कोरोना ने छीना मां का साया, कैंसर ने पिता को लील लिया—चार भाई-बहन बेसहारा, सोशल मीडिया से जुटे 2.55 लाख रुपए

बिन्टु कुमार

 नारायणपुर |स्मार्ट हलचल|जब जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा छिन जाता है, तो हर रास्ता सूना और वीरान नजर आने लगता है। ऐसी ही एक हृदयविदारक कहानी नगरपालिका क्षेत्र के गाँव ज्ञानपुरा से सामने आई है, जहां एक हंसते-खेलते परिवार पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा कि चार भाई-बहन पूरी तरह बेसहारा हो गए। इस परिवार की खुशियों को पहले कोरोना महामारी ने उजाड़ा और जो कसर बाकी रह गई, उसे कैंसर जैसी गंभीर बीमारी ने पूरा कर दिया। गांव ज्ञानपुरा निवासी 41 वर्षीय रामस्वरूप मीणा का 26 मार्च को कैंसर के कारण निधन हो गया। यह दुख बच्चों के लिए इसलिए और भी असहनीय था क्योंकि उनकी मां शारदा देवी का निधन पहले ही कोरोना काल में 8 मई 2021 को हो चुका था। माता-पिता दोनों के असमय चले जाने से पूजा, पूनम, सचिन और रिंकू बाई के जीवन में गहरा अंधेरा छा गया है और उनका भविष्य अनिश्चितताओं से घिर गया है। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि आज भी ये चारों भाई-बहन दो कच्चे छप्परों के नीचे जीवन यापन करने को मजबूर हैं। सिर पर पक्की छत नहीं है और हालात ऐसे हैं कि आंखों में आंसुओं के सिवा कुछ नजर नहीं आता। इसी बीच कठिन समय में इंसानियत की एक किरण तब नजर आई, जब वाल क्षेत्र आदिवासी मीना सेवा समिति ने सोशल मीडिया के माध्यम से इन बच्चों की मदद के लिए अपील की। इस अपील ने लोगों के दिलों को झकझोर दिया और सर्व समाज के 282 लोगों ने अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग किया। किसी ने एक रुपया तो किसी ने 21 हजार रुपए तक की मदद दी और महज 18 दिनों में करीब 2 लाख 55 हजार रुपए की राशि एकत्रित हो गई। सहयोग की भावना इतनी प्रबल रही कि लेनदेन अधिक होने से मृतक के भतीजे अरविंद का बैंक खाता तक ब्लॉक हो गया, जिसके बाद सचिन के नाम से नया खाता खुलवाकर सहायता राशि जमा की गई। वर्तमान में चारों भाई-बहन अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पूजा और पूनम नारायणपुर के राजकीय कन्या महाविद्यालय में अध्ययनरत हैं, जबकि सचिन और रिंकू बाई बानसूर के मत्स्य पीजी कॉलेज में पढ़ाई कर रहे हैं। चारों में से किसी का विवाह नहीं हुआ है और जीवन की लंबी राह उनके सामने खड़ी है। विडंबना यह है कि सरकारी योजनाओं के दावों के बावजूद इस पीड़ित परिवार को केवल खाद्य सुरक्षा योजना का ही लाभ मिल पाया है। कच्चे छप्पर में रहने के बावजूद वे अब तक प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित हैं। समाज ने अपना कर्तव्य निभाते हुए मदद का हाथ बढ़ाया है, लेकिन अब इन बेसहारा भाई-बहनों की उम्मीदें सरकार पर टिकी हैं कि कोई योजना उनके जीवन के अंधेरे को रोशनी में बदल सके।

जिस भी योजना के लिए ये बच्चे पात्र होंगे, उन्हें उसका समुचित लाभ प्रदान किया जाएगा।
— संसार सागर, सामाजिक सुरक्षा अधिकारी, बानसूर