ऐतिहासिक निर्णयः भवानीमण्डी के प्राचीन शिवालय मंदिर को 50 वर्ष बाद मिला अपनी भूमि पर मालिकाना हक

रणवीर सिंह चौहान

भवानी मंडी|स्मार्ट हलचल/उप खण्ड न्यायालय भवानीमण्डी द्वारा एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए नगर की आस्था के केंद्र ‘शिवालय मंदिर’ की भूमि को पुनः मंदिर के नाम दर्ज करने के आदेश जारी किए गए हैं। सेटलमेंट के दौरान हुई त्रुटि के कारण पिछले 50 वर्षों से यह भूमि पूर्व पुजारी परिवार के नाम दर्ज थी, जो कि राजस्थान काश्तकारी अधिनियम का स्पष्ट उल्लंघन है।यह प्रकरण अप्रैल 2024 में मंदिर संचालन ट्रस्ट द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत किया गया था। प्रतिवादीगण के संबंध में कोई जानकारी न होना एवं नोटिस तामील न हो पाने के कारण मामला लंबित था। वर्तमान उप खण्ड अधिकारी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए त्वरित विधिक प्रक्रिया अपनाई और नोटिस तामील की कार्यवाही पूर्ण करवाकर तहसील से विस्तृत रिपोर्ट तलब की.

न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों और तहसीलदार पचपहाड़ द्वारा प्रस्तुत विस्तृत जांच रिपोर्ट के साथ तहसील के ‘मंदिर माफी रजिस्टर’ के सूक्ष्म अवलोकन से यह स्पष्ट हुआ कि मूल रूप से भूमि ‘माफी बगीची मंदिर शिवजी’ के नाम ही दर्ज थे। उक्त आराजी पर कालांतर से ही मंदिर स्थापित है उक्त भूमि पर कभी भी प्रतिवादीगण का न तो काश्त रहा और न ही कोई विधिक अधिकार। राजस्व अभिलेख में महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि राजस्व अभिलेखों में इस भूमि की ‘किस्म’ आज दिनांक तक ‘गैर मुमकिन मंदिर’ ही चली आ रही है।

22 अप्रैल 2026 को पारित अपने आदेश में उप खण्ड अधिकारी सुश्री श्रद्धा गोमे ने न केवल भूमि मंदिर के नाम करने का निर्देश दिया, बल्कि भविष्य के लिए इस भूमि को किसी भी ट्रस्ट, संस्था या व्यक्ति द्वारा बेचा या हस्तांतरित किए जाने पर भी नियमानुसार पूर्णतः रोक लगा दी है। माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी अपने कई निर्णयों में यह दोहराया है किः राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों और न्यायालयों का यह विधिक दायित्व है कि वे नाबालिगों, दिव्यांगों और ‘देवता’ (Deity) के हितों की रक्षा करें; क्योंकि कानूनन देवता को एक ‘शाश्वत नाबालिग’ (Perpetual Minor) माना गया है, जो कानून के विशेष संरक्षण के पात्र हैं।

शिवालय मंदिर न केवल भवानीमण्डी बल्कि आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की श्रद्धा का मुख्य केंद्र है। मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अतिरिक्त अन्य देव स्थान है, जो सार्वजनिक धार्मिक आयोजनों के काम आता है। इस ऐतिहासिक जनहित निर्णय के बाद अब मंदिर की भूमि के खुर्द-बुर्द होने या किसी निजी हित में उपयोग होने का भय सदैव के लिए समाप्त हो गया है।