(शाश्वत तिवारी)
स्मार्ट हलचल|पश्चिम बंगाल की राजनीति के बारे में एक मशहूर कहावत है कि “जो आज बंगाल सोचता है, वो कल भारत सोचता है।” हालांकि, आज का बंगाल क्या सोच रहा है, यह समझना किसी थ्रिलर फिल्म की गुत्थी सुलझाने जैसा है। साल 2026 के विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े बंगाल में इस बार मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व’ और ‘अस्मिता’ का है। यहां अस्मिता का मतलब बंगाली पहचान से है जिसे ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी ने खुद के साथ जोड़ लिया है। जबकि बीजेपी के लिए यह चुनाव उसके वैचारिक अस्तित्व के विस्तार की है जिसे वह अक्सर हिंदू पहचान की रक्षा के तौर पर खुद से जोड़ती है। आइए एक नजर डालते हैं बंगाल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव से ठीक पहले की जमीनी हकीकत पर।
बंगाल के अखाड़े में मोटे तौर पर 2021 की तरह इस बार भी ममता बनर्जी की टीएमसी और बीजेपी में डायरेक्ट फाइट दिख रही है। हालांकि, कुछ रीजन में लेफ्ट और कांग्रेस की पकड़ मजबूत है। एक ओर ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस बंगाली अस्मिता और अपनी कल्याणकारी योजनाओं के दम पर हैट्रिक के बाद चौथी पारी की तैयारी में है। वहीं, दूसरी ओर साल 2019 और 2021 के बाद बंगाल में मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी भाजपा पहली बार बंगाल के अभेद्य किले में सेंध मारने की तैयारी में है। जबकि कभी बंगाल पर 34 साल तक राज करने वाली लेफ्ट पार्टी अब अपनी खोई हुई जमीन तलाश रही है। हालांकि, यह बड़ा सवाल है की लेफ्ट इस लड़ाई को कितनी मजबूती से लड़ पाएगी।
बंगाल में चाय की दुकानों पर इस बार चुनावी चर्चा का मिजाज बदला हुआ है। सबसे पहले एसआईआर का जिक्र होता है। दरअसल, SIR चुनाव से पहले वोटर लिस्ट को अपडेट करने की प्रक्रिया है जिसमें घर-घर जाकर फर्जी वोटरों के नाम हटाए गए। टीएमसी इसे लेकर धांधली का आरोप लगा रही है। इसके अलावा, ब्लॉक लेवल पर भ्रष्टाचार भी बड़ा मुद्दा है। लोगों का कहना है कि बिना ‘पकड़’ के सरकारी ऑफिसों में काम होना मुहाल है। जबकि लॉ एंड ऑर्डर की हालत देखकर कभी बिहार में रहे पुराने जंगलराज की यादें ताजा हो रही हैं। वहीं, ‘बाहरी बनाम भीतरी’ का मुद्दा भी खूब चर्चा में है जिसे टीएमसी बंगाली अस्मिता से जोड़ रही है।
बंगाल के सियासी भूगोल को समझने के लिए इसे पांच हिस्सों में बांटा जा सकता है। उत्तर बंगाल की 68 सीटों पर बीजेपी का सिक्का चलता है। यहां बीजेपी ने 2021 में जबरदस्त बढ़त बनाई थी। वहीं, दक्षिण बंगाल की 100 से ज्यादा सीटें ममता दीदी का अभेद्य किला मानी जाती हैं। वहीं, जंगलमहल और मिदनापुर की 50 से अधिक आदिवासी बहुल सीटों पर इसबार कांटे की टक्कर दिख सकती है। इसके अलावा, मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे 50 पर्सेंट से ज्यादा जनसंख्यां वाले मुस्लिम जिलों में कांग्रेस और वामपंथियों की आज भी कुछ पकड़ है। जबकि कोलकाता और हावड़ा जैसे शहरी बेल्ट की 40 सीटों पर अभी भी टीएमसी का पलड़ा भारी है।
