Homeभीलवाड़ाहोली पर विशेष लेख..होली: आस्था, उल्लास और सामाजिक समरसता का महापर्व

होली पर विशेष लेख..होली: आस्था, उल्लास और सामाजिक समरसता का महापर्व

 एजाज़ अहमद उस्मानी

स्मार्ट हलचल|फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होली का त्योहार भारतीय संस्कृति का एक जीवंत और रंगों से भरा पर्व है। यह केवल रंगों और उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा, सामाजिक एकता और आध्यात्मिक संदेश का प्रतीक है। सदियों से यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय, प्रेम और भाईचारे का संदेश देता आया है।

*पौराणिक आधार और धार्मिक मान्यता*

होली का सबसे प्रमुख आधार भक्त प्रह्लाद और असुरराज हिरण्यकश्यप की कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि हिरण्यकश्यप ने कठोर तपस्या कर वरदान प्राप्त किया और स्वयं को ईश्वर मानने लगा। उसने अपने राज्य में भगवान की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया।किन्तु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह बात हिरण्यकश्यप को स्वीकार नहीं थी। उसने प्रह्लाद को अनेक यातनाएँ दीं, परंतु हर बार ईश्वर ने उसकी रक्षा की। अंततः हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता ली, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था।होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी, लेकिन वरदान का दुरुपयोग करने के कारण वह स्वयं जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया। इसी घटना की स्मृति में फाल्गुन पूर्णिमा की रात ‘होलिका दहन’ किया जाता है। यह परंपरा आज भी बुराई के दहन और सत्य की विजय का प्रतीक मानी जाती है।

*भगवान नरसिंह और धर्म की स्थापना*

पौराणिक कथा के अनुसार, जब हिरण्यकश्यप का अत्याचार चरम पर पहुँचा, तब भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण कर उसका वध किया। यह प्रसंग धर्म की स्थापना और भक्तों की रक्षा का संदेश देता है।

*राधा-कृष्ण की रंगभरी होली*

होली का एक अन्य स्वरूप ब्रज क्षेत्र में विशेष रूप से देखा जाता है, जहाँ यह पर्व भगवान कृष्ण और राधा की लीलाओं से जुड़ा है। कथाओं के अनुसार, श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ रंग खेलकर होली की परंपरा को लोकप्रिय बनाया। आज भी बरसाना की लठमार होली और वृंदावन की फूलों की होली विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। यहाँ होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम है।

*सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व*

होली समाज में समरसता और एकता का संदेश देती है। इस दिन लोग अपने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और गले मिलते हैं। जाति, वर्ग और सामाजिक भेदभाव की दीवारें इस अवसर पर कमजोर पड़ जाती हैं।
इसके साथ ही होली वसंत ऋतु के आगमन और नई फसल के स्वागत का भी प्रतीक है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान नई उपज की खुशी में इस पर्व को उत्साह से मनाते हैं। लोकगीत, फगुआ और पारंपरिक व्यंजन इस उत्सव की रौनक को और बढ़ा देते हैं।

*सांभर लेक में नन्दकैश्वर मेले की परंपरा*

जयपुर जिले के सांभर में होली के अवसर पर प्रसिद्ध नन्दकैश्वर मेला आयोजित किया जाता है। यह मेला स्थानीय श्रद्धालुओं और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले लोगों के लिए आस्था का केंद्र होता है। मेले में भगवान शिव के नन्दकैश्वर स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है और श्रद्धालु मंगलकामनाओं के साथ दर्शन करते हैं।
मेले के दौरान लोकगीत, भजन-कीर्तन और पारंपरिक नृत्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ग्रामीण परिवेश में ढोल-नगाड़ों की थाप पर फाग गीत गाए जाते हैं, जो होली के उल्लास को और भी जीवंत बना देते हैं। महिलाएँ पारंपरिक वेशभूषा में सजकर सामूहिक रूप से फाग गाती हैं, जबकि पुरुष होली की चौपाल सजाकर आपसी भाईचारे को मजबूत करते हैं।
परंपरा और सामाजिक समरसता
सांभर लेक की होली सामाजिक एकता और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रतीक है। यहां होली का उत्सव केवल रंग खेलने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम भी है। छोटे-बड़े, सभी वर्गों के लोग मिलकर इस पर्व को मनाते हैं, जिससे आपसी प्रेम और सौहार्द की भावना प्रबल होती है।
अंततः कहा जा सकता है कि सांभर लेक की होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि लोक आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक गौरव का उत्सव है। नन्दकैश्वर मेले की रौनक और पारंपरिक आयोजन इसे राजस्थान की विशिष्ट होली उत्सवों में एक अलग स्थान प्रदान करते हैं।

*होली का संदेश*

होली हमें यह सिखाती है कि अहंकार और अन्याय का अंत निश्चित है। भक्ति, सत्य और धर्म की राह कठिन अवश्य हो सकती है, परंतु अंततः विजय उसी की होती है। यह पर्व हमें जीवन की नकारात्मकता को त्यागकर प्रेम, आनंद और सकारात्मकता के रंगों से जीवन को रंगने की प्रेरणा देता है।

*निष्कर्ष*

होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का जीवंत उत्सव है। यह धर्म, परंपरा और सामाजिक सौहार्द का संगम है। होलिका दहन हमें बुराइयों को जलाने की प्रेरणा देता है, जबकि रंगों की होली जीवन में उल्लास और प्रेम का संचार करती है।
वर्तमान समय में आवश्यकता है कि हम इस पर्व को पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ मनाएँ। तभी होली का वास्तविक संदेश—सत्य, प्रेम और एकता—सार्थक हो सकेगा।

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