“ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी: क्या भ्रष्टाचार के इलाज में व्यवस्था की सर्जरी ही अंतिम उपाय?

विशेष राजनीतिक विश्लेषण – अभियंता अनिल सुखवाल।
ईमानदारी के मुखौटे के पीछे पनपती गड़बड़ियों पर तीखा व्यंग्य, सवाल—समस्या की जड़ खत्म करें या पूरी संरचना ही बदल दें?
स्मार्ट हलचल|देश में भ्रष्टाचार पर बहस कोई नई नहीं है, लेकिन हाल ही में उभरे एक व्यंग्यात्मक चित्र और उससे जुड़ी कथा ने इस मुद्दे को नए अंदाज़ में सामने ला खड़ा किया है। कहानी में एक ऐसी भैंस का उल्लेख है जो देखने में ईमानदार प्रतीत होती है, किंतु हर वर्ष जानबूझकर एक उत्पाती पाड़े को जन्म देती है। ये पाड़े न तो दूध देते हैं और न ही किसी उत्पादक कार्य में योगदान करते हैं; उलटे वे अव्यवस्था और उत्पात फैलाते हैं।
कथा के अनुसार, जब गौपालक को यह आशंका हुई कि यदि इसी प्रकार पाड़ों की संख्या बढ़ती रही तो गौमाताओं का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा, तब उसने कठोर निर्णय लेते हुए भैंस की बच्चेदानी निकलवाकर उसे जंगल में छोड़ दिया। कहावत चरितार्थ हुई—“ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी।”
व्यंग्य में छिपा गहरा संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कथा दरअसल उस व्यवस्था का प्रतीक है जो ऊपर से ईमानदारी का दावा करती है, लेकिन भीतर से भ्रष्टाचार को जन्म देती रहती है। “उत्पाती पाड़े” उन नई-नई अनियमितताओं, घोटालों और शक्ति के दुरुपयोग का प्रतीक हैं जो समय-समय पर सामने आते हैं।
कहानी यह प्रश्न उठाती है कि क्या भ्रष्टाचार के समाधान के नाम पर पूरी व्यवस्था को निष्क्रिय कर देना उचित है? यदि संस्थाओं को ही समाप्त कर दिया जाए, तो क्या व्यवस्था का ‘दूध’—अर्थात विकास और जनकल्याण—भी बंद नहीं हो जाएगा?
इलाज क्या हो?
प्रशासनिक विशेषज्ञों के अनुसार, समस्या की जड़ समाप्त करना आवश्यक है, किंतु यह कदम संतुलित और संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से होना चाहिए।
पारदर्शिता को बढ़ावा देना
जवाबदेही सुनिश्चित करना
संस्थागत सुधार लागू करना
नागरिक सहभागिता को मजबूत बनाना
ये वे उपाय हैं जो व्यवस्था को समाप्त किए बिना उसे सुधार सकते हैं।
निष्कर्ष-
व्यंग्य हमें सोचने पर विवश करता है कि क्रोध में लिया गया कठोर निर्णय दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता। भ्रष्टाचार का वास्तविक उपचार व्यवस्था की सर्जरी नहीं, बल्कि उसकी शुद्धि और सुधार है।
कहावत भले ही कहती हो—“ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी”,
लेकिन लोकतांत्रिक समाज में आवश्यक यह है कि बांसुरी की धुन भी बनी रहे और व्यवस्था भी स्वस्थ हो।