बंगाल की चुनावी केमिस्ट्री में वोट बैंक का गणित एकदम साफ है। ममता बनर्जी का सबसे बड़ा हथियार राज्य की करीब 30 पर्सेंट मुस्लिम आबादी और महिला वोटर हैं। महिला वोटर ममता दीदी की लाभकारी योजनाओं के चलते उनके साथ फेविकोल की तरह चिपकी हुई हैं। दूसरी तरफ, बीजेपी की ताकत 12 से 13 पर्सेंट हिंदी भाषी आबादी, मतुआ समुदाय और उत्तर बंगाल के हिंदू बंगाली हैं जो ‘हिंदुत्व’ और ‘राष्ट्रवाद’ के मुद्दे पर गोलबंद रहते हैं। वहीं, लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन अब अपने पुराने कैडर और ‘नाराज युवा’ के भरोसे है जो टीएमसी के करप्शन और बीजेपी की ध्रुवीकरण वाली राजनीति, दोनों से ऊब चुका है।
टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत खुद ममता बनर्जी का सीएम फेस है जो 15 सालों से राज्य की कमान संभाल रही हैं। इसके अलावा, राज्य की करीब 30 पर्सेंट मुस्लिम आबादी और कल्याणकारी योजनाएं भी दीदी का मजबूत पक्ष है। बता दें कि ‘लक्ष्मी भंडार’ और ‘कन्याश्री’ जैसी स्कीमों से ग्रामीण महिलाओं के मन में उनके लिए काफी सम्मान का भाव है। इसके अलावा, बूथ लेवल के लोगों तक टीएमसी की पकड़ सबसे ज्यादा मजबूत है। हालांकि, उनकी सबसे बड़ी कमजोरी उनके ही प्रशासन और पार्टी कैडर के भीतर पनपा ‘भ्रष्टाचार’ और ‘कट मनी’ का कल्चर है जिसे विपक्ष लगातार धार दे रहा है।
दूसरी ओर बीजेपी की सबसे बड़ी मजबूती उनका ‘हिंदुत्व’ का मजबूत नैरेटिव और पीएम मोदी का चेहरा है। उत्तर बंगाल और मतुआ बहुल इलाकों में उनकी पकड़ जबरदस्त है। यहां CAA और नागरिकता जैसे मुद्दे उनके पक्ष में माहौल बनाते हैं। हालांकि, बीजेपी की सबसे बड़ी कमजोरी ममता बनर्जी के मुकाबले एक मजबूत लोकल फेस की कमी है। इसके अलावा, बंगाल की ‘अस्मिता’ और खान-पान वाले टीएमसी के नैरेटिव का वे अब तक ठोस जवाब नहीं ढूंढ पाए हैं। बूथ लेवल पर भी बीजेपी का संगठन आज भी टीएमसी के मुकाबले कमजोर है।
कुछ ऐसे रहे हैं पिछले तीन चुनावों के नतीजे
पश्चिम बंगाल के पिछले तीन विधानसभा चुनावों के नतीजे राज्य की बदलती राजनीतिक तासीर को बखूबी बयां करते हैं। साल 2011 में ममता बनर्जी ने 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकते हुए 184 सीटें जीतकर सत्ता में आई। जबकि 2016 के चुनाव में ममता दीदी ने अपनी पकड़ और मजबूत की और 211 सीटें जीतकर विरोधियों को पस्त कर दिया। हालांकि, 2021 का चुनाव सबसे दिलचस्प रहा। इसबार बीजेपी ने 3 से छलांग लगाकर 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल के रूप में अपनी धाक जमाई। वहीं, टीएमसी ने 213 सीटें जीतकर अपनी हैट्रिक पूरी की। इन नतीजों ने साफ कर दिया कि बंगाल में अब मुकाबला त्रिकोणीय की बजाय आमने-सामने हो चुका है।
कुल मिलाकर 2026 का बंगाल चुनाव सिर्फ हार-जीत नहीं, बल्कि साख की लड़ाई है। एक तरफ ममता दीदी का भरोसा अपनी सरकारी योजनाओं और महिला वोटर्स पर है। दूसरी तरफ बीजेपी भ्रष्टाचार और हिंदुत्व के मुद्दे पर सत्ता पलटने की ताक में है। अब देखना यह होगा कि क्या बीजेपी चेहरे की कमी के बावजूद बंगाल के गांव-गांव में पैठ बना पाएगी या दीदी का मैनेजमेंट एक बार फिर सबको मात दे देगा। फिलहाल, बंगाल का वोटर खामोश है और सही वक्त का इंतजार कर रहा है।
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