श्रीमद् भागवत मृत्यु को उत्सव बनाने का अनूठा ग्रंथ” – संत दिग्विजयराम

भागवत श्रवण से ही जीवन का कल्याण संभव,भक्ति में अटूट विश्वास आवश्यक — संत दिग्विजयराम

निंबाहेड़ा, 14 मई 2026

स्मार्ट हलचल|भागवत मर्मज्ञ युवा संत दिग्विजयराम ने कहा कि 18 पुराणों में श्रीमद् भागवत ही ऐसा महापुराण है, जो मृत्यु को भी उत्सव बनाना सिखाता है। जिसके माध्यम से राजा परीक्षित को मात्र सात दिवस में ही मोक्ष प्राप्ति संभव हो सकी। संत दिग्विजयराम गुरुवार को सोनी परिवार द्वारा कृषि उपज मंडी परिसर में आयोजित सप्त दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा महोत्सव के द्वितीय दिवस पर व्यासपीठ से श्रीमद् भागवत महापुराण का रसामृतपान करा रहे थे।

उन्होंने भागवत के मंगलाचरण में नैमिषारण्य तीर्थ पर सूत जी द्वारा 88 हजार ऋषियों को भागवत श्रवण कराने तथा ऋषियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर बताते हुए कहा कि भगवान की भक्ति ही जीवन कल्याण का सच्चा मार्ग है और भक्ति भी अहेतु अर्थात निष्काम होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ईश्वर के प्रति दृढ़ विश्वास के अभाव में व्यक्ति सदैव दुखी रहता है।

संत दिग्विजयराम ने कहा कि प्रभु के प्रति प्रेम भावना लेकर शरणागति भाव से मंदिर में जाना चाहिए। उन्होंने मतंग ऋषि की शबर कन्या भक्तिमति शबरी जैसी प्रतीक्षा एवं मीरा जैसी प्रेम भक्ति को अपनाने का आह्वान किया। कथा के दौरान जब व्यासपीठ से “मेरी झोपड़ी के भाग खुल जाएंगे” भजन की प्रस्तुति हुई तो श्रद्धालु राम भक्ति में सराबोर हो उठे।

उन्होंने कहा कि जीवन में कैसा भी कष्ट क्यों न हो, लेकिन भक्ति कभी नहीं छोड़नी चाहिए। नरसी भगत, सुदामा, शबरी एवं मीरा ने भक्ति के माध्यम से ही भगवान को प्राप्त किया। उन्होंने कहा कि जीवन में नवधा भक्ति के माध्यम से ही आनंद की प्राप्ति संभव है। वहीं हमें तार देने वाले तीर्थों पर स्नान करने से जो लाभ प्राप्त होता है, उतना ही फल प्रभु के राम नाम के स्मरण से भी प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए नाम आश्रय को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

संत दिग्विजयराम ने श्रीमद् भागवत की उत्पत्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि वेदव्यास द्वारा 17 पुराणों की रचना के बाद भी संतुष्टि नहीं मिलने पर नारद मुनि के मार्गदर्शन में 18 वें महापुराण के रूप में श्रीमद् भागवत की रचना की गई, जिसने संसार को मोक्ष एवं मुक्ति का मार्ग प्रदान करने का अनूठा कार्य किया।

उन्होंने नारद मुनि के पूर्व जन्म में दासी पुत्र होने का उल्लेख करते हुए कहा कि संतों का सानिध्य करने से ही उन्हें नारद स्वरूप प्राप्त हो सका। वहीं कुंती प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से ही उत्तरा के गर्भ से राजा परीक्षित का जन्म हुआ, जिससे भागवत में उनका महत्व समस्त संसार के कल्याण से जुड़ा हुआ है।

संत ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति प्रभु से सुख मांगता है, लेकिन माता कुंती ने भगवान श्रीकृष्ण से संसार का दुख मांगकर सदैव प्रभु के प्रेमाश्रय में बने रहने का वरदान मांगा था। उन्होंने भीष्म पितामह प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था तथा भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष चरण भक्ति मांगने पर उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।

उन्होंने बताया कि कलयुग को पांच स्थान प्रदान किए गए हैं, जिनमें जुआ, मदिरा, वासना, कसाई और स्वर्ण प्रमुख हैं। जो भी इनके संपर्क में आता है, वह जीवन में निराशा ही प्राप्त करता है।

संत दिग्विजयराम ने सनातन धर्म से जुड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि जाति-पाति के भेदभाव से ऊपर उठकर यदि सभी हिन्दू एकजुट हो जाएं तो धर्म एवं संस्कृति की जागरूकता में कोई कमी नहीं रहेगी। उन्होंने कहा कि हमें शास्त्र और शस्त्र दोनों को स्वीकार करना होगा, तभी भारतीय संस्कृति सुरक्षित एवं संरक्षित रह पाएगी।

प्रारंभ में सोनी परिवार द्वारा व्यासपीठ का पूजन किया गया, जबकि संत दिग्विजयराम द्वारा कल्याण नगरी के राजाधिराज एवं मुख्य श्रोता ठाकुर जी श्री कल्लाजी की पूजा-अर्चना की गई। कथा के द्वितीय दिवस के विश्राम पर सोनी परिवार एवं श्रद्धालुओं द्वारा व्यासपीठ की महाआरती की गई।

*आज होंगे ध्रुव चरित्र एवं अजामिल उपाख्यान के प्रसंग*
कथा महोत्सव के अंतर्गत शुक्रवार को संत दिग्विजयराम द्वारा ध्रुव चरित्र, जड़ भरत कथा एवं अजामिल उपाख्यान सहित विभिन्न धार्मिक प्रसंगों एवं अनुष्ठानों पर विस्तृत व्याख्यान दिया जाएगा।