शिवराज बारवाल मीना
जयपुर/सांगानेर । स्मार्ट हलचल|राजधानी जयपुर के सांगानेर प्रताप नगर योजना क्षेत्र की 87 कॉलोनियों के नियमन का मुद्दा अब प्रशासन के लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा बनता जा रहा है। 20 अगस्त 2025 को माननीय उच्च न्यायालय के पारित आदेश के बावजूद यदि जमीनी स्तर पर ठोस प्रगति नजर नहीं आ रही, तो सवाल सीधा है—आखिर जिम्मेदार कौन?
22 फरवरी (रविवार) को नियमन हेतु संघर्ष समिति ने शिवम गार्डन में आमसभा और उसके बाद सांगानेर थाने तक शांतिपूर्ण मार्च की घोषणा की है। समिति का दावा है कि हजारों महिला-पुरुष इस कार्यक्रम में भाग लेंगे।
——- आदेश बनाम हकीकत : फाइलों में अटका नियमन? ——-
हाईकोर्ट के निर्णय को छह माह से अधिक समय बीत चुका है।
* लेकिन-क्या नियमन की प्रक्रिया की समय सीमा सार्वजनिक की गई?
* क्या अनुपालना रिपोर्ट आमजन के लिए जारी हुई?
* क्या संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई?
* यदि आदेश की पालना हुई है तो उसका प्रमाण कहां है?
* और यदि नहीं हुई, तो देरी की जवाबदेही किसकी?
——— हजारों परिवार असमंजस में ——–
इन 87 कॉलोनियों में रहने वाले परिवार आज भी असुरक्षा और अनिश्चितता के साये में हैं। ——— भू-स्वामित्व और रजिस्ट्री को लेकर संशय ——-
* मूलभूत सुविधाओं की स्थायित्व पर प्रश्न
* भविष्य में कार्रवाई की आशंका
* जनता का कहना है कि प्रशासनिक अस्पष्टता ने सामाजिक और आर्थिक असुरक्षा बढ़ा दी है।
——– 22 फरवरी : प्रशासन की परीक्षा ——-
आमसभा सुबह 10 बजे से होगी। इसके बाद मार्च काली माता मंदिर, श्योपुर चौराहा, पिंजरापोल गोशाला मार्ग होते हुए सांगानेर थाने तक जाएगा।
बड़ा सवाल यह है कि —
* क्या जिला प्रशासन ने संवाद का रास्ता खोला?
* क्या कोई लिखित आश्वासन या स्पष्ट रोडमैप दिया गया?
* या फिर केवल कानून-व्यवस्था की तैयारी ही रणनीति है?
——– राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही पर सीधा प्रहार ——
यदि उच्च न्यायालय के पारित आदेश के बाद भी स्थिति जस की तस है, तो यह केवल प्रक्रियात्मक देरी नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर प्रश्नचिन्ह है।
* क्या विभागीय स्तर पर फाइलें घूम रही हैं?
* क्या निर्णय लेने से बचा जा रहा है?
* या फिर मामला राजनीतिक खींचतान में उलझा है?
——- संघर्ष समिति का अल्टीमेटम ——-
समिति ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि ठोस समाधान और समयबद्ध कार्रवाई की घोषणा नहीं की गई तो आंदोलन को चरणबद्ध तरीके से तेज किया जाएगा।
——– निष्कर्ष : अब चुप्पी नहीं चलेगी ——-
87 कॉलोनियों का सवाल अब केवल नियमन का मुद्दा नहीं रहा।
* यह प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता की परीक्षा बन चुका है।
* 22 फरवरी का दिन तय करेगा कि प्रशासन जनता के साथ संवाद कर समाधान देता है या फिर बढ़ते जन दबाव के बीच कठघरे में खड़ा नजर आता है।










