लोकमंथन यात्रा का ग्रामोत्सवरू जब गांव की मिट्टी में जाग उठी लोक संस्कृति, तालाब किनारे गूंजे परंपराओं के स्वर

रस्साकशी से गिल्ली-डंडा तक दिखा देसी खेलों का रोमांच, महिलाओं-बच्चों की भागीदारी ने बांधा समांय गौ पूजन और सरोवर पूजन से प्रकृति के प्रति श्रद्धा का संदेश

शाहपुरा। मूलचन्द पेसवानी
स्मार्ट हलचल|कहीं रस्साकशी में दमखम की आजमाइश, कहीं सितोलिया में निशाना साधने का उत्साह, कहीं गिल्ली-डंडा के साथ बचपन की यादें और कहीं पतंगबाजी के बीच उल्लास से भरे चेहरे…। महासतीया तालाब का किनारा उस समय ग्रामीण संस्कृति के जीवंत रंगों से सराबोर हो उठा, जब लोकमंथन यात्रा के तहत निकटवर्ती ग्राम पनोतिया में प्रभात ग्राम पनोतिया ग्रामोत्सव का आयोजन हुआ। यहां गांव की मिट्टी की खुशबू, लोक परंपराओं की मिठास और सामूहिक सहभागिता का ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसमें पूरा गांव उत्सव का सहभागी बन गया। महिलाओं, पुरुषों, युवाओं और बच्चों की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने आयोजन को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि गांव की सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव बना दिया।

गाजे-बाजे से स्वागत, गांव में उत्सव की उमंग
लोकमंथन यात्रा के पनोतिया पहुंचते ही ग्रामीणों ने गाजे-बाजे के साथ स्वागत किया। यात्रा के आगमन के साथ ही गांव में उत्साह का माहौल बन गया। ग्रामीणों की सहभागिता ने यह अहसास कराया कि गांव की असली पहचान उसकी परंपराओं, आपसी जुड़ाव और सामूहिक जीवनशैली में बसती है।
महासतीया तालाब पर आयोजित ग्रामोत्सव में जैसे ही पारंपरिक खेलों का सिलसिला शुरू हुआ, ग्रामीण जीवन की पुरानी तस्वीरें जीवंत होने लगीं। रस्साकशी में ताकत और तालमेल का रोमांच दिखा तो सितोलिया, लंगड़ी कूद, छरभर, पतंगबाजी और गिल्ली-डंडा ने लोक खेलों की दुनिया से नई पीढ़ी को रूबरू कराया। खेलों में महिला-पुरुषों के साथ बालक-बालिकाओं की भागीदारी ने आयोजन में चार चांद लगा दिए।

न मोबाइल की दुनिया, न आधुनिक खेलों का शोर… देसी खेलों में दिखा असली रोमांच
आज जब बच्चों का अधिकतर समय मोबाइल और डिजिटल मनोरंजन में गुजरने लगा है, ऐसे में पनोतिया का ग्रामोत्सव पारंपरिक खेलों की जीवंतता का अनूठा उदाहरण बना। यहां मनोरंजन के लिए किसी बड़े मंच या आधुनिक संसाधनों की जरूरत नहीं थी। गांव का तालाब, खुले मैदान, पारंपरिक खेल और अपनों का साथ ही उत्सव की सबसे बड़ी ताकत बने।
रस्साकशी में सामूहिक शक्ति और तालमेल की भावना दिखाई दी। सितोलिया और लंगड़ी कूद ने फुर्ती और कौशल का रंग जमाया, जबकि गिल्ली-डंडा ने ग्रामीण बचपन की यादों को ताजा किया। पतंगबाजी ने आसमान की ओर नजरें टिकाईं तो छरभर जैसे पारंपरिक खेलों ने स्थानीय लोकजीवन की झलक प्रस्तुत की। हर गतिविधि में भागीदारी का उत्साह दिखाई दिया। खेलों का यह संसार केवल जीत-हार तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें हंसी, उमंग, आपसी सहयोग और साथ मिलकर आनंद लेने की भावना प्रमुख रही।
इस आयोजन की खूबसूरती यही रही कि यहां दर्शक और प्रतिभागी के बीच की दूरी कम नजर आई। ग्रामीण संस्कृति की सहजता के बीच सभी ने अपनेपन के साथ भागीदारी निभाई। लोकमंथन यात्रा के माध्यम से परंपरागत खेलों को फिर से सामुदायिक जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश भी उभरा।

