गुरला में कागजों में स्वच्छ, जमीन पर गंदा! पानी की टंकी के पास बना शौचालय 5 साल से बिना टंकी के, नल-टूटी गायब
गुरला:-स्मार्ट हलचल|भीलवाड़ा जिले की पंचायत समिति सुंवाणा की गुरला ग्राम पंचायत में स्वच्छ भारत मिशन की जमीनी हकीकत क्या है, इसका सबसे बड़ा सबूत कालका माता मंदिर रोड पर पानी की टंकी के पास बना सार्वजनिक शौचालय है। यह शौचालय पिछले पांच साल से बिना पानी की टंकी, बिना नल और बिना टूटी के बंद पड़ा है। ग्राम पंचायत ने शौचालय की इमारत तो बना दी, फोटो खिंचवा कर कागजों में काम पूरा दिखा दिया, लेकिन उसमें ग्राम पंचायत पानी की व्यवस्था करना ही भूल गई। पांच साल बाद भी ग्रामीण इस शौचालय में टंकी का इंतजार कर रहे हैं। *कागजों में स्वच्छ, जमीन पर गंदा – कैसे?* भारत सरकार और राजस्थान सरकार का दावा है कि पूरा राजस्थान खुले में शौच से मुक्त हो चुका है। हर ग्राम पंचायत को सर्टिफिकेट दिया गया है। गुरला कागजों में दिखाया गया है कि यहां हर घर में शौचालय है और सार्वजनिक स्थलों पर भी शौचालय बने हैं। लेकिन कालका माता मंदिर रोड पर बना यह शौचालय इस दावे को झूठा साबित करता है। जब सार्वजनिक शौचालय में ही पानी नहीं है यह केवल कागजी खानापूर्ति है। पंचायत ने निर्माण दिखाकर पैसा उठा लिया, लेकिन सुविधा नहीं दी। यह जनता के साथ धोखा है और सरकारी पैसे का दुरुपयोग है। यह शौचालय गांव के महत्वपूर्ण स्थान पर बना है। एक तरफ कालका माता का प्रसिद्ध मंदिर है जहां रोजाना 200 से 300 लोग दर्शन करने आते हैं, नवरात्रि में यहां आस पास के दर्शानार्थी पहुंचते हैं। दूसरी तरफ गांव की मुख्य पानी की टंकी है जहां से पूरे गांव में पानी सप्लाई होता है। सरकारी स्कूल के बच्चे, आंगनबाड़ी पास में सऐसे व्यस्ततम चौराहे पर शौचालय बंद होने से सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं को होती है। मंदिर आई महिलाएं शौचालय बंद देखकर वापस जाने को मजबूर होती हैं। कई बार उन्हें खेतों में जाना पड़ता है जो उनकी सुरक्षा और सम्मान के खिलाफ है।
*पांच साल का पूरा घटनाक्रम:* स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के तहत इस शौचालय को मंजूरी मिली। पंचायत ने टेंडर निकाला और एक स्थानीय ठेकेदार को काम दिया। लाखो रुपये की लागत से शौचालय बनाया गया। निर्माण के समय ही ग्रामीणों ने कहा था कि पानी की टंकी भी लगाओ, लेकिन ठेकेदार ने कहा कि टंकी का पैसा अलग से आएगा। शौचालय बनने के बाद सरपंच ने फोटो खिंचवाई और सोशल मीडिया पर डाल दिया कि हमने स्वच्छता के लिए काम किया। उसके बाद कोई नहीं आया। सचिव ने कहा कि पानी का कनेक्शन जलदाय विभाग करेगा, जलदाय विभाग ने कहा कि पंचायत करेगी। इसी खींचतान में पांच साल निकल गए। इस दौरान दो बार सरपंच चुनाव भी हो गए, लेकिन किसी