रत्याशी अपनी गोटी जमाने और वोटों की फसल काटने में दिन-रात एक किए हुए है, वहीं जिला प्रमुख का पद सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित होने के साथ ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर टिकटों को लेकर जो अंदरूनी घमासान छिड़ा है, उसने राजनीति के तापमान को चरम पर पहुँचा दिया है। दिग्गजों द्वारा अपने घर-परिवार की महिलाओं को चुनावी समर में उतारने की होड़ और वर्चस्व की यह जंग अब पूरी तरह परवान चढ़ चुकी है !
नौ सीटों पर घमासान और दिग्गजों की प्रतिष्ठा
जिले की 359 ग्राम पंचायतों से मिलकर बने 35 वार्डों में से 9 वार्ड सामान्य महिला के लिए आरक्षित हुए हैं। लेकिन असली खेल तो इसके आगे शुरू होता है—सामान्य पुरुष के लिए आरक्षित 9 वार्डों से भी भाजपा के कई दिग्गज अपनी घर-परिवार की महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारने की जुगत भिड़ा रहे हैं । इस मची खींचतान ने पार्टी संगठन के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि क्या संगठन किसी एक सर्वमान्य चेहरे पर सहमति बना पाएगा, या फिर यह आंतरिक कलह पार्टी के लिए भारी साबित होगी? इस महासंग्राम में कई बड़े नेताओं की राजनीतिक प्रतिष्ठा सीधे तौर पर दांव पर लगी है।
चेहरों का उलझा पेच,किस-किस के नाम पर चर्चा !
जिला भाजपा के पास वर्तमान में ऐसा कोई स्वतःस्फूर्त बड़ा महिला चेहरा नहीं है जिसे पार्टी सीधे तौर पर इस पद के लिए प्रोजेक्ट कर सके। यही वजह है कि संगठन और जनप्रतिनिधियों की पसंद या कृपा पात्र महिलाओं के नाम पर मुहर लगना तय माना जा रहा है। रेस में शामिल प्रमुख चेहरों का समीकरण कुछ इस प्रकार है।
सुशीला कंवर आक्या- चित्तौड़गढ़ विधायक चंद्रभान सिंह आक्या की धर्मपत्नी। भदेसर पंचायत समिति की पूर्व प्रधान और वर्तमान में चित्तौड़गढ़ केंद्रीय सहकारी बैंक की चेयरपर्सन। प्रशासनिक और राजनीतिक संतुलन का लंबा अनुभव इनके पक्ष में सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है ।
रतन लाल गाडरी (जिलाध्यक्ष)- पार्टी के तीन बार के जिलाध्यक्ष अपने परिवार से किसी महिला को उतारने की फिराक में हैं। हालांकि, सूत्रों का मानना है कि ऐसा होने पर पार्टी में भीतरघात और खुली बगावत का खतरा पैदा हो सकता है, जिससे संगठन फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है।
कमलेश पुरोहित की पत्नी- संगठन के रणनीतिकारों में शुमार कमलेश पुरोहित की पत्नी का नाम भी चर्चा में है। हालांकि, कयास यह भी हैं कि निकाय चुनावों की तरह संगठन इन्हें चुनावी जंग की बजाय प्रदेश स्तर पर किसी आयोग या बोर्ड की जिम्मेदारी सौंप सकता है ।
उर्मिला कंवर (वार्ड 21)- भदेसर पंचायत समिति की पूर्व उप-प्रधान। संघ पृष्ठभूमि, प्रदेश संगठन में मजबूत पैठ और सीपी जोशी खेमे के खास नेता की पत्नी होने के नाते, यदि ये जीतती हैं तो समीकरण पूरी तरह पलट सकते हैं।
विद्या देवी अग्रवाल (वार्ड 17)- जिला महिला मोर्चा की महामंत्री। वैश्य समाज से ताल्लुक रखने वाली और सांसद सी.पी. जोशी के खासमखास कार्यकर्ता राजू अग्रवाल की पत्नी होने के नाते यह भी इस रेस में मजबूती से डटी हैं।
अरुणा कंवर नारेला- नारेला ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच और वर्तमान में सहकारी समिति की निर्विरोध अध्यक्ष। राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाती इस महिला नेत्री का नाम भी काफी चर्चा में है।
अन्य चेहरे- पूर्व जिला प्रमुख सुशीला जीनगर सहित कई अन्य महिला नेत्रियां भी इस रेस में अपनी जमीन तलाश रही हैं।
क्या थमेगी सिरफुटव्वल या बगावत बनेगी चुनौती !
चित्तौड़गढ़ की इस सियासी बिसात पर मोर्चेबंदी पूरी हो चुकी है । एक तरफ पारिवारिक प्रतिष्ठा बचाने की जिद है, तो दूसरी तरफ संगठन के सामने पार्टी की एकजुटता बनाए रखने की अग्निपरीक्षा । यदि टिकट वितरण में जरा भी चूक हुई, तो यह अंतर्कलह भाजपा के लिए भारी नुकसान का सबब बन सकती है । अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस उलझी हुई राजनीति और वर्चस्व की इस जंग में आखिरी बाजी किसके हाथ लगती है और पार्टी संगठन इस चक्रव्यूह को कैसे भेदता है !