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PMO का पत्र… संसद बंधक: जनता के पैसों पर ताला, लोकतंत्र पर हमला

नितिन डांगी

 

स्मार्ट हलचल| अब पर्दा उठ चुका है।अब यह “आरोप” नहीं रहा —
यह लिखित आदेश बन चुका है।कल प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने Lok Sabha सचिवालय को पत्र भेजकर साफ कर दिया:

👉 PM CARES Fund
👉 प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष
👉 राष्ट्रीय रक्षा कोष

इन तीनों पर अब संसद में कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा।

सीधा मतलब:

जनता पैसा देगी,
सरकार इस्तेमाल करेगी,
प्रधानमंत्री नाम देंगे —
और संसद चुप बैठेगी।

यह लोकतंत्र नहीं है।

यह संवैधानिक डकैती है।

यह प्रशासन नहीं — यह सत्ता का नंगा प्रदर्शन है

PMO कहता है:

> ये फंड “स्वैच्छिक दान” से चलते हैं, इसलिए सरकार जवाबदेह नहीं।

 

वाह!

तो फिर बताइए —

अगर सरकारी नहीं हैं, तो Narendra Modi इसके अध्यक्ष क्यों?

अगर सरकारी नहीं हैं, तो सरकारी PSUs से पैसा क्यों?

अगर सरकारी नहीं हैं, तो आपदा के समय इन्हें “राष्ट्रीय समाधान” क्यों बताया गया?

और अगर जनता का पैसा है —

तो जनता के प्रतिनिधि सवाल क्यों नहीं पूछ सकते?

क्योंकि जवाब देने पड़ जाएंगे।

पहले सांसदों की आवाज़ छीनी, अब सवाल ही खत्म

कुछ दिन पहले Rahul Gandhi को सदन में बोलने नहीं दिया गया।

स्पीकर Om Birla मूकदर्शक बने रहे।

अब अगला स्तर:

पूरा विषय ही संसद से बाहर।

यह वही तरीका है जो तानाशाह अपनाते हैं —

पहले आवाज दबाओ
फिर सवाल हटाओ
फिर सिस्टम कब्ज़ाओ

यह पहला “पब्लिक फंड” है जो पब्लिक से ही छुपाया जा रहा है

सरकार का नया मॉडल:

✔ जनता पैसा दे
✔ सरकार खर्च करे
✔ प्रधानमंत्री नाम लगाएं
❌ संसद पूछे — मना है
❌ हिसाब मांगे — मना है
❌ बहस करे — मना है

दुनिया के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि
संसद को बताया जा रहा है कि वह क्या नहीं पूछ सकती।

यह विधायिका नहीं रही।

यह अब सत्ता की शाखा बनती जा रही है।

असली डर क्या है?

डर यह नहीं कि सवाल उठेंगे।

डर यह है कि अगर सवाल उठे तो सामने आएगा —

कितना पैसा आया
किसे दिया गया
किस प्रक्रिया से दिया गया
किसकी सिफारिश पर दिया गया

इसलिए सबसे आसान रास्ता चुना गया:

सवाल ही खत्म कर दो।

यह चेतावनी नहीं, खतरे का सायरन है

कल तीन फंड बाहर किए गए।

कल मंत्रालय होंगे।

परसों नीतियां होंगी।

और एक दिन संसद सिर्फ फोटो सेशन बनकर रह जाएगी।

यह वही रास्ता है
जहां लोकतंत्र मरता है
और सत्ता अमर हो जाती है।

⚫ अंतिम शब्द

कल PMO का पत्र
भारतीय लोकतंत्र के ताबूत में ठोंकी गई कील है।

अगर आज जनता के पैसों पर ताला लग गया,
तो कल जनता की आवाज़ पर भी लग जाएगा।

यह राजनीति नहीं है।

यह सिस्टम हाईजैक है।

और जो अब भी चुप हैं —
वे दर्शक नहीं,
भागीदार हैं।

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