ने इस शौचालय की सुध नहीं ली। आज इसकी दीवारों पर सीलन है, दरवाजे टूटे हैं, अंदर कचरा भरा है और नल की जगह केवल जंग लगे पाइप बचे हैं। *वर्तमान स्थिति का आंखों देखा हाल:* अगर आप आज वहां जाएंगे तो आपको यह दिखेगा: शौचालय की इमारत खड़ी है लेकिन छत पर टंकी रखने का स्टैंड खाली है। अंदर दोनों सीटों पर फ्लश नहीं है। दीवार से निकले पाइपों में टूटी नहीं है, केवल छेद हैं। जमीन पर पानी की एक बूंद नहीं। बाहर लिखा है सार्वजनिक शौचालय, लेकिन दरवाजे पर ताला नहीं, अंदर अंधेरा है। आसपास कचरा, शराब की बोतलें और पॉलिथीन पड़ी है। मुख्य पानी की टंकी मात्र 10 कदम दूर है, वहां से एक पाइप जोड़ना बहुत आसान है, लेकिन पांच साल से यह 10 कदम की दूरी पूरी नहीं हुई। यह लापरवाही नहीं, बल्कि घोर लापरवाही है।
बंद शौचालय के कारण लोग आज भी खुले में शौच करने को मजबूर हैं। मंदिर रोड के आसपास खेतों में गंदगी फैलती है। इससे मक्खी-मच्छर बढ़ते हैं और बीमारियां फैलती हैं। बरसात में यह गंदगी बहकर पानी की टंकी के पास आती है, जिससे पीने का पानी दूषित होने का खतरा है। बच्चों में दस्त, उल्टी और टाइफाइड जैसी बीमारियां इसी गंदगी से फैलती हैं। स्वच्छता नहीं होने से गांव की सुंदरता भी खराब होती है। बाहर से आने वाले लोग जब यह हाल देखते हैं तो गांव की छवि खराब होती है।
स्वच्छ भारत मिशन की गाइडलाइन के अनुसार हर सार्वजनिक शौचालय में 500 लीटर की टंकी, पर्याप्त पानी, नल, साबुन, रोशनी और सफाई कर्मचारी होना अनिवार्य है। गुरला के इस शौचालय में एक भी शर्त पूरी नहीं होती। यह गाइडलाइन का सीधा उल्लंघन है। इसके अलावा राजस्थान पंचायती राज अधिनियम कहता है कि ग्राम पंचायत का कर्तव्य है कि वह सार्वजनिक संपत्ति की देखभाल करे। यहां पंचायत अपने ही बनाए शौचालय की देखभाल नहीं कर रही। यह कर्तव्य में लापरवाही है।
गुरला के ग्रामीणों की मांग बिल्कुल साफ है। पहला, तुरंत नई टंकी लगाई जाए। दूसरा, मजबूत स्टील की नल-टूटी लगाई जाए ताकि चोरी न हो। तीसरा, मुख्य टंकी से स्थायी कनेक्शन जोड़ा जाए। चौथा, लाइट और सफाई की व्यवस्था हो। पांचवा, इस पूरे घोटाले की जांच हो कि पांच साल तक टंकी क्यों नहीं ग्रामीण जिला कलेक्टर को ज्ञापन देंगे, 181 पर शिकायत करेंगे और मीडिया को बुलाएंगे।
गुरला में कागजों में स्वच्छता दिखाना आसान है, लेकिन जमीन पर स्वच्छता लाने के लिए पानी की टंकी और नल-टूटी लगानी पड़ती है। पांच साल से बिना पानी के पड़ा यह शौचालय सिस्टम की नाकामी का जीता जागता सबूत है। उम्मीद है कि यह रिपोर्ट पढ़ने के बाद प्रशासन जागेगा और कालका माता मंदिर रोड के इस शौचालय में जल्द पानी की टंकी लगेगी। स्वच्छ भारत तभी सफल होगा जब गुरला जैसे गांव में बना हर शौचालय चालू होगा, कागजों में नहीं, जमीन पर।