मंगरोप@मुकेश खटीक।राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं में गणगौर पर्व का विशेष महत्व है,लेकिन मंगरोप कस्बा इस मामले में अपनी अनोखी परंपरा के कारण अलग पहचान रखता है।यहां गणगौर तीज के दिन पर्व नहीं मनाया जाता,बल्कि चौथ के दिन गणगौर की सवारी निकाली जाती है।इस परंपरा के पीछे लगभग 300 वर्ष पूर्व मंगरोप राजपरिवार में घटी एक दुखद घटना को प्रमुख कारण माना जाता है।म्हारासाब प्रद्युम्न सिंह पुरावत के अनुसार,करीब तीन शताब्दी पहले गणगौर तीज के दिन उनके पूर्वज युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हो गए थे।इस दुखद घटना के बाद उनकी महारानी ने भी सती होकर अपने प्राण त्याग दिए।आज भी मुख्य बस स्टैंड के पास स्थित महासतियां में उनकी स्मृति में एक भव्य छतरी बनी हुई है।जो इस इतिहास की साक्षी है।इस घटना से आहत होकर राजपरिवार ने गणगौर तीज के दिन उत्सव नहीं मनाने का निर्णय लिया और परंपरा को एक दिन आगे बढ़ाते हुए चौथ को गणगौर पर्व मनाना शुरू किया।तभी से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है और पूरे कस्बे में आज भी गणगौर की सवारी चौथ के दिन ही निकाली जाती है।इस वर्ष गणगौर पर्व का आयोजन रावला परिसर में सादगीपूर्ण ढंग से किया गया।परिवार के एक सदस्य के अस्वस्थ होने के कारण आयोजन सीमित रूप में रखा गया।पर्व के दौरान ईसर-गणगौर की प्रतिमाओं को विशेष श्रृंगार कर आकर्षक रूप से सजाया गया तथा विधिवत पूजा-अर्चना की गई। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सम्पन्न हुए इस आयोजन में श्रद्धा और आस्था का माहौल बना रहा।इस अवसर पर दौलत सिंह पुरावत,नरेन्द्र सिंह,जयकृत सिंह,प्रताप सिंह झाला,नवनीत सोमानी सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे।मंगरोप की यह अनूठी परंपरा न केवल स्थानीय इतिहास और भावनाओं से जुड़ी हुई है।बल्कि यह भी दर्शाती है कि किस प्रकार सामाजिक और पारिवारिक घटनाएं समय के साथ परंपराओं का स्वरूप धारण कर लेती हैं।
