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घर-घर संस्कार की अलख, राष्ट्र सशक्तिकरण का संकल्प शाहपुरा में भाविप का कुटुंब प्रबोधन संगम, संयुक्त परिवार पर दिया गया जोर

मूलचन्द पेसवानी

स्मार्ट हलचल|शाहपुरा के आदर्श विद्या मंदिर गांधीपुरी में भारत विकास परिषद (भाविप) राजस्थान मध्य प्रांत का कुटुंब प्रबोधन संगम राष्ट्रगान के साथ गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। संगम के समापन सत्र में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि राष्ट्र को सशक्त, संस्कारित और अखंड बनाए रखने के लिए कुटुंब प्रबोधन अभियान को घर-घर पहुंचाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। भाविप की प्रत्येक शाखा स्तर पर इसे प्राथमिकता देने और परिवारों में संस्कार, संवाद व राष्ट्रीय चेतना के बीजारोपण का संकल्प दोहराया गया।
समापन सत्र की अध्यक्षता भाविप राजस्थान मध्य प्रांत के प्रांतीय अध्यक्ष राधेश्याम सोमानी ने की, जबकि मुख्य वक्ता भाविप संस्कार प्रकल्प के पूर्व राष्ट्रीय मंत्री एवं बिड़ला ग्रुप के वाइस प्रेसिडेंट बलराज आचार्य रहे। मंच पर मध्य प्रांत के प्रांतीय महासचिव आनंद सिंह राठौड़, कुटुंब प्रबोधन संयोजक प्रवीण जैन, प्रांत कोषाध्यक्ष अमित सोनी सहित अनेक पदाधिकारी और संभागी उपस्थित रहे।
मुख्य वक्ता बलराज आचार्य ने सनातन परंपरा से चली आ रही संयुक्त परिवार व्यवस्था के दूरगामी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिणामों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने विभिन्न ऋषि-महर्षियों के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि समय के बदलते परिवेश में परिवारों की संरचना में आए परिवर्तनों ने समाज को प्रभावित किया है। आज राष्ट्र को अखंड और सशक्त बनाए रखने के लिए कुटुंब प्रबोधन की महत्ती आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को सामाजिक इकाई मानना भ्रांति है, वास्तविकता यह है कि कुटुंब ही आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इकाई है।
आचार्य ने समाज सशक्तिकरण के लिए पंच परिवर्तन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पहला परिवर्तन कुटुंब प्रबोधन हैकृपरिवार संस्कृति को बचाना। सप्ताह में कम से कम एक दिन पूरा परिवार एक साथ बैठकर भोजन करे, भजन-कीर्तन हो, संवाद हो और संस्कारों को सहेजने का प्रयास किया जाए। परिवारों में जब एकता और राष्ट्रीयता की भावना जागृत होगी, तभी राष्ट्र शक्तिशाली बनेगा। कुटुंब प्रबोधन के माध्यम से समाज के विभिन्न परिवारों के बीच बेहतर तालमेल, परस्पर सहयोग और सौहार्द स्थापित कर समाज और देश को मजबूत बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रांतीय अध्यक्ष राधेश्याम सोमानी ने अपने उद्बोधन में कहा कि व्यक्ति को सबसे पहले संस्कार अपने परिवार से ही प्राप्त होते हैं। समाज को सुसंस्कृत, चरित्रवान, अनुशासित और राष्ट्र के प्रति समर्पित बनाने में परिवार की भूमिका सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की मूल अवधारणाओंकृभाषा, भूषा, भजन, भवन भ्रमण और भोजनकृसे जुड़े रहकर ही समाज सशक्त बन सकता है। भाविप का प्रयास है कि स्वयंसेवकों के परिवार भारतीय जीवन मूल्यों से जुड़ें और वही संस्कार समाज में प्रसारित हों।

इससे पूर्व उद्घाटन सत्र में आरएसएस चित्तौड़ प्रांत के प्रांतीय संयोजक कुटुंब प्रबोधन सूर्यप्रकाश शर्मा, कुटुंब प्रबोधन संयोजक प्रवीण जैन, प्रांतीय महासचिव आनंद सिंह राठौड़ और सामाजिक कार्यकर्ता बिंदू माहेश्वरी की मौजूदगी में दीप प्रज्वलन और वंदे मातरम के गायन के साथ संगम का शुभारंभ हुआ। शाहपुरा शाखा अध्यक्ष पवन बांगड़ ने स्वागत भाषण में कुटुंब प्रबोधन को आज के दौर की अनिवार्य आवश्यकता बताते हुए इसे घर-घर तक पहुंचाने का आह्वान किया।
आरएसएस के प्रांतीय संयोजक सूर्यप्रकाश शर्मा ने कहा कि कुटुंब प्रबोधन भारतीय जीवन-दृष्टि का मूल है। हर घर में सप्ताह में कम से कम एक दिन ऐसा होना चाहिए जब पूरा परिवार एक साथ समय बिताए। घर में भजन, पारिवारिक भोजन, पूर्वजों की परंपराओं पर चर्चा हो और यदि कोई विपरीत विचार या संस्कार हों तो उन्हें दूर करने का प्रयास किया जाए। देश, हिंदू धर्म और समाज से जुड़े विषयों पर संवाद ही मजबूत परिवार और सशक्त राष्ट्र की नींव रखता है।
शर्मा ने कहा कि परिवार एकता से सुदृढ़ बनता है, बिखराव से नहीं। संयुक्त परिवार आने वाली पीढ़ियों को बेहतर संस्कारित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। नई पीढ़ी में परिवार के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना आवश्यक है ताकि वे संयुक्त परिवार की भावना को आत्मसात कर सकें। ऐसे परिवार न केवल स्वयं में खुशहाल होते हैं, बल्कि समाज के लिए भी आदर्श बनते हैं। उन्होंने महिलाओं की भूमिका पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि आज महिलाएं भी कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, ऐसे में परिवार में परस्पर सहयोग और समझ और अधिक जरूरी हो गई है।
मध्य प्रांत के प्रांतीय महासचिव आनंद सिंह राठौड़ ने कहा कि बाजारवाद और भौतिकता ने संयुक्त परिवारों को छिन्न-भिन्न किया है, जिसे रोकना होगा। बच्चों को मोबाइल की लत से दूर कर संस्कारों की ओर मोड़ना समय की मांग है। उन्होंने कहा कि बच्चों को संस्कारित करने में मां की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। संयुक्त परिवार की मूल अवधारणा को पुनः आत्मसात किए बिना पारिवारिक व्यवस्था को संतुलित नहीं किया जा सकता।
सामाजिक कार्यकर्ता बिंदू माहेश्वरी ने अपने प्रभावशाली उद्बोधन से संभागियों को कुटुंब प्रबोधन के लिए जागृत किया। उन्होंने कहा कि परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से करनी होगी, तभी दूसरों को प्रेरित किया जा सकता है। राष्ट्र निर्माण में कुटुंब प्रबोधन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
समारोह में सेवा संपर्क प्रमुख रजनीकांत आचार्य ने भी संबोधित करते हुए भीलवाड़ा में 12 फरवरी से प्रारंभ होने वाले दिव्यांग शिविर की जानकारी दी। कार्यक्रम संयोजक द्वारका प्रसाद जोशी ने आभार व्यक्त किया। संगम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ, जहां उपस्थितजनों ने कुटुंब प्रबोधन के संकल्प को जीवन में उतारने का दृढ़ निश्चय किया।

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