शाहपुरा-मूलचन्द पेसवानी
राजस्थान दिवस (19 मार्च) के अवसर पर जहां पूरा प्रदेश अपनी समृद्ध संस्कृति और प्राकृतिक धरोहरों का उत्सव मना रहा है, वहीं शाहपुरा क्षेत्र से एक प्रेरणादायक और गौरवपूर्ण खबर सामने आई है। यहां के ग्रामीण अंचलों में राजस्थान के राज्य पुष्प “रोहिड़ा” की खोज और उसके संरक्षण-संवर्धन को लेकर एक अनूठा अभियान चल रहा है, जिसने प्रकृति प्रेमियों और पर्यावरणविदों का ध्यान आकर्षित किया है।
रेगिस्तान की कठोर जलवायु में अपनी अलग पहचान बनाने वाला रोहिड़ा, जिसे 1983 में राजस्थान का राज्य पुष्प घोषित किया गया था, आज नवसंवत्सर के इस पावन अवसर पर अपनी पीत, केसरिया और लाल रंग की छटा से पूरे वातावरण को रंगीन बना रहा है। जहां एक ओर भारत का राष्ट्रीय पुष्प कमल जल में खिलता है, वहीं रोहिड़ा शुष्क मरुस्थलीय परिस्थितियों में अपनी सुंदरता और उपयोगिता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
वैज्ञानिक रूप से टेकोमेला अण्डूलाटा नाम से पहचाने जाने वाला यह वृक्ष 5 से 7 मीटर तक ऊँचा होता है। इसका तना कठोर, खुरदरा और हल्के भूरे रंग का होता है, जबकि इसकी पत्तियां लंबी, पतली और चमकदार हरे रंग की होती हैं। फाल्गुन से चैत्र (फरवरी से अप्रैल) के बीच जब इस पर फूल खिलते हैं, तो मानो पूरा रेगिस्तान सुनहरी आभा में नहा उठता है।
रोहिड़ा की खासियत केवल इसकी सुंदरता ही नहीं, बल्कि इसकी उपयोगिता भी है। इसकी लकड़ी बेहद मजबूत, टिकाऊ और उच्च गुणवत्ता वाली होती है, जिसके कारण इसे “मारवाड़ का सागवान” और “रेगिस्तान का सागौन” कहा जाता है। इसके फूलों पर भंवरे, तितलियां, मधुमक्खियां और गौरैया, बया, बुलबुल, मैना जैसी चिड़ियां मंडराती नजर आती हैं, जिससे यह जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
फूलों के बाद इसमें 6 से 9 इंच लंबी फलियां लगती हैं, जिनमें हल्के और पंखनुमा बीज होते हैं। गर्मी के मौसम में ये फलियां फटकर बीजों को दूर-दूर तक फैला देती हैं। यही कारण है कि मानसून के दौरान यह वृक्ष प्राकृतिक रूप से नए क्षेत्रों में उगता है और अपनी संख्या बढ़ाता है।
आम तौर पर रोहिड़ा मारवाड़ और शेखावाटी क्षेत्र में अधिक पाया जाता है, लेकिन भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा तहसील क्षेत्र में इसकी मौजूदगी एक सुखद आश्चर्य के रूप में सामने आई है। अरनियाघोड़ा, ईटमारिया, दौलतपुरा, प्रतापपुरा, ढीकोला, लूलांस, भोजपुर, कनेछनखुर्द और कनेछनकलां जैसे गांवों में यह दुर्लभ वृक्ष प्राकृतिक रूप से पाया गया है।
इस महत्वपूर्ण खोज के पीछे शाहपुरा निवासी पर्यावरण प्रेमी और शिक्षक दिनेश सिंह भाटी का विशेष योगदान है। वे पिछले 4-5 वर्षों से इन दुर्लभ वृक्षों की पहचान, निगरानी और संरक्षण पर शोधपरक कार्य कर रहे हैं। उनका प्रयास केवल रोहिड़ा तक सीमित नहीं है, बल्कि वे राष्ट्रीय और राज्य प्रतीकोंकृजैसे राष्ट्रीय वृक्ष बरगद, राष्ट्रीय पुष्प कमल, राज्य वृक्ष खेजड़ी और राज्य पुष्प रोहिड़ाकृको हर शिक्षण संस्थान में लगाने का अभियान भी चला रहे हैं।
उनकी इस पहल को स्थानीय ग्रामीणों, किसानों, मजदूरों, शिक्षकों, कृषि विज्ञान के विद्यार्थियों और शोधार्थियों का भरपूर सहयोग मिल रहा है। यह सामूहिक प्रयास न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक मजबूत कदम है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनाने का माध्यम भी बन रहा है।
राजस्थान दिवस के इस विशेष अवसर पर रोहिड़ा की यह कहानी हमें यह संदेश देती है कि यदि इच्छाशक्ति और समर्पण हो, तो सूखे और कठोर क्षेत्र में भी हरियाली और जीवन की नई उम्मीद जगाई जा सकती है। शाहपुरा का यह प्रयास निश्चित ही पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रहा है, जहां प्रकृति, पर्यावरण और जैव विविधता के संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुंच रहा है।
