गायों की चिंता थी या सिर्फ विरोध का दिखावा? जिस डंपिंग यार्ड का किया था विरोध, आज उसी गौशाला का ट्रैक्टर ढो रहा है कचरा!
✍️ जहाजपुर | अलकेश पारीक
खजूरी, स्मार्ट हलचल। ग्राम पंचायत में कचरा संग्रहण की व्यवस्था एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस डंपिंग यार्ड में कचरा डालने का गौशाला संचालकों ने पहले पुरजोर विरोध किया था, आज उसी गौशाला का ट्रैक्टर कचरा उठाकर उसी स्थान पर पहुंचा रहा है।
🔥 विवाद की जड़ क्या है?
पहले खुले में कचरा डालने का विरोध करते हुए दावा किया गया था कि गायें प्लास्टिक खाकर बीमार पड़ सकती हैं या उनकी मौत तक हो सकती है। अब वही व्यवस्था जारी रहने के बावजूद विरोध की आवाज़ क्यों नहीं उठ रही?
ग्रामीणों के अनुसार, जब गांव के बाहर डंपिंग यार्ड में कचरा डालने की योजना बनाई गई थी, तब गौशाला से जुड़े लोगों ने इसका कड़ा विरोध किया था। उनका कहना था कि खुले में कचरा फैलने से गायें प्लास्टिक की थैलियां और अन्य हानिकारक सामग्री खा सकती हैं, जिससे उनकी जान पर खतरा मंडरा सकता है।
उस समय मामला इतना गरमा गया था कि ग्रामीणों और संबंधित लोगों के बीच तीखी बहस, कहासुनी और गाली-गलौज तक की नौबत आ गई थी। पूरे गांव का माहौल तनावपूर्ण हो गया था।
यदि उस समय गायों की सुरक्षा को लेकर इतनी चिंता थी, तो अब उसी स्थान पर कचरा डालने पर चुप्पी क्यों है?
अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी दिखाई दे रही है। सरपंच बदलने के बावजूद कचरा डालने का स्थान नहीं बदला। उल्टा, जिस गौशाला से पहले विरोध किया गया था, आज उसी गौशाला का ट्रैक्टर कचरा संग्रहण कर डंपिंग यार्ड तक पहुंचा रहा है।
❓ उठ रहे हैं ये अहम सवाल
- क्या सरपंच बदलने के साथ गायों की सुरक्षा के मायने भी बदल गए?
- क्या अब गायें प्लास्टिक की थैलियां नहीं खाएंगी?
- यदि डंपिंग यार्ड पहले खतरनाक था तो अब सुरक्षित कैसे हो गया?
- गौशाला का ट्रैक्टर कचरा संग्रहण में किसकी अनुमति से लगाया गया?
- यदि टेंडर किसी अन्य एजेंसी के नाम है तो व्यवस्था कौन चला रहा है?
सबसे गंभीर पहलू यह है कि डंपिंग यार्ड पर न तो चारदीवारी है और न ही तारबंदी। ऐसे में कचरा खुले में पड़ा रहता है और पशुओं के उसके संपर्क में आने का खतरा लगातार बना हुआ है।
इसके अलावा गौशाला के ट्रैक्टर को कचरा संग्रहण कार्य में लगाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पंचायत प्रशासन को इस संबंध में स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि आखिर यह कार्य किस अधिकार और अनुमति के तहत किया जा रहा है।
“गायों की सुरक्षा कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी विरोध के समय भी उतनी ही जरूरी थी, जितनी आज है।”
ग्रामीणों का कहना है कि जब पहले गायों की सुरक्षा के नाम पर इतना विरोध किया गया था, तो आज उसी व्यवस्था पर चुप्पी समझ से परे है। अब देखना यह होगा कि ग्राम पंचायत प्रशासन और गौशाला संचालक इस पूरे मामले पर क्या जवाब देते हैं।
⚡ सबसे बड़ा सवाल
पहले कचरे से गायों की मौत का डर बताया गया, अब उसी कचरे को गौशाला का ट्रैक्टर डंपिंग यार्ड तक पहुंचा रहा है। आखिर इस बदलाव की वजह क्या है?