लखनऊ-भारतीय ज्ञान प्रणाली के माध्यम से सतत विकास पर लखनऊ में अंतरराष्ट्रीय मंथन शुरू

स्मार्ट हलचल|लखनऊ (ब्यूरो) जब तक ग्रामीण भारत सशक्त नहीं होगा, तब तक विकसित भारत का सपना अधूरा रहेगा, इस महत्वपूर्ण विषय पर केंद्रित,नेशनल पी जी कॉलेज द्वारा आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “भारतीय ज्ञान प्रणाली के माध्यम से सतत विकास और शासन की पुनर्कल्पना: विजन विकसित भारत @2047 का शुभारंभ सोमवार को भव्य समारोह के साथ हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक रूप से दीप प्रज्वलन एवं स्वागत भाषण से की गई।
उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय सचिव सुनील देवधर ने अपने संबोधन में कहा कि देश के समग्र विकास की आधारशिला गांवों के विकास में निहित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक ग्रामीण भारत सशक्त नहीं होगा, तब तक विकसित भारत का सपना अधूरा रहेगा। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. देवेन्द्र कुमार सिंह ने अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन को भारतीय ज्ञान प्रणाली के माध्यम से सतत विकास और सुशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़े वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। टेक्सास विश्वविद्यालय के प्रो. सुभाष सी. चौहान ने आयुर्वेद की वैश्विक प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कैंसर जैसे गंभीर रोगों के उपचार में आयुर्वेद में व्यापक संभावनाएं हैं। उन्होंने हल्दी को एक प्रभावी औषधि बताते हुए कहा कि इसका उल्लेख प्राचीन वेदों में भी मिलता है और इस पर विश्वभर में शोध जारी है।
ईस्ट यूरोपियन यूनिवर्सिटी, जॉर्जिया की डॉ. तमता लेकिशविली (ऑनलाइन) ने युवाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के क्षेत्र में प्रशिक्षित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि तकनीकी दक्षता और नवाचार ही भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे ले जा सकते हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. एस. पी. सिंह ने ज्ञान अर्जन की प्रक्रिया को दीर्घकालिक बताते हुए तुलसीदास का दोहा उद्धृत किया, “सिमिट-सिमिट जल भरहि तलावा, जिमि सद्गुण सज्जन परि आवां।”, उन्होंने कहा कि ज्ञान और संस्कार समय के साथ विकसित होते हैं।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रो. एम. एम. गोयल ने भारतीय ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक विरासत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महाभारत काल से ही भारत विश्व को ज्ञान का मार्ग दिखाता रहा है और कुरुक्षेत्र इस परंपरा का प्रमुख केंद्र रहा है।
कार्यक्रम में एलएनआईपीई ग्वालियर के पूर्व कुलपति प्रो. विवेक पांडेय, अल्स्टॉम बेंगलुरु के आनंद भारद्वाज, लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. एम. के. अग्रवाल तथा बीएचयू के प्रो. टी. पी. सिंह सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। अंत में प्रो. राकेश पाठक ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
उद्घाटन सत्र के बाद दोपहर 1:00 बजे से 2:00 बजे तक भोजनावकाश रखा गया। इसके पश्चात 2:00 बजे से 5:00 बजे तक समानांतर तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें शोधार्थियों और प्रतिभागियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।
सांयकाल 5:00 बजे के बाद प्रतिभागियों एवं विद्यार्थियों द्वारा सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी गईं, जिनमें भारतीय परंपरा और समकालीन विषयों की झलक देखने को मिली।
यह तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आगामी दो दिनों तक विभिन्न शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ जारी रहेगा।
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