देशभक्ति के रंग में रंगा मंच, क्रांतिकारियों के बलिदान और संघर्ष के दृश्यों ने दर्शकों को किया भावविभोर
रेखचंद्र भारद्वाज
जुरहरा, जिला डीग।स्मार्ट हलचल|ऐतिहासिक नगरी जुरहरा में देशभक्ति, क्रांतिकारी विचारधारा और आजादी के दीवानों के अदम्य साहस को समर्पित नाटक ‘इंकलाब की मशाल : शहीद-ए-आजम भगत सिंह’ का शानदार मंचन किया गया। नाटक के माध्यम से देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले महान क्रांतिकारियों के संघर्ष, त्याग और बलिदान को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया। मंच पर कलाकारों ने अपने प्रभावशाली अभिनय, संवाद अदायगी और भावपूर्ण प्रस्तुतियों से ऐसा समां बांधा कि दर्शक देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत हो उठे।
नाटक में अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों, भारतीय क्रांतिकारियों के संघर्ष, जेल में दी गई यातनाओं और देश की स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते प्राण न्योछावर करने वाले वीर सपूतों की गाथा को प्रभावशाली ढंग से दर्शाया गया। प्रत्येक दृश्य ने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की याद दिलाते हुए दर्शकों को यह एहसास कराया कि आजादी असंख्य देशभक्तों के त्याग, तपस्या और सर्वोच्च बलिदान का परिणाम है।
जलियांवाला बाग हत्याकांड से गूंजा इंकलाब का स्वर-
नाटक की शुरुआत में जलियांवाला बाग हत्याकांड के दृश्य का मंचन किया गया। अंग्रेजी शासन की क्रूरता और निर्दोष भारतीयों पर किए गए अत्याचारों को देखकर दर्शक भावुक हो उठे। इस दृश्य ने ब्रिटिश हुकूमत के दमनकारी रवैये और देशवासियों के मन में उठते आक्रोश को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया। इसके बाद साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन और पंजाब केसरी लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज के प्रसंग को मंचित किया गया।
असेंबली बम कांड ने जगाई क्रांति की चेतना
नाटक का एक प्रमुख आकर्षण भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने के ऐतिहासिक घटनाक्रम का मंचन रहा।
नाटक ने यह संदेश दिया कि भगत सिंह केवल एक वीर क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने वाले प्रखर विचारक भी थे।
चंद्रशेखर आजाद के अदम्य साहस ने किया रोमांचित
चंद्रशेखर आजाद के जीवन के अंतिम क्षणों का मंचन भी बेहद प्रभावशाली रहा।
मां विद्यावती से भगत सिंह की मुलाकात ने नम कीं आंखें-
नाटक का सबसे भावुक प्रसंग जेल में भगत सिंह और उनकी मां विद्यावती की मुलाकात का रहा। एक ओर देश की आजादी के लिए फांसी की सजा का सामना करने को तैयार वीर सपूत था, तो दूसरी ओर अपने बेटे के प्रति ममता और उसके देशप्रेम पर गर्व से भरी मां थी। कलाकारों ने इस दृश्य को संवेदनशीलता और प्रभावशाली संवादों के साथ प्रस्तुत किया।
हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु-
नाटक का चरम दृश्य शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की अंतिम शहादत का रहा। देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले तीनों वीरों के अंतिम क्षणों को कलाकारों ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
तनुज शर्मा के निर्देशन में कलाकारों ने बिखेरा अभिनय का जादू
नाटक के लेखक एवं निर्देशक तनुज शर्मा तथा सह-निर्देशक चेतन शर्मा के निर्देशन में कलाकारों ने ऐतिहासिक घटनाओं को मंच पर सजीव करने का प्रयास किया। विभिन्न प्रसंगों के अनुरूप संवाद, भाव-भंगिमाएं और मंचीय प्रस्तुतियां नाटक को प्रभावशाली बनाती रहीं। स्टेज सॉन्ग ने भी प्रस्तुति में देशभक्ति का रंग भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से नई पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास, क्रांतिकारियों के विचारों और उनके सर्वोच्च बलिदान से परिचित कराने का सार्थक प्रयास किया गया।
इन कलाकारों ने निभाईं प्रमुख भूमिकाएं-
नाटक में चंद्रशेखर आजाद की भूमिका विष्णु शर्मा, भगत सिंह की भूमिका तुषार शर्मा, सुखदेव की भूमिका हिमांशु शर्मा और राजगुरु की भूमिका जितेंद्र शर्मा ने निभाई। लाला लाजपत राय के किरदार में मुकेश शर्मा, भगत सिंह के पिता किशन सिंह की भूमिका में घनश्याम शर्मा तथा मां विद्यावती की भूमिका में अखिल वशिष्ठ नजर आए। जतिन दास की भूमिका कुंजबिहारी जांगिड़ ने निभाई। अंग्रेज अधिकारी के किरदार में शुभम पाराशर, अंग्रेज सिपाही गोरेलाल की भूमिका में गोविंद सिंह मानवी, अंग्रेज सिपाही कालेलाल की भूमिका में दीपक जायसवाल, अंग्रेज जज की भूमिका में मयंक सोनी तथा सांडर्स की भूमिका में ऋतिक खंडेलवाल ने अभिनय किया।
स्टेज सॉन्ग ने बढ़ाया देशभक्ति का जोश-
नाटक के दौरान स्टेज सॉन्ग की प्रस्तुति के माध्यम से देशभक्ति के भावों को और अधिक प्रभावशाली बनाया गया। इसमें केके शर्मा, अर्जुन सिंह मानवी, राजू पाराशर, रामस्वरूप शर्मा, अतुल शर्मा, नरेश साहू और संदीप मानवी ने अपनी सहभागिता निभाई। इसके अतिरिक्त हिमांशु कौशिक, निखिल जैन, राहुल साहू, अशोक सोलंकी ने ड्रामा में अपनी भूमिकाओं को सलीके से करते हुए दर्शकों की वाही वाही बटोरी। पर्दे के पीछे के दृश्य रचनाकार मक्खन जांगिड़, भूपेश सैनी, सोनू जांगिड़, संजय शास्त्री के द्वारा ड्रामा में अपना योगदान दिया गया। इसके अलावा डॉ. प्रमोद अग्रवाल (डिम्पल), रतन वशिष्ठ एवं रामलीला नाटक कमेटी के द्वारा ड्रामे का मार्गदर्शन किया गया।
क्रांतिकारियों के बलिदान को याद दिलाती रही प्रस्तुति
‘इंकलाब की मशाल : शहीद-ए-आजम भगत सिंह’ नाटक ने स्वतंत्रता संग्राम की ऐतिहासिक घटनाओं को मंच पर उतारते हुए देश के वीर सपूतों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की। नाटक के माध्यम से यह संदेश सामने आया कि भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद और अन्य क्रांतिकारियों का बलिदान भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है।
ऐसी नाट्य प्रस्तुतियां न केवल मनोरंजन का माध्यम हैं, बल्कि युवाओं में देशप्रेम, साहस, सामाजिक चेतना और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना जागृत करने का भी महत्वपूर्ण कार्य करती हैं। जुरहरा में प्रस्तुत इस नाटक ने क्रांतिकारियों के संघर्ष और शहादत की गाथा को प्रभावशाली ढंग से सामने रखकर दर्शकों के मन पर अमिट छाप छोड़ने का प्रयास किया।