शाहपुरा-मूलचन्द पेसवानी
नवसंवत्सर के पावन अवसर पर धार्मिक उल्लास और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर शाहपुरा इस बार एक बड़े बयान को लेकर सुर्खियों में आ गया। हिंदू नववर्ष समाजोत्सव समिति द्वारा आयोजित भव्य कलश यात्रा और धर्मसभा के बीच छिंदवाड़ा से पधारी साध्वी सरस्वती ने ऐसा मुद्दा उठाया, जिसने पूरे शहर में चर्चा की लहर दौड़ा दी।
हायर सेकेंडरी स्कूल मैदान में आयोजित इस विशाल आयोजन में हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने माहौल को पूरी तरह भगवामय बना दिया। बैंड-बाजों की गूंज, डीजे की धुन और हाथों में लहराते भगवा ध्वजों के बीच निकली कलश यात्रा ने शहर के प्रमुख मार्गों को भक्तिरस में डुबो दिया। हर ओर “जय श्रीराम” के उद्घोष और आस्था का सैलाब उमड़ता नजर आया।
इसी मंच से साध्वी सरस्वती ने शाहपुरा के नाम को लेकर बड़ा बयान देते हुए इसे बदलने की मांग कर डाली। उन्होंने कहा, “शाहपुरा नाम में ‘शाह’ शब्द हमारी संस्कृति और परंपरा से मेल नहीं खाता। यह भूमि किसी शाहजहां की नहीं, बल्कि रामभक्तों और धर्मप्रेमियों की पावन धरती है।” उनके इस बयान के बाद सभा में मौजूद लोगों के बीच हलचल और चर्चा तेज हो गई।
साध्वी ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से अपील करते हुए कहा कि शाहपुरा का नाम बदलकर “रामस्नेही नगर” किया जाना चाहिए, जिससे क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान और मजबूत हो सके। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यहां रामस्नेही संप्रदाय के अनुयायियों की बड़ी संख्या निवास करती है, ऐसे में यह नाम पूरी तरह उपयुक्त और भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ होगा।
अपने ओजस्वी संबोधन में साध्वी सरस्वती ने केवल नाम परिवर्तन की मांग तक ही बात सीमित नहीं रखी, बल्कि समाज को जागरूक करने का भी प्रयास किया। उन्होंने कहा कि आज के समय में केवल धार्मिक ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि आत्मरक्षा का ज्ञान भी बेहद जरूरी है। विशेष रूप से महिलाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “हर माता-बहन को शास्त्र के साथ-साथ शस्त्र का ज्ञान भी होना चाहिए। खाना बनाना आए या न आए, लेकिन तलवार चलाना जरूर आना चाहिए।”
उन्होंने देश की आंतरिक चुनौतियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारत को सबसे बड़ा खतरा बाहरी शक्तियों से नहीं, बल्कि भीतर छिपे ‘जयचंदों’ से है, जो अपने स्वार्थ के लिए राष्ट्रहित से समझौता कर लेते हैं। ऐसे तत्वों से सावधान रहने का संदेश देते हुए उन्होंने समाज को एकजुट रहने का आह्वान किया।
अपने भाषण के दौरान साध्वी ने ऐतिहासिक और धार्मिक मुद्दों को भी छुआ। उन्होंने कहा, “अयोध्या तो अभी केवल झांकी है, मथुरा और काशी बाकी हैं।” हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें किसी धर्मस्थल से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वे इस बात का विरोध करती हैं कि कई मस्जिदें मंदिरों को तोड़कर बनाई गईं। उन्होंने कहा कि धार्मिक सौहार्द बनाए रखते हुए भी इतिहास की सच्चाइयों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कार्यक्रम की शुरुआत गोमाता पूजन और भारत माता के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुई। इसके बाद भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों ने वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय बना दिया। मैदान को तिरंगे और भगवा ध्वजों से सजाया गया था, जो राष्ट्रभक्ति और धर्मभाव का अद्भुत संगम प्रस्तुत कर रहा था। इस अवसर पर समाजोत्सव समिति के अध्यक्ष द्वारका प्रसाद जोशी, ब्रह्माकुमारी संगीता बहन सहित कई गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. परमेश्वर कुमावत ने प्रभावी ढंग से किया।
कलश यात्रा और धर्मसभा में महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों की बड़ी संख्या में भागीदारी ने यह साबित कर दिया कि शाहपुरा में धर्म और संस्कृति के प्रति आस्था आज भी जीवंत है। नवसंवत्सर का यह आयोजन जहां एक ओर धार्मिक चेतना का संचार करता नजर आया, वहीं दूसरी ओर साध्वी सरस्वती के बयान ने शहर की राजनीति और सामाजिक चर्चाओं को भी नई दिशा दे दी है। अब देखना दिलचस्प होगा कि “रामस्नेही नगर” की यह मांग कितनी गति पकड़ती है और सरकार इस पर क्या निर्णय लेती है।