तालाब किनारे गौ पूजन और सरोवर पूजन, प्रकृति से जुड़ाव का संदेश
पारंपरिक खेलों के बाद महासतीया तालाब पर गौ पूजन और सरोवर पूजन किया गया। इस आयोजन ने ग्रामोत्सव को धार्मिक और सांस्कृतिक गरिमा प्रदान की। ग्रामीण जीवन में गौवंश और जलस्रोतों के महत्व को रेखांकित करने वाली इन गतिविधियों के माध्यम से प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव सामने आया।
सरोवर पूजन ने जल के महत्व और पारंपरिक जलस्रोतों से ग्रामीण समाज के गहरे संबंध को उजागर किया। तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि गांव की सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृतियों का भी हिस्सा होते हैं। ऐसे में सरोवर के प्रति श्रद्धा का प्रदर्शन जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को याद दिलाने वाला संदेश बना। गौ पूजन ने भी ग्रामीण परंपराओं में गौवंश के सम्मान और उसकी भूमिका को रेखांकित किया।

तेजाजी चैक में सांस्कृतिक संध्या, उमड़ा ग्रामीण उत्साह
रात को गांव के तेजाजी चैक में ग्रामोत्सव के तहत सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुआ। दिनभर महासतीया तालाब पर लोक खेलों और धार्मिक गतिविधियों में भागीदारी के बाद रात्रिकालीन कार्यक्रम ने उत्सव को नया रंग दिया। ग्रामीणों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और पूरे आयोजन के दौरान उल्लास का माहौल बना रहा।
दिन में पारंपरिक खेलों के माध्यम से जहां लोक संस्कृति का परिचय मिला, वहीं रात के कार्यक्रम ने सामूहिक सहभागिता को और मजबूती दी। महिलाओं, पुरुषों, युवाओं और बच्चों की मौजूदगी ने आयोजन को गांव के साझा उत्सव का स्वरूप प्रदान किया।
लोकमंथन यात्रा के तहत आज सुबह पनोतिया में शाखा कार्यक्रम आयोजित हुआ। यात्रा में विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, ग्राम विकास और साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।
यात्रा में जसवंत खत्री, सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, सार्वजनिक निर्माण विभागय डॉ. सत्यनारायण कुमावत, संयोजक लोकदर्शन परिक्रमा यात्रा एवं राजस्थान क्षेत्र सह-संयोजक प्रज्ञा प्रवाहय श्रीमती मीनू खत्रीय श्याम बिहारी, प्रांत ग्राम विकास गतिविधि संयोजकय महेंद्र शर्मा, प्रांत सह-संयोजक ग्राम विकास गतिविधिय महेंद्र भारती, क्षेत्र आपदा प्रबंधन संयोजक सेवा भारतीय डॉ. श्रीनारायण, संस्कृत साहित्य के व्याख्याता एवं लोकमंथन यात्रा मीडिया प्रबंधन प्रभारीय महेंद्र कुमार, अध्यापक एवं रथ प्रबंधन प्रभारीय डॉ. परमेश्वर प्रसाद कुमावत, वरिष्ठ संस्कृत अध्यापकय देवी सिंह रथसारथीय पूर्व सैनिक रूपचंदय विष्णु हरिहर, प्रदेश महामंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषदय तथा महेश शर्मा, प्रांत अध्यक्ष संस्कृत भारती सहित गांव और क्षेत्र के गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।
गांव की एकजुटता बनी ग्रामोत्सव की सबसे बड़ी पहचान
पनोतिया का ग्रामोत्सव इस बात का उदाहरण बना कि ग्रामीण संस्कृति की असली ताकत उसकी सामूहिकता में निहित है। पारंपरिक खेलों की मस्ती, धार्मिक परंपराओं के प्रति श्रद्धा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी ने गांव के सामुदायिक जीवन की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत की।
महासतीया तालाब से तेजाजी चैक तक फैले उत्सव ने पुरानी लोक परंपराओं को नई पीढ़ी के सामने जीवंत किया। आयोजन का संदेश स्पष्ट रहाकृगांव की पहचान केवल उसके भवनों और रास्तों से नहीं, बल्कि उसकी मिट्टी, परंपराओं, प्रकृति और एक-दूसरे के साथ जुड़े लोगों से बनती है। जब पूरा गांव मिलकर उत्सव मनाता है, तब लोक संस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं रहती, बल्कि वर्तमान में जीवंत होकर भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचने वाली विरासत बन जाती है।