सुनील बाजपेई
कानपुर। स्मार्ट हलचल|भारतीय को-ऑपरेटिव ग्रामीण विकास निर्माण लिमिटेड के नाम पर लगभग ₹70 करोड़ के वित्तीय घोटाले का मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। यह एक ऐसा घोटाला है जो चोरी छुपे नहीं बल्कि खुलेआम किया गया है।जानकारी के मुताबिक इसी दौरान महाप्रबंधक पवन कुमार पांडेय द्वारा करोड़ों के इस घोटाले की कमाई से खरीदी गई संपत्तियों का भी विवरण देते हुए उच्च स्तरीय जांच एवं संपत्ति कुर्की करने की भी मांग की गई है। इससे संबंधित विवरण शिकायत पत्र के रूप में उत्तराखंड शासन को भी भेजा जा चुका है ,जिसका विवरण भारतीय को-ऑपरेटिव ग्रामीण विकास एवं निर्माण लिमिटेड (देहरादून/लखनऊ) द्वारा उत्तराखंड राज्य में सांसद निधि एवं खेलकूद विभाग महानिदेशक विभाग व अन्य विभाग सरकारी निर्माण कार्यों में बड़े पैमाने पर वित्तीय धोखाधड़ी और शासकीय धन का गबन किये जाने,फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कार्य करने, निगम’ मतलब सरकारी संस्था के रूप में न केवल प्रदर्शित करने बल्कि भ्रामक तथ्यों के आधार पर शासन में खुद को निर्माण कार्य हेतु सूचीबद्ध भी करवाने, नियम विरुद्ध भारतीय शब्द का प्रयोग करने और 40 करोड़ रुपये का जीएसटी सरकारी खजाने में जमा नहीं करने, गबन के धन से लखनऊ में चार आलीशान मकान, पांच गाड़ियां, जनपद गोंडा (ग्राम पंचायत बेलसर) में कृषि भूमि और दो स्कूल जनपद लखनऊ आदि जैसी बेहिसाब बेनामी संपत्ति अपनी पत्नी, बेटे और स्वयं के नाम पर अर्जित करने, देहरादून, उत्तराखंड में लगभग 2000 वर्ग फीट का आवासीय मकान एवं एक आलीशान फ्लैट आदि जैसी सच्चाई से जुड़ा है। अवैध रूप से अर्जित संपत्ति के प्रमुख विवरण में जीतमणी भट्ट ,वीरेन्द्र सिंह पुत्र हरचरण सिंह की जमीन भी शामिल है। इसका जिल्द नम्बर 8294 पेज संख्या 231 से 290, पवन कुमार पाण्डेय पुत्र गिरीश दत्त पाण्डेय, देहरादून, चतुर्थ ,2000000 ,1756000 अंकित है।
सूत्रों से अब तक मिली जानकारी के मुताबिक भारतीय कोऑपरेटिव ग्रामीण विकास एवं निर्माण लिमिटेड नामक यह संस्था मूल रूप से एक गैर-सरकारी संगठन यानी एन जी ओ है, जो उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों बस्ती, लखनऊ, मिर्ज़ापुर में पूर्व से ही ब्लैकलिस्टेड भी है। यहीं नहीं इस संस्था के विरुद्ध उत्तर प्रदेश के बस्ती, लखनऊ, मिर्ज़ापुर एफ आई आर भी दर्ज है।
लगाए गए आरोपों के मुताबिक फ्राड के रूप में चर्चित भारतीय कोऑपरेटिव ग्रामीण विकास एवं निर्माण लिमिटेड संस्था ने मुख्यमंत्री , कैबिनेट और शासन को गुमराह करते हुए खुद को उत्तराखंड राज्य में एक ‘निगम’ मतलब सरकारी संस्था के रूप में न केवल प्रदर्शित किया बल्कि भ्रामक तथ्यों के आधार पर शासन में खुद को निर्माण कार्य हेतु सूचीबद्ध भी करवा लिया। इसका एक घोटाला चार्ज से भी संबंधित है। नियमानुसार 6.5% का पसेंटेज चार्ज केवल विशुद्ध सरकारी निर्माण एजेंसियों को ही अनुमन्य होता है। परंतु इस गैर-सरकारी संस्था ने खुद को सरकारी बताकर अवैध रूप से करोड़ों रुपये के पसेंटेज चार्ज का लाभ कमाया है।
इसी के साथ एक नियम विरुद्ध अपराधिक कारनामा भारतीय शब्द का प्रयोग करने का भी है, जबकि सेंट्रल रजिस्ट्रार और भारत सरकार के नियमों/अधिसूचना के अनुसार कोई भी निजी या गैर-सरकारी संस्था अपने नाम के आगे ‘भारतीय’ शब्द का प्रयोग इस तरह नहीं कर सकती, जिससे सरकारी होने का भ्रम पैदा हो। संस्था ने इस नियम का भी स्पष्ट उल्लंघन किया है। पत्र में आगे या भी कहा गया है कि संस्था द्वारा लगभग 40 करोड़ रुपये का जीएसटी सरकारी खजाने में जमा नहीं करके गंभीर वित्तीय अपराध भी खुले आम किया गया है।
जानकारी के मुताबिक इस संस्था में कार्यरत कथित महाप्रबंधक ‘पवन कुमार पांडे’ और अन्य तकनीकी अधिकारी मसलन अधीक्षण अभियंता, अधिशासी अभियंता, अवर अभियंता, परियोजना प्रबंधक आदि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कार्य कर रहे हैं। इस फर्जीवाड़े और गबन के धन से पवन कुमार पांडे द्वारा लखनऊ में चार आलीशान मकान, पांच गाड़ियां, जनपद गोंडा (ग्राम पंचायत विल्सन) में कृषि भूमि और दो स्कूल आदि जैसी बेहिसाब बेनामी संपत्ति अपनी पत्नी, बेटे और स्वयं के नाम पर अर्जित की गई है। यह भी आशंका व्यक्त की गई है कि यदि प्रभावी कार्यवाही के रूप में इस संस्था के खिलाफ तत्काल प्रभाव से रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में यह संस्था लगभग 500 करोड़ रुपये से अधिक के सरकारी कार्यों का धन समेटकर फरार हो सकती है।
